वर्तमान शिक्षासे उत्पन्न दोष

आजकलके कॉलेजोंमें पढ़नेवाले अधिकांश विद्यार्थियोंमें न्यूनाधिकरूपसे—क्रियारूपमें अथवा विचाररूपमें आपको निम्नलिखित दोष प्राय: मिलेंगे, जो विद्यार्थी—ब्रह्मचारी-जीवनसे सर्वथा प्रतिकूल हैं।

१-ईश्वर और धर्ममें अविश्वास।

२-संयमका अभाव।

३-ब्रह्मचर्यका अभाव।

४-माता-पिता आदि गुरुजनोंमें अश्रद्धा।

५-प्राचीनताके प्रति विद्वेष।

६-विलासिता और फिजूलखर्ची।

७-खेती, दूकानदारी और घरेलू कलाकौशलके कार्योंके करनेमें लज्जा। और—

८-सरलताका अभाव।

इनको कुछ विस्तारसे देखिये।

१-‘ईश्वर मनुष्यकी कल्पना है।’ ‘ईश्वरकी चर्चा करना समय नष्ट करना है।’ ‘ईश्वरको किसने देखा है?’ ‘धर्म ढोंग है।’ ‘स्वार्थी मनुष्योंने भोले लोगोंको ठगनेके लिये ईश्वर और धर्मका वहम रचकर लोगोंको डरा रखा है।’ ‘धर्म एक कुसंस्कार है।’ आदि बातें आजका शिक्षित मनुष्य बड़े गर्वसे कहता है। इन विचारोंको माननेवाला होनेपर भी जो कुछ साधुहृदयका होता है और दूसरोंकी मान्यताको ठुकराकर उनके हृदयको ठेस नहीं पहुँचाना चाहता, वह बड़ी बुद्धिमानीके साथ मानो मूर्खोंको समझाता हुआ-सा कहता है—‘होगा ईश्वर, हम उसका विरोध नहीं करते। परन्तु वह किसीको दीखता थोडे़ ही है। परन्तु सारा जगत् जब ईश्वरसे पूर्ण है तब जगत‍्की सेवा ही ईश्वरकी सेवा है, अतएव भजन-पूजनमें व्यर्थ समय न बिताकर जनताकी सेवा करनी चाहिये। गीतामें भी तो सर्वभूतस्थित भगवान् को अपने कर्मोंसे पूजनेकी बात कही गयी है।’ यों समझानेवाला स्वयं तो भगवान् को नहीं मानता, परन्तु अपनी बुद्धिमानीका प्रयोग करके ईश्वरका प्रत्यक्ष खण्डन न कर परोक्षरूपसे भजन-पूजनरूपी कार्योंको व्यर्थ सिद्धकर मानो ईश्वरसम्बन्धी कुसंस्कारोंसे हमें मुक्त करनेके लिये इस युक्तिवादसे काम लेता है। वह इस बातको नहीं समझता कि सच्ची भगवदनुभूतिके बिना—जीवमें शिवके दर्शन किये बिना यथार्थ सेवा कभी बन ही नहीं सकती। जो सेवा अहंकारकी जननी है, वह तो सेवा ही नहीं है और शिव-ज्ञानशून्य सेवासे तो अहंकार ही उत्पन्न होगा। शिवहीन यज्ञका परिणाम तो सर्वध्वंस ही होगा। इस प्रकार ईश्वर और धर्मकी अवहेलना धीरे-धीरे उच्छृंखलता और यथेच्छाचारकी वृद्धि हो रही है; परंतु इसीको उन्नति समझा जाता है।

