नम्र निवेदन

उपर्युक्त विवेचनमें वर्तमान शिक्षाके कुफलका दिग्दर्शनमात्र कराया गया है। ऐसे और भी बहुत-से दोष इस शिक्षासे पैदा हुए हैं, जिनका उल्लेख नहीं हो सका है। उदाहरणार्थ उनमें एक दोष भेदभाव और परस्पर वैमनस्यकी वृद्धि है। इस शिक्षाके प्रतापसे खान-पान और विवाह-शादी आदिमें उचित भेदको मिटानेवाली नामकी राष्ट्रीयता तो बढ़ी है, परंतु पारस्परिक प्रेम और सौहार्द बुरी तरहसे घट गया है। जैसे यूरोपकी देशभक्ति (Patriotism) में विश्वहितकी तो बात ही क्या, पड़ोसी राष्ट्रके हितकी भी परवा नहीं है, वैसी ही विश्वहित-विरोधिनी संकुचित देश-भक्तिका प्रचार यहाँ भी हो रहा है। आज जातिभेद मिटानेकी तो बातें हो रही हैं; परंतु प्रत्येक जाति-उपजातिका भेद मजबूतीसे कायम रखनेके लिये प्रतिद्वन्द्विताके भावोंसे पूर्ण जातीय कान्फरेंसोंकी बाढ़-सी आ गयी है और सभी अपना-अपना अलग स्वत्व कायम करना चाहते हैं। समस्त भारतवासियोंके एक स्वार्थ होनेकी बात तो दूर रही, आज हिंदू-हिंदूमें और मुसलमान-मुसलमानमें भी वस्तुत: एक स्वार्थकी भावना नहीं रही है। हिंदुओंमें तो जैन, सिख, आर्यसमाज, ब्राह्मसमाज आदि अनेक नये-नये भेद हो गये हैं और उनकी संख्या क्रमश: बढ़ती जा रही है। सैकड़ों जातियों-उपजातियोंमेंसे एक-एक उपजातिके अलग-अलग अनेकों भेद हो गये हैं और सबकी स्वार्थदृष्टि अलग-अलग हो गयी है। अग्रवालसभा, अग्रवाल-पंचायत, अग्रवाल-युवक-मण्डल, माहेश्वरी डीडूपंचायत, माहेश्वरी महासभा आदि-जैसी सैकड़ों विभिन्न संस्थाएँ इसका प्रमाण हैं। पहले एक वैश्यसभा थी, अब वैश्यवर्णके अन्तर्गत विभिन्न उपजातियोंकी न मालूम कितनी सभाएँ हैं। अधिक क्या, किसी दिन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ या ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ के आदर्शको माननेवाली जातिके महान् आदर्शको नष्ट करके आजकी इस शिक्षा-प्रणालीमें स्त्री-पुरुष (दम्पति)-में भी पृथक्-पृथक् स्वार्थकी भावना उत्पन्न करके उन्हें लड़ाईके मैदानमें लाकर खड़ा कर दिया है। अभेदके नामपर ऐसा विनाशकारी भेद फैल गया है कि आज हम अपने अकेले व्यक्तित्वकी रक्षा और उसीके पोषणमें जीवन बिताना कर्तव्यकी चरमसीमा समझने लगे हैं!! सभी विचारशील पुरुष इन दोषोंको जानते और अनुभव करते हैं और यथासाध्य इन्हें दूर करनेका प्रयत्न भी कर रहे हैं; तथापि मैं एक बार पुन: सभी शिक्षा-प्रचारक और शिक्षाप्रेमी महानुभावोंसे विनयपूर्वक प्रार्थना करता हूँ कि वे इस विषयपर और भी गम्भीरतासे विचार करें और शिक्षा-प्रणालीमें यथासाध्य तुरंत परिवर्तन करने-करानेका प्रयत्न करें। तेरी तुच्छ सम्मतिमें नीचे लिखी बातोंपर ध्यान देनेसे शिक्षा-प्रणालीके बहुत-से दोष नष्ट हो सकते हैं और शिक्षाके असली उद्देश्यकी किसी अंशमें पूर्ति हो सकती है।

