धनके लोभमें निंदा
भीतरकी जो भावना होती है, उसका बड़ा भारी माहात्म्य होता है। एक आदमी बाहरकी क्रिया करता है, शरीरसे सेवा करता है, इसकी अपेक्षा भी भीतरका जो भाव है, उसकी अधिक महिमा है। बड़े दु:खकी बात है कि मनुष्योंने अपने भीतर धनको बहुत ज्यादा महत्त्व दे रखा है। वास्तवमें यह इतना महत्त्व देनेके लायक वस्तु नहीं है। शरीर इसकी अपेक्षा बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस शरीरसे परिश्रम करके जो सेवा की जा सकती है, वह रुपयोंसे नहीं की जा सकती। रुपये लगा देनेका वह माहात्म्य नहीं है। परंतु आज रुपयोंका बहुत लोभ है। शरीरसे परिश्रम कर लेंगे, भूखे रह जायँगे, कहीं जाना हो तो पैदल चले जायँगे, पर पैसा खर्च नहीं करेंगे! पैसेकी कीमत बहुत ज्यादा कर दी! पैसोंको शरीरसे भी अधिक महत्त्व दे दिया! शरीरसे परिश्रम करके पैसे पैदा किये जा सकते हैं, पर पैसोंसे शरीर नहीं लिया जा सकता। लाख, दस लाख, पचास लाख रुपये दे दिये जायँ, तो भी उसके बदलेमें मनुष्य-शरीर नहीं मिल सकता। मृत्युके समय अरबों-खरबों रुपये भी दे दिये जायँ तो भी मृत्युसे बच नहीं सकते। दुनियामात्रका सारा धन दे दिया जाय, तो भी एक घड़ीभर जीना नहीं मिल सकता—ऐसा कीमती मानव-शरीरका समय है! वह समय यों ही बर्बाद कर देते हैं—इसके समान कोई नुकसान नहीं है। बीड़ी-सिगरेट पीनेमें, खेल-तमाशा देखनेमें, ताश-चौपड़ खेलनेमें, बातचीत करनेमें, गपशप लड़ानेमें, दूसरोंकी चर्चा करनेमें, निंदा-स्तुति करनेमें, अधिक नींद लेनेमें समय खर्च कर देते हैं, यह बड़ा भारी नुकसान करते हैं। यह कोई मामूली नुकसान नहीं है। दस-बीस हजार रुपये खर्च किये जायँ, तो इसमें कोई नुकसान नहीं है। इनको छोड़कर ही मरना है। लाखों-करोड़ों हो जायँ तो भी छोड़कर मरना होगा। किसीको कुछ दे दिया, कहीं अच्छे काममें खर्च कर दिया, तो क्या बड़ी बात हुई? यह तो छूटनेवाली वस्तु ही है।
किसीके पास धन बहुत है तो यह कोई विशेष भगवत्कृपाकी बात नहीं है। ये धन आदि वस्तुएँ तो पापीको भी मिल जाती हैं—‘सुत दारा अरु लक्ष्मी पापी के भी होय।’ इनके मिलनेमें कोई विलक्षण बात नहीं है। एक राजा थे। उस राजाकी साधु-वेशमें बड़ी निष्ठा थी। यह निष्ठा किसी-किसीमें ही होती है। वह राजा साधु-संतोंको देखकर बहुत राजी होता। साधु-वेशमें कोई आ जाय, कैसा भी आ जाय, उसका बड़ा आदर करता, बहुत सेवा करता। कहीं सुन लेता कि अमुक तरफसे संत आ रहे हैं तो पैदल जाता और उनको ले आता, महलोंमें रखता और खूब सेवा करता। साधु जो माँगे, वही दे देता। उसकी ऐसी प्रसिद्धि हो गयी। पड़ोस-देशमें एक दूसरा राजा था, उसने यह बात सुन