२-संयम तो किसी बातमें भी नहीं दिखायी देता। बोल-चाल, हँसी-मजाक, रहन-सहन, वेश-भूषा, खान-पान, सोना-उठना, आचार-विचार—सभीमें मनमानी होती है। शिष्टाचारका आदर नहीं। जबानपर लगाम नहीं। कुछ वर्षों पहले एक बार मैं पटनेसे स्टीमरमें आ रहा था। उसी स्टीमरमें कॉलेजके विद्यार्थियोंका एक दल सवार हुआ, कुछ नववयस्क अध्यापक भी साथ थे। वहाँ उनका जो हँसी-मजाक शुरू हुआ, वह सभ्यताकी सीमाको पार कर गया। पास ही कुछ भद्रमहिलाएँ बैठी थीं। वे लज्जासे सिकुड़ने लगीं, परंतु बाबुओंका इस ओर ध्यान ही नहीं था। मालूम होता था मानो उनके मन स्टीमरमें दूसरा कोई है ही नहीं। गंदी भाषा, गंदे इशारे, सामूहिक विकट हास्य, चिल्लाना और कुत्ते-बिल्लीकी बोली बोलना कुछ भी बाकी न रहा। एक बूढ़े मौलवी साहेबने तंग आकर जब उनको कुछ समझानेकी चेष्टा की तो उन बेचारेकी शामत आ गयी। दल-का-दल उनकी दाढ़ी, चश्मे और अचकनकी दिल्लगी उड़ाने लगा। ज्यों ही मौलवी साहेब कुछ बोलते त्यों ही हँसीका भयानक बवंडर उठता। आखिर बेचारे मौलवी साहेबको वहाँसे उठकर दूसरी ओर चले जाना पड़ा। खान-पानमें तो कोई विचार ही नहीं, कैसी ही चीज हो, किसीकी जूठन हो, जिस रकाबीमें खाँ साहेबके लिये अभी गोमांस आया, उसीमें दूसरे ही क्षण बाबूसाहेबके लिये पकौड़ियाँ आ गयीं। सोडावाटरकी बोतल तो मानो एक माँके कई बच्चोंके लिये माँका स्तन-सी ही बन गयी है। किसीकी जूठन खानेमें कोई झिझक नहीं। एक दिन मैंने एक रेलवे स्टेशनपर देखा, कुछ विद्यार्थी नवयुवक चप्पल पहने, चश्मा चढ़ाये, पंजाबी कुरतेपर जाकेट पहने, ठहाका मारते और उछलते हुए आये और एक जनाना डब्बेके सामने एक खोमचेवालेके पास खड़े होकर तरह-तरहकी गंदी बातें करने लगे, मानो उनके घर माँ-बहिन हैं ही नहीं; फिर उनमेंसे एकने खोमचेवालेसे दहीबड़े खरीदे, दूसरेने पकौड़ियाँ लीं और फिर लूटखसोट शुरू हुई। एकका जूठा दूसरेके मुँहमें ठूँसा जाने लगा। हँसीके मारे सब पसीने-पसीने हो रहे थे। इतनेमें चाय-बिस्कुट और न मालूम क्या-क्या मुसलमान खोमचेवालोंसे खरीदा गया। भक्ष्याभक्ष्यका और आचारशुद्धिका कुछ विचार ही नहीं। इस तरहकी घटनाएँ प्राय: रोज ही होती हैं।

घरमें गरीबी है, पिता बड़ी मुश्किलसे खर्च भेज पाते हैं; परंतु बात-बातमें बाबूगिरी चाहिये; और चीजोंकी बात तो दूर रही, जूतेकी भी तीन-तीन जोड़ियोंके बिना काम नहीं चलता! बाहर जानेके लिये अलग, टेनिसके लिये अलग और कमरेके लिये चट्टी अलग! कहीं भी किसी भी बातमें आत्मसंयमकी गुंजाइश नहीं। कहाँ तो गुरुकुलवासी विद्यार्थियोंके छात्रजीवनको संयमित रखनेके लिये मनु महाराज इन नियमोंका विधान करते हैं—‘ब्रह्मचारी प्रतिदिन नहाकर शुद्धभावसे देवर्षि-पितृतर्पण करे, देवताओंकी पूजा करे, सुबह-शाम हवन करे, मद्य-मांसका सेवन न करे, इत्र-फुलेल न लगावे, हार-माला आदि न पहने, रस न खाय, स्त्रीके पास न जाय, उत्तेजक वस्तु न खाय, प्राणिहिंसा न करे, तेल न लगावे, आँखोंमें सुरमा न डाले, जूते न पहने, काम, क्रोध, लोभके वश न हो, अकेला सोवे। नाचना, गाना, बजाना, जूआ आदि खेलना, कलह करना, दूसरोंकी बातें जानना, असत्य बोलना, दूसरोंका अहित करना, स्त्रियोंकी ओर देखना, उनका आलिंगन करना आदि बातोंसे बचा रहे।’ और कहाँ आज उनमें इन नियमोंके सर्वथा विपरीत सूर्योदयके बाद उठना, चाय पीकर पीछे स्नान करना, देवर्षि-पितरोंका मजाक उड़ाना, अभक्ष्य खाना, सेंट लगाना, सिनेमा देखना, गंदे उपन्यास पढ़ना आदि संयमका नाश करनेवाली बातें बढ़ी हुई हैं।

