भगवान् प्रेमके भूखे हैं

उपनिषदोंमें आता है कि ‘एकाकी न रमते’। इसका सीधी-सादी भाषामें अर्थ होता है कि भगवान‍्का अकेलेमें मन नहीं लगा। इसलिये उन्होंने सृष्टिकी रचना की। ‘मैं एक ही बहुत रूपोंसे हो जाऊँ’—ऐसे संकल्पसे भगवान‍्ने मनुष्योंका निर्माण किया। इसका तात्पर्य यह दीखता है कि मनुष्योंका निर्माण भगवान‍्ने केवल अपने लिये किया है। संसारकी रचना चाहे मनुष्यके लिये की हो, पर मनुष्यकी रचना तो केवल अपने लिये की है। इसका क्या पता? भगवान‍्ने मनुष्यको ऐसी योग्यता दी है, जिससे वह तत्त्वज्ञानको प्राप्त करके मुक्त हो सकता है; भक्त हो सकता है; संसारकी सेवा भी कर सकता है और भगवान‍्की सेवा भी कर सकता है। यह संसारकी आवश्यकताकी पूर्ति भी कर सके और भगवान‍्की भूख भी मिटा सके, भगवान‍्को भी निहाल कर सके—ऐसी सामर्थ्य भगवान‍्ने मनुष्यको दी है! और किसीको भी ऐसी योग्यता नहीं दी, देवताओंको भी नहीं दी। भगवान‍्को भूख किस बातकी है? भगवान‍्को प्रेमकी भूख है। प्रेम भगवान‍्को प्रिय लगता है। प्रेम एक ऐसी विलक्षण चीज है, जिसकी आवश्यकता सबको रहती है।

एक आसक्ति होती है और एक प्रेम होता है। किसीसे हम अपने लिये स्नेह करते हैं, वह ‘आसक्ति’ होती है, राग होता है। रागसे ही कामना, इच्छा, वासना होती है, जो पतन करनेवाली, नरकोंमें ले जानेवाली है। जिसमें दूसरोंको सुख देनेका भाव होता है, वह ‘प्रेम’ होता है। आसक्तिमें लेना होता है और प्रेममें दूसरोंको देना होता है। दूसरोंको सुख देनेकी ताकत मनुष्यमें है। भगवान‍्ने मनुष्यको इतनी ताकत दी है कि वह दुनियामात्रका हित कर सकता है और अपना कल्याण कर सकता है। इतना ही नहीं, मनुष्य भगवान‍्की आवश्यकताकी पूर्ति भी कर सकता है, भगवान‍्के माँ-बाप भी बन सकता है, भगवान‍्का गुरु भी बन सकता है, भगवान‍्का मित्र भी बन सकता है और भगवान‍्का इष्ट भी बन सकता है! अर्जुनको भगवान् कहते हैं—‘इष्टोऽसि मे दृढमिति’ (गीता १८। ६४)।

जैसे लड़का अलग हो जाय तो माँ-बाप चाहते हैं कि वह हमारे पास आ जाय, ऐसे ही यह जीव भगवान‍्से अलग हो गया है, इसलिये भगवान‍्को भूख है कि यह मेरी तरफ आ जाय! इस भूखकी पूर्ति मनुष्य ही कर सकता है, दूसरा कोई नहीं। मनुष्य ही भगवान‍्से प्रेम कर सकता है। देवता तो भोगोंमें लगे हैं, नारकीय जीव बेचारे दु:ख पा रहे हैं, चौरासी लाख योनियोंवाले जीवोंको पता ही नहीं कि क्या करें और क्या नहीं करें? इतना ऊँचा अधिकार प्राप्त करके भी मनुष्य दु:ख पाता है तो बड़े भारी आश्चर्यकी बात है! होश ही नहीं है कि मेरेमें कितनी योग्यता है और भगवान‍्ने मेरेको कितना अधिकार दिया है! मैं कितना ऊँचा बन सकता हूँ, यहाँतक कि भगवान‍्का भी मुकुटमणि बन सकता हूँ! आप कृपा करके ध्यान दो कि कितनी विलक्षण बात है! जितने भक्त हुए हैं मनुष्योंमें ही हुए हैं और इतने ऊँचे दर्जेके हुए हैं कि भगवान् भी उनका आदर करते हैं! लोग संसारके आदरको ही बड़ा समझते हैं, पर भक्तोंका आदर भगवान् करते हैं, कितनी विलक्षण बात है! सारथि बन जायँ भगवान्! नौकर बन जायँ भगवान्! जूठन उठायें भगवान्! घरका काम-धंधा करें भगवान्! जिस तरहसे माता अपने बच्चेका पालन करके प्रसन्न होती है, इसी तरहसे भगवान् भी अपने भक्तका काम करके प्रसन्न होते हैं।

