वर्तमान बुरी स्थिति और उसे दूर करनेके लिये धार्मिक शिक्षा आवश्यक
(श्रीचक्रवर्ती राजगोपालाचार्यजीके दीक्षान्त भाषणसे)
[आगरा विश्वविद्यालयके उनतीसवें दीक्षान्त-समारोहमें प्रसिद्ध राजनीतिक नेता, वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध श्रीचक्रवर्ती राजगोपालाचार्य महोदयने जो महत्त्वपूर्ण भाषण दिया, उसका सार नीचे दिया जाता है। भाषण बड़ा ही महत्त्वपूर्ण तथा समयोपयोगी है। हमारी वर्तमान बुरी स्थितिका दिग्दर्शन करानेके साथ ही उसके दूर करनेके सुन्दर उपाय भी उसमें बतलाये गये हैं। हमारा देश स्वतन्त्र हो गया, शिक्षाका पर्याप्त प्रचार हो रहा है; कारखाने बन रहे हैं, सड़कों-पुलोंका भी निर्माण हो रहा है और देशके सर्वतोमुखी विकासकी बड़ी-बड़ी योजनाएँ काममें लायी जा रही हैं, परंतु देशका चारित्रिक स्तर सर्वत्र बड़ी तेजीसे गिर रहा है, यह सबसे बड़ी हानि है और वर्तमानमें हमलोग अर्थ और अधिकारके पीछे इतने पागल हो रहे हैं कि हम मानो उच्च चरित-निर्माणकी आवश्यकताको भूल ही गये हैं। इस परिस्थितिमें राजाजीका यह भाषण अत्यन्त सामयिक एवं मनन करनेयोग्य है।—सम्पादक]
परमात्माकी विस्मृति
आजके युगमें आरम्भसे अन्ततक एक यही विषय है कि हम परमपिता परमात्माको भूल गये हैं। ये शब्द प्रसिद्ध विद्वान् कार्लाइलके हैं, जो उन्होंने विज्ञान और साम्राज्यवादके विस्तारके फलस्वरूप पाश्चात्य जगत्के मानवमात्रकी धातुप्रियता तथा कलहप्रिय प्रवृत्तिसे दु:खी होकर कहे थे। साम्राज्य अब विश्वके मानचित्रसे गायब हो गये हैं और विज्ञान भी अपनी चरम सीमाको पार कर चुका है। अत: पश्चिममें एक नवीन ज्ञानज्योतिका प्रादुर्भाव हो रहा है। परंतु हम पूर्वनिवासी अब भी शासन और विधायकोंके अंदर प्रभुको विस्मृत करते जानेकी प्रवृत्ति देखते हैं, जिसकी निन्दा कार्लाइलने अपने समयमें की थी। मैं राष्ट्रीय विकासके लिये आधारभूत इस महत्त्वपूर्ण सत्यकी ओर विचारकोंका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ।
श्रेष्ठ चरित्रकी अनिवार्य आवश्यकता
चरित्रका अच्छा होना शारीरिक शक्ति एवं बुद्धिकी प्रखरतासे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। देशके अंदर शान्ति-स्थापना एवं बाहरी आक्रमणसे उसकी रक्षाके निमित्त नागरिक प्रशासन तथा सैनिक व्यवस्थाके लिये जनसमुदायमेंसे पर्याप्त संख्यामें लोगोंका शारीरिक एवं मानसिक दृष्टिसे शक्तिशाली होना आवश्यक है; किंतु देशकी उन्नति तथा चतुर्मुखी विकासके लिये जीवनके दैनिक कार्योंको मिल-जुलकर एक-दूसरेके सहयोगसे करनेवाले समस्त नागरिकोंके चरित्रका अच्छा होना नितान्त अनिवार्य है। चरित्र वह भूमि है, जहाँ अन्य सब वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं। यदि वही खराब है तो सभी कुछ खराब होगा। मनुष्यको ईमानदार, वचनका पालन करनेवाला, सबके प्रति दयालु तथा एक-दूसरेके प्रति किये गये वायदोंको निभानेवाला और अपने निजी स्वार्थोंसे अधिक दैवी गुणोंका मूल्य करनेवाला होना चाहिये।
