समानाधिकार
आज यह कहा जाता है कि ‘स्त्री-पुरुष दोनोंका समान अधिकार है; अत: स्त्रीको सब बातोंमें समानता मिलनी चाहिये। पुरुष बाजारमें जाता है, नौकरी करता है, खेल-तमाशेमें जाता है, सभा-समितिमें जाता है, कौन्सिलका मेम्बर बनता है और वकील-बैरिस्टर या जज बनता है। स्त्रीका इन सब बातोंमें ऐसा ही अधिकार क्यों नहीं होना चाहिये! यह पुरुषोंकी स्वार्थपरता है जो उन्होंने स्त्रियोंको आरम्भसे ही अपना गुलाम बनाये रखनेके लिये उनको धोखा देकर उलटा समझाया।’ इस प्रकार आजकल पुरुष-विद्वेषकी भावना उत्पन्नकर स्त्रियोंको उकसाया जाता है और शिक्षिता कहलानेवाली माताएँ काफी उकसने भी लगी हैं। वे कहती हैं कि ‘हम लड़कपनमें माता-पिताकी, जवानीमें पतिकी और वृद्धावस्थामें पुत्रकी संरक्षतामें क्यों रहें?’ क्या हम मनुष्य नहीं हैं? क्या हमें उतना ही हक नहीं है जितना पुरुषको है।’ मायाका ऐसा ही चमत्कार है, शिक्षावारुणीका ऐसा ही नशा है जो इस बातको समझने ही नहीं देता कि समानाधिकारकी बात तो तब उठ सकती जब दो चीजें वस्तुत: अलग-अलग होतीं। हमारी संस्कृतिमें तो दम्पति स्त्री-पुरुषका एक सम्मिलित नाम है, दोनों परस्पर अर्धांग हैं। एक ही आत्माके दो व्यक्त स्वरूप हैं। ऐसी अवस्थामें पुरुषके साथ प्रतिस्पर्धा करनेकी कोई आवश्यकता ही नहीं है। रही शारीरिक स्वाधीनताकी बात, सो विधाताने स्त्री और पुरुषकी देहकी रचना ही ऐसे ढंगसे की है जिससे दोनोंकी सब बातोंमें कदापि समानता हो नहीं सकती। घरमें स्त्री रानी है, पुरुष उसकी रक्षामें है, उसका दिया हुआ भोजन पुरुषको खानेको मिलता है। परन्तु बाहर स्त्रीको पुरुषकी संरक्षतामें रहना चाहिये। स्त्रीका शरीर सम्पूर्णरूपसे कभी स्वाधीन होनेयोग्य बना ही नहीं है। पुरुष बदन खोलकर आम रास्तोंपर घूम सकता है, स्त्री वैसे नहीं घूम सकती। जंगली स्त्रियाँ भी छातीपर कपड़ा डालकर बाहर निकलती हैं। आजकलकी नंगे सम्प्रदायकी पाश्चात्य स्त्रियाँ नंगी रहना चाहती हैं यह दूसरी बात है। परन्तु वहाँ भी आम तौरपर रास्तोंमें पुरुषकी भाँति स्त्री खुले अंग निर्भीक नहीं घूम-फिर सकती। ऋतुकालसे ही स्त्रीके सब अंगोंमें पुरुषके अंगोंके साथ विलक्षणरूपसे भेद बढ़ने लगता है। ऋतुकालमें उसकी रक्षाकी आवश्यकता होती है। उसे गर्भ धारण करना पड़ता है। गर्भकालमें उसकी देहमें कितने ही परिवर्तन होते हैं। कई तरहके विघ्नोंकी सम्भावना रहती है। उस समय उनसे बचनेके लिये दूसरेकी सहायता आवश्यक होती है। उसे कठोर शारीरिक और मानसिक श्रम तथा उद्वेगसे बचाव रखना पड़ता है। प्रसवके समय खास तौरपर देख-रेखकी जरूरत होती है। गर्भ और प्रसव दोनों ही समय उसके लिये कई आवश्यक नियमोंका पालन अनिवार्य हो जाता है। वह संतानकी जननी बनती है। भगवान् उसके स्तनोंमें दूध उत्पन्न करते हैं और वह स्नेहपूर्ण हृदयसे बच्चेका पालन-पोषण करती है, परन्तु पुरुषको इनमेंसे कुछ भी नहीं करना पड़ता।
