कारागार—एक शिक्षालय
(नागपुरके कारागारमें किया गया एक प्रवचन)
जबतक परमात्माकी प्राप्ति न हो जाय, तबतक सभी जीव कैदी हैं। आप ऐसा न समझें कि हम बड़े नीचे दर्जेके हैं। हम सभी परमात्माकी संतान हैं! जैसे आप इस कारागारमें पराधीन होकर आये हैं, स्वाधीन होकर नहीं आये, ऐसे ही हम सब-के-सब इस संसारमें पराधीन होकर ही आये हैं और यहाँ आकर अपने-अपने किये हुए कर्मोंका फल भोगते हैं। जबतक कर्मोंके परतन्त्र होकर उनका फल भोगते हैं, तबतक हम कैदी ही हैं।
मनुष्ययोनि ही ऐसी है, जिसमें आकर मनुष्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर सकता है। सदाके लिये स्वाधीन हो जाय, पराधीनता सर्वथा मिट जाय, इसके लिये ही मनुष्य-शरीर मिला है। इसमें सुख और दु:ख—दो तरहके भोग होते हैं। सुखके भोगमें मनुष्य समझता है कि मैं स्वाधीन हूँ और दु:खके भोगमें वह समझता है कि मैं पराधीन हूँ। परंतु यह बेसमझीकी बात है। अगर हम सुखके भोगमें स्वतन्त्र होते तो फिर सुख-ही-सुख भोगते, दु:ख भोगते ही नहीं। परंतु यह अपने हाथकी बात नहीं है। हमें सुख और दु:ख दोनों ही भोगने पड़ते हैं।
दु:खके भोगमें एक विलक्षण बात है—सुखके भोगमें तो अपने पुण्योंका नाश होता है, पर दु:खके भोगमें पापोंका नाश होता है! आप यहाँ पापोंका नाश करनेके लिये आये हैं। कोई-न-कोई पाप होता है, तभी मनुष्य कैदमें आता है। कैदकी जितनी अवधि है, उतनी अवधितक कैदमें रहनेपर उसके पाप नष्ट होते हैं और पाप नष्ट होनेसे वह पवित्र बनता है। इसलिये अब आपको और हमको, सबको चाहिये कि दु:खोंसे छूटनेके लिये पाप-अन्याय, दुर्गुण-दुराचार, शास्त्रमर्यादासे विरुद्ध कोई काम न करें। इस बातकी शिक्षा यहाँ आपको क्रियारूपसे मिलती है।
यह कारागार एक शिक्षालय है। इसमें यह शिक्षा मिलती है कि अब आगे ऐसा पाप नहीं करें। संसारमात्रमें बीमारीसे, घाटा लगनेसे, अपमान होनेसे, निंदा होनेसे जो दु:ख होता है, वह दु:ख शिक्षा देनेके लिये होता है कि हमने कभी-न-कभी पाप किया है, उसीका फल यह दु:ख है। इसलिये अब आगे कोई पाप नहीं करेंगे—यह शिक्षा लेनी चाहिये। पुराने पापोंका फल भोगनेसे वे पाप नष्ट हो जाते हैं। पाप नष्ट होनेपर हम शुद्ध, निर्मल हो जाते हैं।
यहाँ जो अनुकूलता आती है, नफा हो जाता है, धन मिल जाता है—यह सब पुण्यका फल है। जो प्रतिकूलता आती है, घाटा लग जाता है, कोई मर जाता है, बीमारी आ जाती है—यह सब पापका फल है। पुण्योंका फल भोगनेके लिये स्वर्गमें जाते हैं और वहाँका सुख भोगते हैं। सुख भोगनेसे पुण्योंका नाश हो जाता है और पुन: मृत्युलोकमें गिरना पड़ता है—‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।’ (गीता ९। २१)। पाप नष्ट होते हैं दु:खसे तथा पुण्य नष्ट होते हैं सुखसे। सुख भोगनेसे तो पुण्योंका नाश होता है और अपना स्वभाव बिगड़ता है, इससे पापोंके बीज बोये जाते हैं। परंतु दु:खमें तो लाभ-ही-लाभ होता है, नुकसान होता ही नहीं। जितना दु:ख, कष्ट आता है, वह पुराने पापोंका नाश करता है और आगेके लिये सावधान करता है।
राजा प्रजाका माता-पिता होता है। वह प्रजाका हित चाहता है। अत: आपके हितके लिये ही आपको यहाँ भरती किया है, जिससे आपके जीवनमें कोई दोष रहे ही नहीं, आप पवित्र बन जायँ। आप ऐसा न समझें कि कैदखानेमें आकर हम पराधीन हो गये। इसको शिक्षालय समझें। यहाँ क्रियात्मक शिक्षा दी जाती है। यह अपवित्र नहीं है। यहाँ भगवान् श्रीकृष्णने जन्म लिया था। इसलिये सभ्य लोग कारागारको ‘कृष्ण-जन्म-स्थान’ कहते हैं। कारागारमें अवतार लेकर भी भगवान् श्रीकृष्ण कितने बड़े हो गये? उनकी शिक्षा ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का विदेशी लोग भी आदर करते हैं। कोई भी आदमी अगर विद्वान् होगा तो वह गीताका आदर जरूर करेगा।