बुरी प्रवृत्तियोंकी वृद्धि
आजके स्कूलों और कॉलेजोंमें दी जानेवाली उच्च शिक्षा भी चरित्र-निर्माणमें सहायक नहीं है। हमारे देशमें चल रही वर्तमान प्रवृत्तिको देखकर कोई भी उज्ज्वल भविष्यकी निश्चित कल्पना नहीं कर सकता। यह सत्य है कि मैं इन दिनों चिन्तायुक्त हूँ। हम अपने चारों ओर प्रत्येकको थोड़ा-सा ज्ञान और थोड़ी-सी शिक्षा प्राप्तकर येन-केन-प्रकारेण धनप्राप्तिकी इच्छा करते हुए देखते हैं। गांधीवादी सत्य-अहिंसात्मक एवं आत्मिक विकासके आन्दोलनद्वारा प्राप्त स्वतन्त्रता, सम्मान एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व वहन करनेके बाद हमें आशा रखनी चाहिये थी कि लोगोंका जीवनके प्रति दृष्टिकोण बदलेगा, किंतु आशाके विपरीत धोखा देने और झूठे बाह्य प्रदर्शनकी प्रवृत्तियोंकी वृद्धि होती दिखायी दे रही है।
छात्रोंमें कर्तव्यपालनकी भावना आवश्यक
छात्रोंमें वर्तमान समयके शिक्षित लोगोंकी अपेक्षा अधिक कर्तव्यपालनकी भावना होनी चाहिये। राष्ट्रकी स्थितिको सुधारनेके लिये छात्रोंको भौतिक प्रलोभनों एवं निजी स्वार्थोंके आकर्षणसे दूर रहना चाहिये। यदि इस सिद्धान्तको पूर्ण गम्भीरता एवं राष्ट्रके लिये जीवन-मरणके प्रश्नकी भाँति स्वीकार कर लिया गया तो यह हमारी शिक्षानीतिमें तुरंत परिवर्तन लानेका आधार बन जायगा।
मानव-सभ्यताका मूल धर्म ही है
यदि हम निष्पक्ष दृष्टिसे देखें तो यह स्पष्ट है कि कुछ त्रुटियोंके रहते हुए भी संसारमें धर्म ही मनुष्यको सदा विनाश और रोगोंके पथसे बचाता रहता है। यह तथ्य हम संसारमें मानवसमाजके सामाजिक तथा आर्थिक इतिहासको देखकर प्रमाणित कर सकते हैं कि धर्म ही मनुष्यको क्रियाशील सहयोगी जीवन बितानेके लिये प्रोत्साहित करता आया है। सम्पूर्ण मानव-सभ्यताका मूल धर्म ही है। यदि हम स्कूलों और कॉलिजोंसे धार्मिक शिक्षाको दूर कर दें तो हम सार्वजनिक चरित्रका निर्माण कदापि नहीं कर सकते। हमने अन्धविश्वासोंको धर्मकी संज्ञा देकर बालकोंके घरेलू जीवनसे भी धर्मको अलग कर दिया है—यहाँतक कि छात्रोंकी विद्यालयोंमें उपस्थितिने उनके घरोंमें मनायी जानेवाली धार्मिक क्रियाओंको सम्पादित करना भी उनके लिये असम्भव बना दिया है। इस प्रकार हमने वर्तमान शिक्षापद्धतिके कारण अपनेको धर्मके लिये एक खोखली दीवाल बना रखा है। यही दशा रही तो हम अनिवार्यरूपसे बुरे-से-बुरे होते चले जायँगे। हम यह स्वीकार तो करते हैं कि हमें युवकोंके जीवनमें पवित्रता तथा बुराईसे दूर रहनेकी भावनाका विकास करना चाहिये, परंतु इसके लिये हम किंचिन्मात्र भी प्रयत्न नहीं कर रहे हैं। हमें ऐसे साधन उपलब्ध करने होंगे कि जिनकी सहायतासे उन उद्देश्योंकी पूर्ति की जा सके।