१-पाठ्य-पुस्तकोंमें हमारी प्राचीन आर्य-संस्कृतिका सच्चा महत्त्व बतलाया जाय, पौराणिक और ऐतिहासिक महापुरुषोंके जीवनकी प्रभावोत्पादक और शिक्षाप्रद घटनाओंका सच्चा वर्णन रहे और प्राचीन संस्कृत-ग्रन्थोंके उपयोगी अंशोंका समावेश किया जाय।

[याद रखना चाहिये कि जिस जातिकी अपनी संस्कृति, अपने महापुरुष और अपने सत्-साहित्यपर अश्रद्धा हो जाती है, वह जाति प्राय: नष्ट हो जाती है। वर्तमान शिक्षाने ऐसे विलक्षण ढंगसे यह काम किया है कि हम उसे उन्नति समझ रहे हैं और हो रहा है हमारा सर्वनाश! इस शिक्षाके प्रभावसे आज अपनी संस्कृतिमें, अपने पूर्वपुरुषोंमें और अपने प्राचीन साहित्यमें हमारी श्रद्धा नहीं रही है और इसके बदले पाश्चात्य सभ्यता, यूरोपके महापुरुष और उनके साहित्यपर हमारी श्रद्धा हो गयी है। मेरे कहनेका यह अभिप्राय नहीं कि कहींकी भी अच्छी चीजका आदर न किया जाय। आदर तो अवश्य करना चाहिये; परंतु इतनी आत्मिक गुलामी तो नहीं होनी चाहिये कि हमारे घरकी चीजकी ओर हम देखें ही नहीं, कभी देखें तो उपेक्षासे या घृणाकी दृष्टिसे और वही चीज विदेशी विद्वानोंकी लेखनीसे प्रशंसित होकर उनके द्वारा विकृतरूपमें हमारे सामने आवे तब हम उसीको सिर चढ़ाने लगें।]

२-ईश्वर और धर्मके ठोस संस्कार बालकोंके हृदयमें जमें, ऐसी बातें पाठ्य-पुस्तकोंमें अवश्य रहें। गीता-जैसे सर्वमान्य ग्रन्थको उच्च शिक्षामें रखा जाना चाहिये।

३-सदाचार और दैवी सम्पत्तिको बढ़ानेवाले उपदेश सदाचारी और दैवी सम्पत्तिसम्पन्न पुरुषोंके चरित्रसहित पाठ्य-पुस्तकोंमें रहें और उनका विशेषरूपसे महत्त्व बतलाया जाय।

४-धार्मिक शिक्षाकी स्वतन्त्र व्यवस्था भी हो जिसमें १-ईश्वरभक्ति, २-माता-पिताकी भक्ति, ३-शास्त्रभक्ति और देशभक्ति, ४-सत्य, ५-प्रेम, ६-ब्रह्मचर्य, ७-अहिंसा, ८-निर्भयता, ९-दानशीलता, १०-निष्कपट व्यवहार, ११-परस्त्रीको माँ-बहिन समझना,१२-किसीकी निन्दा न करना, १३-किसी भी दूसरे धर्म या धर्माचार्यको नीची निगाहसे न देखना, १४-आजीविका आदिके कार्योंमें छल, कपट और चोरीका त्याग, १५-शारीरिक श्रम या मेहनतकी कमाईका महत्त्व और १६-सबसे प्रीति करना—इन १६ गुणोंपर विशेष जोर दिया जाय और बालकोंके हृदयमें इनके विकास और विस्तार करनेकी चेष्टा की जाय। प्रतिदिन पढ़ाई आरम्भ होनेके समय सब अध्यापक और विद्यार्थी मिलकर ऐसी ईश्वरप्रार्थना करें, जिसके करनेमें किसी भी धर्मके बालकको आपत्ति न हो।

५-अवतारों और महापुरुषोंकी जन्मतिथियोंपर उत्सव मनाये जायँ और उनके जीवनकी महत्त्वपूर्ण बातोंपर प्रकाश डाला जाय।

