शिक्षाका यथार्थ उद्देश्य
आर्यसभ्यताके अनुसार शिक्षाका उद्देश्य है उसके द्वारा इहलोकमें सर्वांगीण (शारीरिक, मानसिक, साम्पत्तिक और नैतिक) अभ्युदय और परलोकमें परम नि:श्रेयस—मोक्षकी प्राप्ति। ऋषियोंकी दृष्टिमें विद्या वही है जो हमें अज्ञानके बन्धनसे विमुक्त कर दे—‘सा विद्या या विमुक्तये।’ भगवान् श्रीकृष्णने गीतामें ‘अध्यात्मविद्या विद्यानाम्’ कहकर इसी सिद्धान्तका समर्थन किया है। इसी उद्देश्यसे आर्यजातिके पवित्रहृदय और समदर्शी त्रिकालज्ञ ऋषियोंने चार आश्रमोंकी (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासकी) सुन्दर व्यवस्था की थी। ब्रह्मचर्यके कठोर नियमोंका पालन करता हुआ ब्रह्मचारी विद्यार्थी संयमकी व्यावहारिक शिक्षाके साथ-ही-साथ लौकिक और पारलौकिक कल्याणकारी विद्याओंको पढ़कर, सब प्रकारसे शरीर, मन और वाणीसे स्वस्थ एवं संयमी होकर गुरुकुलसे निकलता था और तब वह गृहस्थमें प्रवेश कर क्रमश: जीवनको और भी संयममय, सेवामय और त्यागमय बनाता हुआ अन्तमें सर्वत्याग करके परमात्माके स्वरूपमें निमग्न हो जाता था। यही आर्यसंस्कृतिका स्वरूप था। जबतक देशमें यह आश्रमसम्मत शिक्षापद्धति प्रचलित थी, तबतक आर्यसंस्कृति सुरक्षित थी और सभी श्रेणीके लोग प्राय: सुखी थे। जबसे अनेक प्रकारकी विपरीत परिस्थितियोंमें पड़कर मोहवश हमने अपनी इस आश्रमसम्मत शिक्षापद्धतिको ठुकराया, तभीसे हमारी आदर्श आर्यसंस्कृतिमें विकार आने लगे। आज बीसवीं शताब्दीमें तो हमारी उस संस्कृतिकी सुदृढ़ नौका हमारे ही हाथों नष्ट-भ्रष्ट होकर डूबने जा रही है। ऐसा मतिभ्रम हुआ है कि विनाशके गहरे गर्तमें गिरना ही आज हमारे मन उन्नतिका निदर्शन हो गया है। जिस चोटी और जनेऊको मुसलमानोंकी तलवार नहीं काट सकी, उसीको आज हम शिक्षाभिमानी हिंदू स्वयं ही उन्नतिके नामपर कटवा रहे हैं। अग्निकुण्डकी लाल-लाल लपटोंमें पड़कर भी हिंदूनारीके जिस सतीत्वको जरा-सी आँच नहीं लगी, वरं उससे वह और भी चमक उठा, वही सतीधर्म आज शिक्षाके फलस्वरूप हमारी बहिन-बेटियोंके लिये भाररूप हो चला है और उसको उतार फेंकनेके लिये चारों ओर सुसंगठितरूपसे कमर कसी जा रही है। जिस धर्म और ईश्वरको हमने अपने समाजशरीरका मेरुदण्ड समझ रखा था, आज उसी धर्मकी आवश्यकता और ईश्वरके अस्तित्वको अपने शिक्षितसमुदायके सामने स्वीकार करनेमें हमारे शिक्षित युवकोंको संकोच और लज्जाका अनुभव होता है। मानो वे किसी मूर्खतापूर्ण कुसंस्कारका समर्थन कर अपनी विद्वत्तामें बट्टा लगा रहे हैं अथवा कोई गुरुतर अपराध कर रहे हैं। कामोपभोग ही आज हमारे जीवनका चरम लक्ष्य बन गया है। कामपरायण होकर आज हम अदूरदर्शी शिक्षाभिमानी लोग आपात इन्द्रियसुखको ही परम सुख समझकर अग्निशिखामें पड़कर भस्म हो जानेवाले मूढ़ पतंगोंकी भाँति कामाग्निमें भस्म होनेके लिये अन्धे होकर उड़ने लगे हैं। इसमें युगप्रभाव तो प्रधान कारण है ही। परंतु उसकी सिद्धिमें एक बड़ा निमित्त है हमारी यह वर्तमान धर्महीन शिक्षापद्धति। इस शिक्षाके पीछे एक जबरदस्त ‘संस्कृति’ की प्रेरणा है, जिसने हमारी आँखोंको चौंधिया दिया है और इसीसे हम आज मायामरीचिकामें फँसकर उसे अपनानेके लिये बेतहाशा दौड़ लगा रहे हैं और इसीसे आज हम अपने सरलहृदय बालक-बालिकाओंके हृदयमें कामोपभोगमयी उस ‘सभ्यता’ का भीषण विष प्रवेश कराकर उन्हें ध्वंसके मुखमें ढकेल रहे हैं और इसीमें उनका और अपना कल्याण मान रहे हैं। जिन देशोंकी यह ‘सभ्यता’ है, वे तो आज तंग आकर इससे मुक्त होनेकी राह ढूँढ़ने लगे हैं और हम भाग्यहीन उसीको अपनानेके लिये आँख मूँदे दौड़ रहे हैं!! भगवान् हमारी बुद्धिका यह विभ्रम कब दूर करेंगे?