दृढ़ निश्चयकी महिमा
मैंने संतोंसे सुना है कि ‘परमात्मा हैं’—ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाय तो अपने-आपको जनानेकी जिम्मेदारी भगवान् पर आ जाती है। हम भगवान्को अपने उद्योगसे नहीं जान सकते, पर ‘भगवान् सब जगह हैं’—यह दृढ़ भाव होनेपर भगवान् खुद अपने-आपको जना देते हैं।
भगवान् सब जगह हैं—यह बात हमें जँची हुई है ही, फिर इसमें कमी क्या है? इसमें एक बातकी कमी है कि हम जानते हैं कि यह संसार पहले ऐसा नहीं था और फिर ऐसा नहीं रहेगा तथा अभी भी हरदम बदल रहा है, फिर भी संसारको ‘है’ मान लेते हैं अर्थात् अपने इस अनुभवका निरादर करते हैं। इस कारण ‘परमात्मा हैं’—इस मान्यताकी दृढ़तामें कमी आ रही है। इसलिये अपने अनुभवका आदर करें।
जैसे, जबतक नींद नहीं आती, तबतक स्वप्न नहीं आता और नींद खुलनेके बाद भी स्वप्न नहीं रहता, बीचमें (नींदमें) स्वप्न आता है। बीचमें भी आप उसको सच्चा मान लेते हो, नहीं तो वह है ही नहीं। इसी तरह संसारको मान लें कि यह संसार, शरीर पहले भी नहीं थे, पीछे भी नहीं रहेंगे, बीचमें भी केवल दीखते हैं, वास्तवमें हैं नहीं। अब कोई कहे कि संसार, शरीर आदि प्रत्यक्ष दीखते हैं, इनको ‘नहीं’ कैसे मानें? तो भाई! स्वप्न दीखनेमें कम सच्चा थोड़े-ही दीखता था। जब दीखता था, तब ठीक सच्चा ही दीखता था। परंतु जगनेपर स्वप्न नहीं दीखता। इससे सिद्ध हुआ कि वह था ही नहीं। आजसे सौ वर्ष पहले ये शरीर थे क्या? और सौ वर्षके बाद ये शरीर रहेंगे क्या? हरेक आदमी मान लेगा कि बिलकुल नहीं रहेंगे। ‘आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा’ अर्थात् जो आदि और अन्तमें नहीं होता, वह वर्तमानमें भी नहीं होता। इस दृष्टिसे यह सब-का-सब निरन्तर ‘नहीं’ में भरती हो रहा है। जितनी उम्र बीत गयी, उतनी तो ‘नहीं’ में भरती हो ही गयी। अब जितनी उम्र बाकी रही, वह भी प्रतिक्षण ‘नहीं’ में भरती हो रही है। यह सब संसार प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है। जितना जन्म है, वह प्रतिक्षण मृत्युमें जा रहा है। जितना सर्ग है, वह प्रतिक्षण प्रलयमें जा रहा है। जितना महासर्ग है, वह प्रतिक्षण महाप्रलयमें जा रहा है।
इस संसारको नाशवान् कहते हैं। जैसे धनके कारण मनुष्य धनवान् कहलाता है। अगर धन नहीं हो तो वह धनवान् नहीं कहलाता, ऐसे ही संसार नाशवान् कहलाता है, तो इसमें नाशके सिवाय कुछ नहीं है, नाश-ही-नाश है। अगर ‘परमात्मा हैं’—यह दृढ़ निश्चय हो जाय तो जो ‘नहीं’ को ‘है’ माना है, वह आड़ हट जायगी और परमात्मा प्रकट हो जायँगे! कारण कि परमात्मा तो हैं ही, उनका कभी अभाव नहीं होता। परमात्मा सब जगह होनेसे यहाँ भी हैं, सब समयमें होनेसे अभी भी हैं, सबमें होनेसे अपनेमें भी हैं और सबके होनेसे हमारे भी हैं। उनका अभाव कभी हो नहीं सकता, कभी हुआ नहीं, जब कि संसारमात्रका अभाव प्रतिक्षण हो रहा है। दो ही तो चीजें हैं—परमात्मा और संसार। परमात्माका तो अभाव नहीं हो सकता और संसारका भाव नहीं हो सकता—ऐसा यथार्थ दृष्टिसे दृढ़तापूर्वक जानते ही संसारकी जगह परमात्मा दीखने लग जायँगे। अभी भी परमात्मा ही दीखते हैं; क्योंकि संसारकी तो सत्ता ही नहीं है। परमात्माकी सत्तासे ही यह संसार सत्य क्यों दीख रहा है। इसमें सत्य तो एक परमात्मा ही हैं। तो फिर यह संसार सत्य क्यों दीखता है? ‘जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥ ’ (मानस १। ११७। ४)। मूर्खतासे ही यह संसार सत्य दीखता है। जो जानता है, पर मानता नहीं, उसे मूर्ख कहते हैं। जानता है कि यह संसार नाशवान् है फिर भी इसको स्थिर मानता है—यही मूर्खता है। हम जितना जानते हैं, उतना मान लें तो मूर्खता नहीं रहेगी और हम निहाल हो जायँगे।
