वर्तमान शिक्षा

वर्तमान शिक्षित नवयुवकोंके आचरणों और कार्योंको देखकर दु:खी हुए कितने ही सज्जनोंने मुझसे इस विषयपर कुछ लिखनेके लिये अनुरोध किया है; इनमें कई सज्जन तो स्वयं भुक्तभोगी हैं, लड़के-लड़कियोंके पढ़नेमें गाढ़ी कमाईका पैसा खर्च करके आज वे उनको दूसरे ही ढाँचेमें ढले देखकर दु:खी हो रहे हैं। अपने शिक्षित पुत्र-कन्याओंका जीवन विलासी, खर्चीला, अकर्मण्य और धर्मशून्य देखकर वे बेचारे मर्माहत होकर कई बातें पूछते हैं। उनके समाधानके लिये यथासाध्य कुछ बातें उन्हें लिख दी जाती हैं, परंतु यह रोग तो अब इतना व्यापक हो गया है कि जो छूटना असम्भव-सा जान पड़ता है। गुण-दोष सभी कार्योंमें होते हैं। इस समय इस शिक्षामें भी कुछ गुण अवश्य हैं और उनसे लाभ भी पहुँचा है, परंतु ध्यान देकर तौलनेपर लाभकी अपेक्षा हानिका ही पलड़ा अधिक नीचा दिखायी देता है। पहले तो मोहवश सोचा नहीं, परिणामपर ध्यान दिया नहीं, अब, जबकि चारों ओर इस शिक्षाके साँचेमें ढले हुए लोगोंकी संख्या बढ़ गयी और उनकी चेष्टासे जबकि चारों ओर शिक्षाकी प्रगतिके नामपर इसका विस्तार करनेवाले स्कूल-कॉलेज बढ़ गये, दृष्टिकोण बदल जानेसे लाखों नर-नारी इस शिक्षाको परम लाभकारी समझकर सम्मानकी दृष्टिसे देखने लगे, तब ध्यान देनेसे कुछ विशेष लाभकी आशा नहीं रही! अब तो इस रोगकी जड़ बहुत दूर-दूरतक फैल गयी है और जबतक इसके विषमय कुफलोंसे भलीभाँति हमारा समाज जर्जरित होकर निरुपाय हो भगवान् की शरण नहीं हो जायगा, तबतक इससे मुक्त होना बहुत ही कठिन है। विश्वविद्यालयोंके दीक्षान्त भाषणोंमें इस शिक्षापद्धतिके कुफलपर प्राय: बहुत कुछ कहा जाता है। इस पद्धतिको सत्यसे दूर, बेकारी पैदा करनेवाली, धर्महीन और विलासिताको बढ़ानेवाली बतलाया जाता है, परंतु फल कुछ नहीं होता। कारण समक्ष है, परिणाम देखकर उन लोगोंको कहना तो पड़ता है लेकिन दृष्टिकोण वही बना रहनेके कारण पुन:-पुन: विचार करनेपर भी उन्हें इसीमें लाभ दीखता है और अनेक कारणोंसे इसकी आवश्यकता भी प्रतीत होती है, अतएव कोई क्रियात्मक सुधार नहीं होता। दिनोंदिन शिक्षालयोंकी, शिक्षितोंकी और शिक्षार्थियोंकी संख्या बढ़ती जाती है और उसीके साथ-साथ समाजशरीरमें रोगके परमाणुओंका प्रवेश भी होता जाता है, परंतु उपाय कुछ भी नहीं सूझता। ऐसी हालतमें केवल शिक्षाके दोषोंपर ही आलोचना करनेसे कोई विशेष लाभ नहीं दिखलायी देता। जो लोग दृष्टिकोणके भेदसे इस शिक्षासे परम लाभ समझते हैं, उनपर भी दोष नहीं दिया जा सकता; क्योंकि वे ऐसा ही देखते हैं। न किसीको उलाहना देने या किसीका तिरस्कार करनेसे ही कोई सुफल होनेकी सम्भावना दीखती है। इतनेपर भी जो कुछ लिखा जाता है, सो केवल मित्रोंके आग्रहपूर्ण आज्ञापालन करनेके लिये ही अपने मतमें जो-जो कुछ ठीक जँचता है, लिखा जाता है। किसी व्यक्तिविशेषपर कोई आक्षेप करनेकी नीयतसे नहीं। भाषामें कहीं कटुता आ जाय तो उसके लिये पहलेहीसे मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।