छात्रोंके मस्तिष्कसे सर्वशक्तिमान् प्रभुकी भावना दूर करनेका हमारा प्रयास
वास्तविकता यह है कि वर्तमान शिक्षा छात्रोंके अंदर रटने तथा रटी हुई बातोंका परीक्षामें प्रदर्शन करके उपाधि प्राप्त करनेकी आदत डालती है। हमने विकासोन्मुख तरुणों और तरुणियोंके चरित्रको वर्तमान शिक्षाद्वारा खोखला बना डाला है। जब उनके चरित्रके अन्दर हमारे द्वारा प्रवेश कराया हुआ यह भयानक रोग अनुशासनहीनताके रूपमें फूट पड़ता है, तब हम उसकी निन्दा करने लगते हैं। सर्वशक्तिमान् प्रभु ही संसारपर शासन कर रहे हैं—इस विचारको क्या हम युवक और युवतियोंके मस्तिष्कसे दूर रखनेका प्रयास नहीं कर रहे हैं?
छात्रोंमें दैवी गुणोंके विकासके लिये धार्मिक शिक्षाकी अनिवार्य आवश्यकता
शिक्षाका सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य छात्रोंमें दैवी गुणों तथा कर्तव्यपरायणताका विकास करना है। धार्मिक शिक्षा इस उद्देश्यकी पूर्तिमें सहायक होगी। नवयुवकोंको बुरी बातों तथा अवांछनीय आचरणकी प्रवृत्तिसे दूर रहना सिखाना चाहिये। यदि हमने स्कूलोंमें धार्मिक शिक्षा प्रदान न की तो इन गुणोंका आविर्भाव हम नागरिकोंमें नहीं कर सकते। विभिन्न धार्मिक मान्यताओंको समाप्तकर उनके चलानेवालोंको केवल कल्पित व्यक्ति मानना विनाशकारी है। ईसा-मसीह, भगवान् बुद्ध, मुहम्मद साहब, भगवान् राम, कृष्ण आदिको यदि हम भौतिक दृष्टिकोणसे केवल कल्पित व्यक्ति ही मान लें तो ईसाई, मुस्लिम, बौद्ध तथा हिंदू-धर्मोंमें रह ही क्या जायगा।
राष्ट्रिय चरित्रका ह्रास न हो, इसके लिये हमें प्रत्येक छात्रको स्कूलमें उसके अपने पारिवारिक धर्ममें दीक्षित करना होगा। इस कार्यसे अव्यावहारिकता कहीं नहीं है। विज्ञानको संसारने एक बार विजेताके रूपमें प्रदर्शित किया था, परंतु अब वही विज्ञान धर्मका सबसे बड़ा सहयोगी है। उच्च विज्ञान भौतिकवादके दृष्टिकोणको त्यागकर अब आत्मिक विकास तथा उपनिषदोंकी भाँति देवत्वकी ओर ले जानेवाला बना रहा है, किंतु विज्ञान धार्मिक विश्वास और दैवी गुणोंके विकासमें तभी सहायक हो सकता है, जब मनुष्यको बचपनमें ही उसके अनुकूल शिक्षित किया जाय। मेरी कामना है कि हम भारतीय केवल भौतिक चमक-दमक एवं बाह्य प्रसन्नताके चक्करमें ही न पड़े रहें; परंतु यह सब बिना धर्मके नहीं हो सकता। इसलिये चरित्रवान् भारतीयोंके निर्माणके लिये स्कूलोंमें प्रत्येक लड़के और लड़कीको धार्मिक शिक्षा देना अनिवार्य होना चाहिये।