परमात्माको तो मान लें और संसारको जान लें। परमात्माको कैसे मानें? कि परमात्मा तो हैं; और संसारको कैसे जानें? कि संसार नहीं है। संसारको ठीक जान लेने पर परमात्मा प्रकट हो जाते हैं। ‘यह बात ठीक दीखती है, तो फिर जँचती क्यों नहीं?’ इसमें कारण यह है कि संसारसे सुख लेते हो। जबतक सांसारिक सुखका लोभ रहेगा, तबतक यह ‘संसार नाशवान् है, असत्य है’—ऐसा कहनेपर भी दीखेगा नहीं।
काला भौंरा बाँसमें छेद करके रहता है। बाँस कितना कड़ा होता है, पर भौंरेके दाँत इतने कठोर होते हैं कि उसमें भी गोल-गोल छेद कर देता है! परंतु जब वह कमलके भीतर बैठता है, तब रातमें कमलके बन्द होनेपर भी वह उसे काटकर बाहर नहीं जाता। वह सोचता है कि रात चली जायगी, प्रभात हो जायगा, सूर्यका उदय हो जायगा, तब कमल खिल जायगा और उस समय मैं उड़ जाऊँगा। वह बाँसमें छेद कर देता है, पर कमलकी पंखुड़ी उससे नहीं कटती। क्या वह इतना कमजोर है? वह उस कमलसे सुख लेता है, इसलिये कमजोर हो जाता है! ऐसे ही यह मनुष्य संसारसे सुख लेता है, इसलिये यह कमजोर हो जाता है। बीकानेरकी बोलीमें एक बात आती है—‘रांडरा काचा’ अर्थात् स्त्रीके आगे बिलकुल कच्चा, स्त्रीका गुलाम। इस संसाररूपी स्त्रीके आगे यह मनुष्य कच्चा, कमजोर हो जाता है। कच्चापन क्या है? संसारसे सुख लेता है, यही कच्चापन है। इस कच्चापनको दूर करना है।
‘परमात्मा हैं’—यह तो मान्यता है और ‘संसार नाशवान् है’—यह प्रत्यक्ष है। संसारको ठीक जान लो तो परमात्मा प्रकट हो जायँगे, इतनी-सी बात है। थोड़ी देर बैठकर इस बातको जमा लो कि बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे सब जगह परमात्मा ही हैं। जैसे समुद्रमें गोता लगानेपर चारों तरफ जल-ही-जल है, ऐसे ही सब जगह परमात्मा-ही-परमात्मा हैं। संसार तो बेचारा यों ही नष्ट हो रहा है!
श्रोता—संसारका सुख लेना कैसे मिटे?
स्वामीजी—इसको अपनी कच्चाई समझें, तो यह मिट जायगा। इसको तो आप मिटायेंगे, तभी मिटेगा। दूसरा नहीं मिटा सकता। अत: आप अपना पूरा बल लगायें। फिर भी न मिटे तो ‘हे नाथ! हे नाथ!’ कहकर भगवान्को पुकारें। यह नियम है कि जब आदमी निर्बल हो जाता है, तब वह सबलका सहारा लेता ही है। एक तो सांसारिक सुखासक्तिको मिटानेकी चाहना नहीं है और एक हम उसको मिटाते नहीं हैं, ये दो बाधाएँ हैं। ये दोनों बाधाएँ हट जायँ, फिर भी सुखासक्ति न मिटे तो उस समय आप स्वत: परमात्माको पुकार उठोगे। बालककी भी मनचाही नहीं होती तो वह रो पड़ता है और रोनेसे सब काम हो जाता है। ऐसे ही सज्जनो! उस प्रभुके आगे रो पड़ो तो सब काम हो जायगा। वे प्रभु सर्वथा सबल हैं। उनके रहते हम दु:ख क्यों पायें? भगवान् हमारे हैं। बालक कहता है कि माँ मेरी है, तो माँको उसे गोदमें लेना पड़ेगा। वह तो केवल एक जन्मकी माँ है; परंतु वे प्रभु सदाकी और सबकी माँ है।