३-बड़े ही खेदकी बात है कि इस विषयमें तो आज हम सबसे बढ़कर पतित हो चले हैं। पाठ्यपुस्तकोंमें खुला शृंगार, गंदे नाटक-उपन्यासोंका पढ़ना, यौनसाहित्यका प्रचार, विलासितापूर्ण रहन-सहन, अनुभवहीन असंयमी युवक-अध्यापकोंका संग, सहशिक्षाका प्रचार, भोगोंकी लीलाभूमि पाश्चात्यपद्धतिके विद्यालय और होस्टल एवं परस्पर गंदे पत्र-व्यवहारकी कुचाल, मनमें खामखाह विकार पैदा करनेवाले चटकीले चित्रपट आदि वस्तुएँ हमारे विद्यार्थियोंके उच्छृंखल जीवनको दिनोंदिन और भी उच्छृंखल बना रही हैं। मुझे एक बहुत विश्वस्त सज्जनने बतलाया था कि शिक्षाक्षेत्रमें सबसे बढ़कर अग्रसर प्रान्तकी युनिवर्सिटीके विद्यार्थियोंमें लगभग आधेसे अधिक जननेन्द्रियसम्बन्धी रोगोंसे ग्रस्त हैं। जातीय जीवनके आधार नवयुवकोंकी यह दुर्दशा निस्सन्देह खूनके आँसू बहानेवाली है।

४-माता-पिता आदि गुरुजनोंको मूर्ख समझना, उनके कार्योंमें दोष देखना, कर्तव्यवश या अच्छा कहलानेके लिये शरीरसे उनकी कुछ सेवा करते हुए भी उनकी बुद्धिका अनादर करना आजकलके पढ़े-लिखे लोगोंका स्वभाव-सा बन गया है। घरमें जहाँ नित्य बड़े-बूढ़ोंके चरणोंमें प्रणाम करनेकी आर्यप्रथा थी, वहाँ आज उनकी संतान कहलानेमें भी किसी-किसीको लज्जाका अनुभव होता है। एक पढ़े-लिखे भाईने एक बार मुझसे कहा था कि ‘इन मूर्खोंका बेटा-पोता न होकर स्वतंत्र विचारवाले देशोंमें मेरा जन्म हुआ होता तो आज मैं कितना सौभाग्यशाली होता।’ यद्यपि ऐसे विचार बहुत ही थोड़े ही युवकोंमें होंगे। परंतु माता-पिता आदिके विचारोंमें तो श्रद्धा बहुत ही कम रह गयी है। बल्कि उनकी अवज्ञा करनेमें ही कहीं-कहीं उन्नति मानी और बतलायी जाती है। जो माता-पिता जन्म देते हैं, पालते-पोसते हैं, कष्ट उठाकर पढ़ाते हैं, उन्हींको जब पुत्र मूर्ख मानता है और उनके विचारों एवं वचनोंका अनादर कर उन्हें संताप पहुँचाता है, तब उन माता-पिताके हृदयोंमें कैसी मर्मभेदी व्यथा होती है, इसका अनुमान उन पुत्रोंको कभी नहीं हो सकता। मेरे सामने एक बार एक पिताने जब रो-रोकर अपना दु:ख सुनाया था तब मेरी आँखोंमें भी आँसू आ गये थे।

५-एक बार एक मेरे नवयुवक मित्रने कहा था कि हम तो पुराने मात्रका ध्वंस करके सब कुछ नवीन निर्माण करना चाहते हैं। वेद-पुराण, कुरान-बाइबिल किसीको भी हम नहीं मानते। ऐसी मनोभावना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षरूपसे नवयुवकोंके हृदयोंमें उत्पन्न होने लगी है। इसीसे वे सुधारके नामपर संहार करना चाहते हैं। प्राचीनताके प्रति ऐसा अविवेकमूलक विद्वेष और नवीनताका यह प्रबल आकर्षण इस शिक्षाका ही फल है।