६-खानपानकी शुद्धि और संयमके महान् लाभ बालकोंको समझाये जायँ।

७-किसी भी पाठ्य-पुस्तकमें खुले शृंगारका वर्णन न हो। ऐसा कोई काव्य या नाटक पढ़ाना आवश्यक हो तो उसमेंसे उतना अंश पढ़ाईके क्रमसे निकाल दिया जाय। [मैंने सुना है कि कई पाठ्य-पुस्तकोंके ऐसे पाठ अच्छे अध्यापक अपने विद्यार्थियोंको नहीं पढ़ा सकते और बालिकाओंको तो वैसा पाठ आ जानेपर विचारशील प्रोफेसर जितने दिनोंतक वह पाठ चलता है, उतने दिनोंके लिये उस पीरियडमें अनुपस्थित रहनेकी अनुमति देनेको बाध्य होते हैं।]

८-साम्प्रदायिक विद्वेष बढ़ानेवाली बातें किसी भी पाठ्य-पुस्तकमें नहीं रहनी चाहिये।

९-विलासिता और फिजूलखर्चीके दोष पाठ्य-पुस्तकोंमें बतलाये जायँ। जहाँतक हो विद्यार्थियोंका जीवन अधिक-से-अधिक सादा और निर्मल रहे, ऐसी चेष्टा हो।

१०-जहाँतक हो शिक्षा देशी भाषामें देनेकी व्यवस्था की जाय।

११-अध्यापक और छात्रावासके व्यवस्थापक ऐसे सज्जन हों जो स्वयं सदाचारी, धार्मिक, ईश्वरमें विश्वासी, विलासिताके विरोधी और मितव्ययी हों। (याद रहे, अध्यापकों और व्यवस्थापकोंके चरित्रका प्रभाव बालकोंपर सबसे अधिक पड़ता है।)

१२-सभी शिक्षालयोंमें कुछ-न-कुछ हाथकी कारीगरीका काम जरूर सिखाया जाय, जिससे कॉलेजोंसे निकले हुए विद्यार्थी शारीरिक परिश्रम तथा कारीगरीका काम हाथसे करनेमें सकुचावें नहीं, वरं सम्मानका अनुभव करें।

१३-छात्रावास बहुत सादे और संयमके नियमोंसे पूर्ण हों। वहाँ विद्यार्थीगण यथासाध्य सभी काम हाथसे करें, जिससे घर आनेपर हाथसे काम करना बुरा न मालूम हो। तन-मनसे पवित्र रहनेकी आदत डाली जाय। शरीरकी सफाई देशी तरीकेसे की जाय। अवकाशके समय कथा आदिकी व्यवस्था हो।

१४-जहाँतक हो, स्कूल-कॉलेज प्राकृतिक शोभायुक्त स्थानोंमें हों, खास करके पवित्र नदीके तटपर, उनमें यथासाध्य खर्चीला सामान, विदेशी फैशनका फरनीचर आदि न रहे।

१५-माता-पिता, गुरुके प्रति आदर-बुद्धि हो, उनका सेवन और पोषण करना कर्तव्य समझा जाय, किसीका भी अनादर न हो, किसीका मखौल न उड़ाया जाय। ऐसी शिक्षा बालकोंको दी जाय।

१६-लड़के-लड़कियोंको एक साथ बिलकुल न पढ़ाया जाय।

१७-लड़कियोंको पढ़ानेके लिये सदाचारिणी और सद‍्गृहस्था अध्यापिका ही रहें और कन्या पाठशालाओंकी पढ़ाई स्वतन्त्र रहे तथा पढ़ाईका समय भी गृहस्थकी सुविधाके अनुकूल हो।

१८-लड़कियोंकी शिक्षामें इस बातका प्रधानरूपसे ध्यान रखा जाय कि बड़ी होनेपर उनके सतीत्व, मातृत्व और सद‍्गृहिणीपनका नाश न होकर पूर्ण विकास हो।

१९-आर्य संस्कृतिके अनुकूल सद‍्व्यवहार, सेवा-शुश्रूषा और आहार-व्यवहारकी शिक्षा पाठ्य-पुस्तकोंमें रहे।

२०-सात्त्विक त्याग, तितिक्षा और सात्त्विक दानकी शिक्षा दी जाय।

२१-बलका संचय और सदुपयोग करना सिखाया जाय।