नारी-हरण नाम सुनते ही हमारा खून खौलने लगता है। पुरुष-हरणकी बात तो ‘अमेरिकाको छोड़कर’ कहीं नहीं होती। स्त्रीके शरीरमें तप, धीरज, तितिक्षा और पोषणकी शक्ति है, इसीसे वह इतना त्याग करती है। पुरुष वैसा नहीं कर सकता। परंतु यह सत्य है कि देहकी दृष्टिसे स्त्री सदा निराश्रया है। हृदयकी दृष्टिसे वह पिता, पुत्र और पतिकी आश्रयस्वरूपा है। उसकी स्वाधीनता हृदयके क्षेत्रमें है, देहके क्षेत्रमें नहीं। इसी हृदयके बलपर स्त्री पुरुषपर सदा ही विजयिनी है। वह स्नेहकी मूर्ति, प्रेमका अवतार और वात्सल्यकी प्रतिमा है। इसीसे विद्या, पद, गौरव, मान-सम्मान आदिमें बहुत बढ़े-चढ़े पुरुष संध्याके समय घर आकर स्त्रीका आश्रय लेते हैं। स्त्रीका यह प्रताप शारीरिक शक्तिसे नहीं है, प्रेमशक्तिसे, हृदयशक्तिसे, सेवाशक्तिसे है। स्त्री यदि इस अनुपम हृदय-सम्पत्तिका तिरस्कार करके शारीरिक सम्पत्तिमें पुरुषकी प्रतिद्वन्द्विता करने लगेगी तो इससे दोनोंका ही अमंगल अनिवार्य है। स्त्री अपने इस विजयपदसे गिर जायगी, निराश्रय हो जायगी! और वह जितना ही इस क्षेत्रमें आगे बढ़ेगी उतना ही अपनी स्वाधीनता खोकर पुरुषके चंगुलमें फँस जायगी। आज वह पुरुषको नचाती है, अपने चरणोंपर गिराती है फिर उसे नाचना पड़ेगा और पुरुष एक अपने परम मित्रको खोकर—दिनभर थका-माँदा घर आकर जिसके आश्रयसे कुछ समयके लिये अपने सब दु:खोंको भूलकर सुखी हो जाता है—सर्वथा निराश्रय हो जायगा। परंतु क्या किया जाय, वर्तमान शिक्षाने स्त्रियोंको विपथगामिनी बना दिया है, इसीसे वे समानाधिकारके मोहमें पड़कर पुरुषविद्वेषका चश्मा चढ़ानेके कारण अपना हिताहित भूल रही हैं और पुरुषोंकी प्रतिद्वन्द्विता करनेके लिये अपने रानी-पदका परित्याग कर बाजारमें निकल पड़ी हैं। इसीसे वे आज थियेटर, सिनेमा, सभा-समिति, कौन्सिल, अदालत और ऑफिसके फेरमें पड़कर अपने-आपको घृणित पराधीनताके पंजेमें फँसा देना चाहती हैं। इसीसे वे अपनी पोषणमयी प्रतिमाको बिगाड़कर शोषणका भीषण रूप धारण करना चाहती हैं। याद रखना चाहिये कि स्त्रीको कभी स्वतंत्र न रहनेकी व्यवस्था इसलिये नहीं है कि स्त्री गुलाम है, उसे परतन्त्र रखना चाहिये। वह परतन्त्रता तो उसकी शोभा है। रानी ही पहरेदारोंमें रहती है, उसके गुणोंकी, उसके सुन्दर शरीरकी, उसके जरासे स्पर्शसे ही अपावन हो जानेवाले पवित्र सतीत्वकी और आदर्श मातृत्वकी रक्षाके लिये उस परतन्त्रताकी आवश्यकता है। यह उसकी सम्मानरक्षाके लिये दिया हुआ विधाताका दान है!