तलाक और सन्ततिनिरोध
विवाह-विच्छेदकी भावना ही पवित्र दाम्पत्य-प्रेमका समूल नाश करनेवाली है। जिस हिंदू-संस्कृतिमें ‘सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं’ सतीत्वका आदर्श था, जहाँ हजारों कुल-ललनाएँ पवित्र सतीत्वकी रक्षाके लिये जलती आगमें सहर्ष कूद पड़ती थीं, जहाँ दुर्दान्त रावणके चंगुलसे छूटनेकी सम्भावना होनेपर भी पुत्रके समान हनुमान्का इच्छापूर्वक स्पर्श करना सीताने अपने सतीत्वके लिये कलंक समझा था; जहाँ मृत पतिकी लाशको गोदमें रखकर देहको सहर्ष भस्म कर डालनेमें गौरव माना जाता था, वहाँकी कुलदेवियाँ आज अन्त:पुरके पर्दोंको फाड़-कर परपुरुषोंके बीचमें सभाओंमें खड़ी होकर यह कहनेमें भी नहीं हिचकतीं कि ‘सतीत्व एक कुसंस्कार है, यह पुरुषोंकी गुलामी है, इस गुलामीसे छूटनेके लिये तलाक करनेका हमें हक है।’
लगभग ८६ वर्ष पहलेकी एक सच्ची घटना है। बंगालके राजशाही जिलामें पुठिया नामक एक गाँव है। रानी शरत्सुन्दरी उसी गाँवके जमींदार योगेन्द्रनारायणकी पत्नी थी; योगेन्द्रनारायणकी मृत्यु हो गयी। रानी विदुषी थी। सोलह वर्षकी अवस्थामें कोर्ट आफ वार्ड्ससे अधिकार मिलनेपर वह जमींदारीका काम बड़ी सावधानीसे चलाने लगी। एक बार राजशाहीके कलेक्टर मि० वालेसकी पत्नी रानीके गुण सुनकर उससे मिलने आयीं। इतनी छोटी उम्रमें मुँड़ा हुआ मस्तक, मोटे कपड़े और जमीनपर कम्बलके आसनपर रानीकी तपस्विनी मूर्तिको बैठी देखकर सहृदया मिसेज वालेसका हृदय भर आया। वह स्नेहके वेगको रोक न सकीं। सरलभावसे उन्होंने कहा, ‘रानी! आपकी उम्र तो अभी बहुत छोटी है, आप विवाह क्यों नहीं कर लेतीं।’ शरत्सुन्दरीने कोई उत्तर नहीं दिया, परन्तु उसकी आँखोंसे आँसुओंकी धारा बह चली। मेम साहिबा उसे दु:खी देखकर घबड़ायीं और क्षमा माँगकर चली गयीं। रानीको बड़ा दु:ख हुआ। वह सोचने लगी कि हिन्दू-विधवा स्त्रीके लिये पुनर्विवाहकी बात सुननेसे बढ़कर और क्या पाप होगा। रानीने इसका प्रायश्चित्त करनेके लिये कई दिनोंतक निर्जल उपवास किया! कहाँ तो पतिके मर जानेपर विवाहका नाम सुननेसे हिंदू-स्त्रीका हृदय इस प्रकार पापकी भावनासे काँप उठता था, कहाँ आज जीते पतिको त्यागकर परपुरुषको वरण करनेकी घोषणा हिंदू-महिलाएँ भरी सभामें अपने मुँहसे करने लगीं!!!
इसीके साथ सन्ततिनिरोधका भी प्रश्न छिड़ा हुआ है। माना कि भारतके समान गरीब देशमें अधिक संतान माता-पिताके संतापका हेतु होती है, परंतु यह तो विधिका विधान है। पूर्वकर्म भी कोई वस्तु है, उसका फल सहज ही टल नहीं सकता। जिस जीवका जहाँ जन्म बदा है, वहाँ होगा ही, यह सिद्धान्त है; परंतु यदि कोई इसे न माने तो भी सन्ततिनिरोधका सबसे बढ़िया तरीका इन्द्रिय-संयम है। सन्ततिनिरोधकी आवश्यकता और साधन बतलानेवाली मिस सेंगर-जैसी विदेशी रमणीके सद्भावोंका अनादर न करते हुए भी यह कहना ही पड़ता है कि वे साधन भारतीय संस्कृतिके अनुसार नीति और धर्म दोनों ही दृष्टियोंसे हानिकर ही नहीं वरं बड़े पापपरिपूर्ण हैं। इस प्रकारकी सन्ततिनिरोधकी प्रणालीमें व्यभिचारकी वृद्धि और कामवासनाकी निष्कण्टक चरितार्थताकी संभावना ही प्रत्यक्षरूपसे छिपी है। महात्मा गाँधीने एक लेखमें लिखा था कि ‘इन कृत्रिम साधनोंसे ऐसे-ऐसे कुपरिणाम आये हैं जिनसे लोग बहुत कम परिचित हैं। स्कूली लड़के और लड़कियोंके गुप्त व्यभिचारने क्या तूफान मचाया है यह मैं जानता हूँ............ मैं जानता हूँ स्कूलोंमें, कॉलेजोंमें ऐसी अविवाहित जवान लड़कियाँ भी हैं जो अपनी पढ़ाईके साथ-साथ कृत्रिम सन्ततिनिग्रहका साहित्य और मासिक पत्र बड़े चावसे पढ़ती रहती हैं और कृत्रिम साधनोंको अपने पास रखती हैं। इन साधनोंको विवाहित स्त्रियोंतक ही सीमित रखना असम्भव है और विवाहकी पवित्रता तो तभी लोप हो जाती है जब कि उसके स्वाभाविक परिणाम संतानोत्पत्तिको छोड़कर महज अपनी पाशविक विषय-वासनाकी पूर्ति ही उसका सबसे बड़ा उपयोग मान लिया जाता है।’ इससे यह सिद्ध हो जाता है कि मनुष्योंके हृदयमें कृत्रिम सन्ततिनिग्रहके इस आन्दोलनसे पवित्रताके स्थानपर किस प्रकार घृणित पाशविक कामका आधिपत्य हो रहा है और किस प्रकार हमारे अपरिपक्वमति बालक और बालिकाएँ इसके शिकार होकर अपना सर्वनाश कर रहे हैं। इसी प्रकार सभी बातोंमें समानता और तलाकके आन्दोलनमें भी बहुत अंशमें इस घृणित कामकी ही प्रेरणा प्रधानरूपसे कार्य कर रही है!