स्त्री-शिक्षा

पुरुषोंकी भाँति ही स्त्री-शिक्षाका भी काफी प्रचार बढ़ रहा है। पुरुषोंमें शिक्षा बढ़नेके साथ-ही-साथ हमें स्त्री-शिक्षाकी भी आवश्यकता प्रतीत हुई। स्त्रियोंके लिये विद्यालय, स्कूल और कॉलेजोंकी स्थापना हुई, स्त्री-शिक्षाका भी वही आदर्श माना गया जो पुरुषोंके लिये था, क्योंकि दृष्टिकोण ही ऐसा था। उच्च शिक्षा होनी चाहिये और उच्च शिक्षाका अर्थ ही है कॉलेजोंकी शिक्षा, बी० ए०, एम० ए० की डिग्री प्राप्त करना, वकालत या डॉक्टरी पास करना। स्त्रियाँ भी इसी पथपर चलीं और चल ही रही हैं। वे भी पढ़-लिखकर अध्यापक, मास्टर, कलर्क, वकील, बैरिस्टर, लेखिका, नेता, म्युनिसिपलिटी या कौंसिलोंकी मेम्बर बन रही हैं। यही उन्नतिका स्वरूप है। चारों ओर इस उन्नतिके लिये उल्लास प्रकट किया जा रहा है और यह उन्नति पूर्णरूपसे हो जाय इसके लिये अथक चेष्टा हो रही है। ऐसी स्त्री-शिक्षा देनेवाले स्कूल-कॉलेजोंकी और विद्यार्थिनियोंकी संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। शिक्षाके साथ-साथ शिक्षाके अवश्यम्भावी फलरूप उपर्युक्त दोष स्त्रियोंमें भी आ रहे हैं। वे भी ईश्वर और धर्मका विरोध करने लगी हैं। सरलता, कोमलता, श्रद्धा, संकोच, प्राचीनतासे प्रेम आदि स्वाभाविक गुणोंके कारण यद्यपि पुरुषोंकी तरह ईश्वर और धर्मका खुला और आत्यन्तिक विरोध करनेवाली स्त्रियाँ अभी नहीं पैदा हुई हैं, परंतु सूत्रपात हो चला है। संयमका अभाव भी बढ़ रहा है। पुरुषोंकी अपेक्षा स्वभावसे ही स्त्री कई बातोंमें अधिक संयमी होती हैं, इससे उसकी इधर प्रगति यद्यपि रुक-रुककर होती है, परंतु उसका देखा-देखी करनेका स्वभावदोष उसे असंयमकी ओर खींचे लिये जाता है। इसीसे आज शिक्षित स्त्रियोंमें असंयमकी मात्रा बढ़ रही है। जिस बातको मनमें लानेमें भी स्वभावसे ही शुद्ध और लज्जाशील स्त्रीका हृदय काँप उठता था। आज वही बात पुकार-पुकार कहनेमें उसे लज्जा नहीं आती। परपुरुषोंसे पत्रव्यवहार करने, उनके साथ हँसी-मजाक करने, परपुरुषोंके साथ ताश-शतरंज खेलने और नाचने आदिमें भी संकोच उठता जा रहा है। ब्रह्मचर्यका अभाव तो भीषणरूपसे हो रहा है। कुछ दिनों पूर्व लाहौरके एक सुधारक पत्रमें लड़के-लड़कियोंकी सहशिक्षाके विरोधमें एक जिम्मेदार सज्जनका लिखा हुआ एक लेख निकला था जिसमें लिखा था कि......की लेडी हेल्थ ऑफिसरकी घोषणाका स्वाध्याय किया जाय जो उन्होंने......के विद्यालयोंमें पढ़नेवाली विद्यार्थिनियोंके स्वास्थ्यकी देख-भाल करके की है कि बारह वर्षके ऊपरकी आयुवाली क्वारी लड़कियोंमेंसे ९० प्रतिशतके लगभग आसवती (गर्भवती) और गर्भपात करनेवाली पायी जाती हैं। यदि निष्पक्षतासे देखा जाय तो सब ओर यही आग लगी हुई है, परन्तु माता-पिता और देशके नेता क्या सोच रहे हैं, यह हमारी समझसे बाहर है!

९० प्रतिशत तो बहुत दूरकी बात है, १० प्रतिशत भी हो तो बहुत ही भयानक है। विश्वास नहीं होता कि यह संख्या सत्य है। सम्भव है छपनेमें भूल हुई हो; परन्तु इतना तो अवश्य ही मानना पड़ेगा कि आजकल स्कूलोंमें पढ़नेवाली क्वारी कन्याओंके चरित्रोंके बिगड़नेकी सम्भावना बहुत अधिक है और इसीलिये ऐसी घटनाओंकी संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। जब लड़कियोंका यह हाल है, तब स्वेच्छाचारको ही आदर्श माननेवाली शिक्षिता वयस्का स्त्रीका क्या हाल हो सकता है, यह सोचते ही हृदय काँप उठता है।