रखी थी। उसके मनमें ऐसा विचार आया कि यह राजा बड़ा मूर्ख है, इसको साधु बनकर कोई भी ठग ले। उसने एक बहुरुपियेको बुलाकर कहा कि तुम उस राजाके यहाँ साधु बनकर जाओ। वह तुम्हारे साथ जो-जो बर्ताव करे, वह आकर मेरेसे कहना। बहुरुपिया भी बहुत चतुर था। वह साधु बनकर वहाँ गया। वहाँके राजाने जब यह सुना कि अमुक रास्तेसे एक साधु आ रहा है, तो वह उसके सामने गया और उसको बड़े आदर-सत्कारसे अपने महलमें ले आया, अपने हाथोंसे उसकी खूब सेवा की।
एक दिन राजाने उस साधुसे कहा कि ‘महाराज, कुछ सुनाओ।’ साधुने कहा कि ‘राजन्’ आप तो बड़े भाग्यशाली हो कि आपको इतना बड़ा राज्य मिला है, धन मिला है। आपके पास इतनी बड़ी फौज है। आपकी स्त्री, पुत्र, नौकर आदि सभी आपके अनुकूल हैं। इसलिये भगवान्की आपपर बड़ी कृपा है! इस प्रकार उस साधुने कई बातें कहीं। राजाने चुप करके सुन लीं। दो-तीन दिन रहनेके बाद वह साधु (बहुरुपिया) बोला कि ‘राजन्, अब तो हम जायँगे।’ राजा बोला—‘अच्छा महाराज, जैसी आपकी मर्जी।’ राजाने उसके आगे खजाना खोल दिया और कहा कि इसमेंसे आपको जो सोना-चाँदी, माणिक-मोती, रुपये-पैसे चाहिये, खूब ले लीजिये। उस साधुने वहाँसे अच्छा-अच्छा माल ले लिया और ऊँटपर लाद दिया। जब वह रवाना होने लगा, तब राजाने कहा कि ‘महाराज, यह तो आपने अपनी तरफसे लिया है। एक चाँदीका बक्सा है, वह मैं अपनी तरफसे देता हूँ।’ राजाने एक चाँदीके बक्सेको एक रेशमी जरीदार कपड़ेमें लपेटकर उसको दे दिया और कहा कि ‘यह मेरी तरफसे आपको भेंट है।’ उस साधुने वह बक्सा ले लिया और वहाँसे चल दिया।
वह साधु (बहुरुपिया) अपने राजाके पास पहुँचा। राजाने पूछा कि ‘क्या-क्या लाये?’ उसने सब बता दिया कि ‘लाखों-करोड़ोंका धन ले आया हूँ।’ राजाने समझा कि यह पड़ोसका राजा महान् मूर्ख ही है; क्योंकि इसको साधुकी पहचान ही नहीं है कि कैसा साधु है! यह तो बड़ा बेसमझ है! वह बहुरुपिया बोला कि ‘एक बक्सा मुझे उस राजाने अपनी तरफसे दिया है कि यह मेरी तरफसे भेंट है।’ राजाने कहा कि ‘ठीक है, बक्सा लाओ, उसको मैं देखूँगा।’ उसने वह बक्सा राजाके पास रख दिया और उसकी चाबी दे दी। राजाने खोलकर देखा कि चाँदीका एक बक्सा है, उसके भीतर एक और चाँदीका बक्सा है, फिर उसके भीतर एक और चाँदीका छोटा बक्सा है। तीनों बक्सोंको खोलकर देखा तो भीतरके छोटे बक्सेमें एक फूटी कौड़ी पड़ी मिली। राजाने सोचा कि क्या मतलब है इसका! तो वह समझ गया कि यह राजा मूर्ख नहीं है, बड़ा बुद्धिमान् है। साधु-वेशमें इसकी निष्ठा आदरणीय है। राजाने बहुरुपियेसे पूछा कि ‘तुमसे क्या बात हुई, सारी बात बताओ।’ उसने कहा कि ‘एक दिन उस राजाने मेरेसे कहा कि महाराज, कुछ सुनाओ। मैंने कहा कि तुम तो बड़े भाग्यशाली हो। तुम्हारे पास राज्य है, धन-सम्पत्ति है, अनुकूल स्त्री-पुत्र आदि हैं, तुम्हारेपर भगवान्की बड़ी कृपा है।’ यह सुनकर राजा सारी बात समझ गया। तीन बक्से होनेका मतलब था—स्थूलशरीर, सूक्ष्मशरीर और कारणशरीर। इनके भीतर क्या है! भीतर तो फूटी कौड़ी है, कुछ नहीं है। बाहरसे वेश-भूषा बड़ी अच्छी है, बाहरसे बड़े अच्छे लगते हैं, पर भीतर कुछ नहीं है। आपपर भगवान्की बड़ी कृपा है—यह जो बात कही, यह फूटी कौड़ी है। यह कोई कृपा हुआ करती है? कृपा तो यह होती है कि भगवान्का भजन करे, भगवान्में लग जाय।
तात्पर्य यह है कि सांसारिक चीजोंका होना कोई बड़ी बात नहीं है। शास्त्रमें मनुष्य-शरीरकी जो महिमा आयी है, वैसी धनकी महिमा नहीं आयी है, राज्यकी महिमा नहीं आयी है। स्वर्गका जो राजा है, उस इन्द्रकी भी महिमा नहीं आयी है। ‘तीन टूक कौपीन के, अरु भाजी बिन नौन। तुलसी रघुबर उर बसे, इन्द्र बापुरो कौन॥ ’ भगवद्भजनके सामने इन्द्रकी भी कोई कीमत नहीं है। परंतु धनको महत्त्व देकर डरते हैं कि यह कहीं खर्च न हो जाय—यह कोई मनुष्यपना है? पर कहें किसको! कोई सुननेवाला नहीं है।
सुना था कि लोग ये बातें सुनकर नाराज हो जाते हैं और कहते हैं कि यह धनकी निंदा करता है। सज्जनो! मैं धनकी निंदा नहीं करता हूँ; किन्तु लोभकी निंदा करता हूँ, तुम्हारी ऐसी बुद्धिकी निंदा करता हूँ कि तुम्हारी बुद्धि कहाँ मारी गयी! लाखों-करोड़ों रुपये रखो, राज्य-वैभव सब रखो, पर बुद्धि तो नहीं मारी जानी चाहिये! कुछ तो होश होना चाहिये आदमीको! कुछ तो अक्ल आनी चाहिये कि हम क्या कर रहे हैं! ऐसा मनुष्य-शरीर मिला है, जो देवताओंको भी दुर्लभ है—‘दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुर:।’(भागवत ११। २। २९),‘बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥ ’(मानस ७। ४३। ४)। ऐसा मानव-शरीर मिला है, और कर क्या रहे हो? इस मनुष्य-शरीरको पाकर तो भगवान्का भजन करना चाहिये—‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥ ’(गीता ९।३३)। भगवान्में लगना चाहिये, जिससे सदाके लिये कल्याण हो जाय।
यह धन कितने दिन साथ देगा? आप सोचो, अगर आज प्राण निकल जायँ तो धनका क्या होगा? धनके लिये किया हुआ पाप तो साथ चलेगा, पर धन एक कौड़ी साथ नहीं चलेगा, पूरा-का-पूरा यहाँ रह जायगा। ऐसे धनके लिये अपना भाव बिगाड़ लिया, पाप कर लिया, अन्याय कर लिया, झूठ-कपट कर लिया, भाई-बन्धुओंसे लड़ाई कर ली। इस प्रकार धनके लिये कितने-कितने अन्याय और अनर्थ कर लिये, उस धनसे पतनके सिवाय और क्या होगा?