भगवान‍्का भक्तोंके प्रति एक वात्सल्य भाव रहता है। जैसे, चारेमें गोमूत्र या गोबरकी गंध भी आ जाय तो गाय वह चारा नहीं चरती। परंतु अपने नवजात बछड़ेको जीभसे चाटकर साफ कर देती है। वास्तवमें वह बछड़ेको साफ करनेके लिये ही नहीं चाटती, इसमें उसे खुदको एक आनन्द आता है। उसके आनन्दकी पहचान यह है कि अगर आप बछड़ेको धोकर साफ कर दोगे तो गायका दूध कम होगा और अगर गाय बछड़ेको चाटकर साफ करे तो उसका दूध ज्यादा होगा। गायकी जीभ इतनी कड़ी होती है कि चाटते-चाटते बछड़ेकी चमड़ीसे खून आ जाता है, फिर भी गाय छोड़ती नहीं; क्योंकि उसको एक आनन्द आता है। वात्सल्य प्रेममें गाय सब कुछ भूल जाती है। ‘वत्स’ नाम बछड़ेका है और बछड़ेसे होनेवाला प्रेम ‘वात्सल्य प्रेम’ कहलाता है।

भगवान‍्को भक्तका काम करनेमें आनन्द आता है, प्रसन्नता होती है। मनुष्य भगवान‍्की इच्छाकी पूर्ति कर सकता है, इतनी इसमें योग्यता है! परंतु यह दर-दर भटकता फिरता है—तुच्छ टुकड़ोंके लिये, पैसोंके लिये, भोगोंके लिये ! राम-राम-राम! किधर चला गया तू! भगवान‍्को आनन्द देनेवाला होकर अपने सुखके लिये भटकता है और लालायित होता है! भगवान् भक्तका काम करनेके लिये अपयश सह लेते हैं, तिरस्कार सह लेते हैं, अपमान सह लेते हैं! भगवान‍्ने भक्तको बहुत ऊँचा दर्जा दिया है।

भगवान् कहते हैं—‘अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।’ (भागवत ९।४। ६३)। ‘मैं तो हूँ भगतनको दास, भगत मेरे मुकुटमणि।’ जिनकी स्फुरणामात्रसे अनन्त ब्रह्माण्डोंकी रचना हो जाती है, ऐसे परमात्मा भक्तके वशमें हो जाते हैं और उसके इशारेपर नाचनेके लिये तैयार हो जाते हैं—‘ताहि अहीरकी छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावें।’ नौ लाख गायें नंदजीके यहाँ दुही जाती थीं, पर गोपियोंपर भगवान‍्का इतना प्रेम था कि वे कहतीं—‘लाला, तुम नाचो तो तुम्हें छाछ देंगी’ तो वे छाछके लिये नाचने लग जाते! हृदयका प्रेम भगवान‍्को बहुत मीठा लगता है। भगवान‍्से कोई कामना नहीं, कोई इच्छा नहीं, केवल भगवान् प्यारे, लगें मीठे लगें—यह भक्तोंका भाव होता है। यह जो प्रेम है, वह दोनोंको भाता है अर्थात् भक्त भगवान‍्से आनन्दित होते हैं और भगवान् भक्तसे। भगवान् और भक्त आपसमें एक-दूसरेको देखकर आनन्दित होते रहते हैं। इतनी योग्यता रहते हुए भी मनुष्य दरिद्री हो रहा है, अभावग्रस्त हो रहा है, यह बड़े भारी आश्चर्यकी बात है! होशमें नहीं आता कि मैं किस दर्जेका हूँ और क्या कर रहा हूँ? तुच्छ चीजोंके पीछे पड़कर यह अपना कितना नुकसान कर रहा है! झूठ, कपट, बेईमानी आदि करके महान् नरकोंमें जानेकी तैयारी कर रहा है। जिसमें यह भगवान‍्की प्राप्ति कर सकता है, उस अमूल्य समयको बर्बाद कर रहा है। हद हो गयी! अब तो चेत करो? जो समय गया, सो तो गया, अब भी लग जाओ भगवान् में! संसारके कामको अपना काम न समझकर भगवान‍्का समझ लो, इतनेसे ही भगवान् प्रसन्न हो जायँगे।