६-कॉलेजके पढ़नेवाले विद्यार्थीका औसतन मासिक खर्च आजकल लगभग ५०.०० रु० माना जाता है। बम्बई-सरीखी जगहोंमें इससे कहीं अधिककी आवश्यकता होती है। कॉलेज और उनके छात्रावासोंका निर्माण ही इस ढंगसे हुआ है—उनकी पद्धति और आदर्श ही इतना खर्चीला है कि जहाँ इससे कम खर्चमें रहना विद्यार्थी अपनी बेइज्जती समझता है। इनमें फैशन तो इतना बढ़ जाता है कि जितना खर्च उनके फैशनमें होता है, उतनेमें दो-तीन गरीब गृहस्थोंका गुजर हो सकता है। तरह-तरहके जूते, जूते रँगनेकी स्याही, विलायती दन्तमंजन, आइना, कंघी, ब्रश, रिष्टवाच,—क्रिकेटके लिये फलालैनका सूट, टेनिसके लिये पतलून और ब्लेजर, होटलोंका जलपान, सैलूनोंकी हजामत, कम्पनियोंकी कपड़ा धुलाई, नये-नये नावेल, दोस्तोंको दावत, प्रेमियोंको प्रेमोपहार, सिनेमा, मैच आदि-आदि न मालूम कितनी फैशनकी आवश्यकताओंको पूर्ण करनेमें उन्हें आँख मूँदकर धन खर्च करना पड़ता है। विद्यार्थियोंके गरीब माता-पिता गहने बेचकर, घर-द्वार बंधक रखकर, भीख माँगकर बड़ी आशासे बच्चोंको पढ़ानेके लिये खर्चका यह भारी बोझ उठाते हैं। परंतु वहाँ एक-दूसरेकी देखा-देखी कॉलेजके विद्यार्थीको इस बातकी चिन्ता ही नहीं होती कि घरमें माता-पिताका क्या हालत है। कभी छुट्टियोंमें घर आना होता है तो विवाहित युवक बीबियोंके लिये तरह-तरहके शौकके सामान लाना चाहते हैं, उसके लिये माता-पिताको अलग तंग होना पड़ता है। पुत्र नाराज न हो, उसके मनमें दु:ख होगा तो वह फेल हो जायगा, इस डरसे माता-पिता जहरकी घूँट पी जाते हैं, परंतु घर आये हुए पुत्रके सामने अपना दु:ख कभी प्रकट नहीं करते। घर आकर कॉलेजके विद्यार्थी घर-गृहस्थीकी तो बात ही क्यों पूछने लगे? क्यों वे घरके मोटे-सोटे काममें मन लगाकर माता-पिताको सहायता देने लगे? मित्रोंसे मिलना-जुलना, हँसी-मजाक, प्रेमपत्र, ताश-शतरंज, कलेवा-जलपान आदिमें ही उनका समय बीत जाता है। माता-पिता इसी आशापर यह सब सह लेते हैं कि बेटा पास होकर हमें कमाकर देगा। गाँवके उन गरीब माता-पिताको क्या पता कि अभी जिस बेटेको पढ़ानेकी नीयतसे उसकी उचित-अनुचित माँगका कुछ भी विचार न करते हुए ही हृदयका खून दे-देकर खर्च जुटाकर भेजते हो, वही जब पढ़कर—पास होकर आवेगा, तब तुमलोगोंको मूर्ख समझेगा और यदि कहीं नौकरी न लगी तो परिवारभरको और भी मुश्किलमें पड़ना होगा।

गरीबका गुजर ऐसी अर्थनाशक शिक्षासे कैसे होगा, भगवान् ही जाने।

७-मैंने देखा है परीक्षोत्तीर्ण लड़के घरकी खेतीका काम नहीं कर सकते, वे दुकानदारी नहीं कर सकते। सुनार, कुम्हार या चमारका पढ़ा-लिखा लड़का अपने घरकी कारीगरीका काम करनेमें अपनी तौहीनी समझता है। ऑफिसकी नौकरीके सिवा वे सभी कामोंमें प्राय: असमर्थ हो जाते हैं। झूठे आत्माभिमानके वश होकर अपना काम अपने हाथों करनेमें उन्हें शरम मालूम होती है। बाजारसे दो-चार सेर चीज खरीदकर लानेमें उन्हें कुलीकी जरूरत होती है। बोझ लाना उन्हें अपनी शानके खिलाफ जँचता है। घरमें झाड़ू देना, कपड़े धोना आदि कार्य करनेमें तो लाज मानो मूर्तिमान् होकर खड़ी हो जाती है। घरका काम तो अलग रहा कई लोगोंको तो असभ्य-से लगनेवाले माता-पिता और बहिन-भाइयोंके साथ रहनातक बुरा मालूम होता है! सच पूछिये तो इसी कारण आजकल बेकारी भी ज्यादा बढ़ रही है। सभीको नौकरी चाहिये। झूठी इज्जतके मोहमें खर्च बढ़ा ही रहता है। परिणाममें आत्महत्याकी नौबत आती है। किसी कारीगर या मजदूरने आत्महत्या की हो ऐसी बात शायद नहीं सुननेमें आती। आत्महत्या बेकार बाबू ही करते हैं, जो नौकरी और वकीली आदिके सिवा अन्य काम नहीं कर सकते। उनको हेय दृष्टिसे देखते हैं। इस मनोभावनाको लिये हर साल विश्वविद्यालयोंसे हजारों विद्यार्थियोंका पास होकर निकलते रहना भविष्यमें बेकारीका कैसा भयंकर रूप सामने लावेगा और उसका परिणाम कितना भयंकर होगा, यह कौन कह सकता है?

८-हमारे बड़े-बूढ़ोंमें जितना निष्कपट भाव है, हमलोगोंमें उतनी ही कपट-चातुुरी आ गयी है। पुराने लोग शत्रुको शत्रु कहेंगे और मित्रको मित्र, परंतु आज ऊपरसे मित्र कहते रहकर भी भीतरसे हम शत्रुताका बर्ताव करेंगे। कपटपूर्ण मैत्री, मधुर वचनोंके पीछे छिपी हुई कठोरता आजकी सभ्यताका एक अंग-सी बन गयी है। सरलताका नाम आज मूर्खता है और मक्‍कारीका बुद्धिमत्ता।