आजकी पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ माता-पिताको नहीं मानतीं। समाचारपत्रोंमें छपा है कि नागपुरके यस० आर० गोखले नामक एक वृद्ध सज्जनने स्त्रीसहित इसलिये महान् दु:खी होकर अपने प्राण दे दिये हैं कि उनकी शिक्षिता युवती कन्या माता-पिताकी आज्ञाके प्रतिकूल अपना मनमाना विवाह करना चाहती थी। आजके युवक-युवती कह सकते हैं कि ‘विवाह लड़कीका था। माँ-बापका तो था ही नहीं। लड़की स्वतन्त्रतासे मनमाना पति-वरण करती। माँ-बापको बीचमें बोलनेकी क्या आवश्यकता थी।’ ठीक है, यही तो अहिन्दू आदर्श है। इसी आदर्शके कारण आज अदूरदर्शी नवयुवक और नवयुवतियोंके द्वारा इन्द्रियोंके आकर्षणसे उत्पन्न बुद्धिशून्य और मर्यादारहित प्रेमस्वातन्त्र्य (Free Iove) को महत्त्व दिया जा रहा है और उसमें जरा-सी बाधा आते ही वे आत्महत्या कर लेते हैं। यही अहिन्दू आदर्श माता-पितामें उनकी बुद्धिमें और विवेचनाशक्तिमें अश्रद्धा उत्पन्न कराकर तमाम प्राचीनताके प्रति मनको विद्रोही बना रहा है। आजकी शिक्षिता स्त्री इसलिये अपनी सासके पैरोंमें सिर झुकानेमें या पतिकी सेवा करनेमें अपना अपमान समझती है। इस उच्च शिक्षाका आदर्श तो वही यूरोप है न, जहाँ संगठितरूपसे पतियोंके विरुद्ध जेहादका झंडा उठाया जाता है और पतिघातिनी समितियाँ बनती हैं! स्त्री किसीके साथ हँसे-खेले, घूमने जाय, सिनेमामें जाय, शराब पीये, कुछ भी करे, पति या पिता-माता उसे कुछ कह ही नहीं सकते, क्योंकि यही तो सभ्यताका चिह्न है। हा! भारतकी सतीशिरोमणि देवी! तू आज अपने पवित्र लक्ष्यसे भ्रष्ट होकर किस नरककुण्डकी ओर अग्रसर हो रही है!!!

विलासिता और फिजूलखर्चीका तो कहना ही क्या है? पतिको चाहे बीस रुपये मासिककी नौकरी न मिलती हो, बीबीको तो अपनी मौज-शौक पूरी करने, फैशनका सामान खरीदने और सिनेमामें जानेके लिये पैसे जरूर चाहिये। कॉलेजकी लड़कियोंका यह हाल है कि आजके केवल फैशनके पीछे पगली हो रही हैं। करोड़ों रुपयेकी व्यर्थ शृंगारकी वस्तुएँ इस फैशनके लिये विदेशोंसे आती हैं। घरका काम करना, झाड़ू देना, चक्‍की पीसना और रसोई बनाना उनके लिये अपमानका कारण बन गया है। भारत-सरीखे निर्धन देशमें कन्याओंको इस प्रकार शौकीन और खर्चालू बनाना और घरके कामोंसे विमुख करना अपार दु:खोंको निमन्त्रण देना है। यह बहुत बड़ा सामाजिक पाप है!

इससे मेरा यह मतलब नहीं है कि स्त्री अपने शरीरको मैला रखे, सफाईसे न रहे, गंदे कपड़े पहने या स्त्री-सुलभ उचित शृंगार न करे। ये सब कार्य तो विलासिताकी भावनाके बिना भी हो सकते हैं और होने चाहिये तथा इनमें खर्च भी अधिक नहीं होता। याद रखना चाहिये कि सौन्दर्य फैशनमें नहीं है, सौन्दर्य हृदयके आदर्श गुणोंमें है। सौन्दर्य बोल-चाल, रहन-सहन, आचार-व्यवहार, विनय-नम्रता, सचाई-सफाई, स्वास्थ्य और शक्ति आदिकी स्वाभाविक उच्चतामें है। जिसका हृदय सुन्दर और मधुर है, जिसके कार्य सुन्दर और मधुर हैं, वही सबसे बढ़कर सुन्दर है, फिर शारीरिक सौन्दर्यकी रक्षाके लिये भी उचित और कमखर्चीके पदार्थोंका यथासाध्य उपयोग करनेमें कोई बुराई नहीं है। बुराई तो फैशनकी गुलामीमें है। जहाँ फैशनकी गुलामी होगी, वहाँ उसकी पूर्तिके लिये धनकी भी विशेष आवश्यकता होगी और वह धनकी आवश्यकता ही आज स्त्रियोंके स्वाभाविक गुण सरलताको कपटाचारके द्वारा पराजित करवा रही है।

उपर्युक्त दोषोंके अतिरिक्त स्त्रियोंमें कुछ स्त्रियोचित खास दोष और आ गये हैं, जिनमें सबसे प्रधान विवाह-विच्छेद और सन्ततिनिरोधकी भावना, सब बातोंमें समान अधिकारकी अव्यावहारिक इच्छा और सिनेमाओंमें नाचनेका शौक है।