यहाँ आपकी बहुत बड़ी उन्नति हो सकती है। यहाँ रहकर अच्छे काम करें, अच्छा बर्ताव करें। सबके साथ सेवाका बर्ताव करें, आदरका बर्ताव करें, उनको सुख पहुँचानेका बर्ताव करें। यहाँ आप तरह-तरहके काम-धन्धे भी सीखते होंगे। उससे भी बहुत बड़ा फायदा होता है। एक विद्या आ जायगी, उस विद्यासे आप आगे कमाकर खा सकते हैं। मैं यहाँके फायदेसे परिचित नहीं हूँ। मेरा और कई जगह जानेका काम पड़ा है। बीकानेरके कैदखानेमें देखा था कि वहाँ बड़ी अच्छी-अच्छी दरियाँ, गलीचे आदि बनते हैं। ऐसी-ऐसी सुन्दर-सुन्दर चीजें बनती हैं, जो विदेशोंमें भी जाती हैं। जब गंगासिंहजी महाराज बीकानेरके राजा थे, तब वे एक बार इंग्लैण्ड गये। वहाँ उन्होंने बहुत कीमत देकर एक गलीचा खरीदा। वहाँसे वापस आकर उन्होंने बीकानेर-जेलमें गलीचा-बुनाईपर जो अफसर था, उसको बुलाकर कहा कि ‘देखो, ऐसा गलीचा अपने यहाँ भी बुनवाओ। यह मैं इंग्लैण्डसे लाया हूँ।’ गलीचा देखकर उसने बताया कि ‘अन्नदाता! यह तो अपनी जेलका ही बना हुआ है, वहाँ जानेसे बड़ा कीमती हो गया। यह देखिये, अपनी जेलसे बने हुएका चिह्न।’
यहाँ काम करनेमें तो आपको ऐसा लगता है कि हम परवश होकर करते हैं; पर उसको भी अगर आप सीख लेंगे तो वह विद्या आपके हाथ लग जायगी। उस विद्यासे आप जहाँ रहें, वहाँ काम कर सकते हैं। बड़े-बड़े धनी व्यापारियोंके यहाँपर आप इकट्ठे होकर कहो कि हमें ऐसा-ऐसा काम आता है, तो उनकी सहायतासे आप देशकी बड़ी उन्नति कर सकते हैं।
यहाँ रहते हुए भी आपसमें अच्छा बर्ताव करना सीखें। दूसरोंकी आज्ञामें रहना—यह उन्नतिका तरीका है। आप ध्यान दें। दुष्टोंके परतन्त्र होनेसे तो आदमी दु:ख पाता है; परंतु जो सज्जनोंके परतन्त्र होता है, वह स्वतन्त्र बनता है और सुख पाता है। जितने बड़े-बड़े विद्वान् हुए हैं, वे बाल्यावस्थामें विद्वानोंके अधीन रहकर ही विद्वान् बने हैं। जितने संत-महात्मा हुए हैं, अपने गुरुजनोंकी सेवा करके, उनके अधीन रहकर ही संत-महात्मा बने हैं। बड़े ऊँचे दर्जेके महापुरुषोंने भी बचपनमें परतन्त्रताको स्वीकार किया है। सज्जनोंकी, हितैषियोंकी जो परतन्त्रता होती है, वह स्वतन्त्रताको देनेवाली होती है। परंतु जो अपनी इन्द्रियोंके और मनके वशमें होते हैं, वे परतन्त्र ही रहते हैं। उनको बार-बार नरकोंमें जाना पड़ता है, बड़े-बड़े कष्ट पाने पड़ते हैं। इसलिये इन्द्रियोंको तथा मनको वशमें करके अच्छे कामोंमें लगे रहना चाहिये। इन्द्रियोंके, मनके भोगोंके वशमें होनेसे अभी तो स्वतन्त्रता दीखती है, पर आगे परतन्त्रता आ जाती है—यह स्वतन्त्रतामें भी परतन्त्रता है। सज्जनोंकी परतन्त्रतामें भी स्वतन्त्रता है।
अच्छे आचरण करो, अच्छे गुण सीखो, अच्छे भाव सीखो। अपने जीवनको सदा ही पवित्र बनाओ। पवित्र बननेके लिये यह बड़ा ही सुन्दर मौका है; क्योंकि यह जगह पापी बननेके लिये नहीं है, प्रत्युत शुद्ध बननेके लिये है।
भगवन्नामकी बड़ी भारी महिमा है। एकनाथजी, तुकारामजी आदि जितने बड़े-बड़े संत-महापुरुष हुए हैं, उन्होंने नाम-जपकी बहुत महिमा गायी है। वह नाम-जप आप करते रहो। भगवन्नाम लेनेके लिये आप परतन्त्र नहीं हो। काम-धंधा करते हुए भी भगवन्नाम लेते रहो। चाहे राम, कृष्ण, गोविन्द, वासुदेव आदि कहो, चाहे विट्ठल-विट्ठल कहो। आपको भगवान्का जो नाम प्यारा लगे, वह नाम आप लेते रहो।
भगवान्के नामोंमें तो भेद है, पर उनके फलमें भेद नहीं है। उनमें भी जिस नाममें आपकी अधिक रुचि हो, उसीका जप करें। इससे अधिक लाभ होता है। मन लगाकर भगवान्के नामका जप करें। मन न लगे तो भी एक ऐसी आदत बना लें कि काम-धंधा करते हुए भी नामजप होता रहे। संतोंने कहा है—‘हाथ काम मुख राम है, हिरदै साँची प्रीत। दरिया गिरस्ती साध की, याही उत्तम रीत।’ इस प्रकार यहाँ रहते हुए आप भी भगवान्का नाम लेते रहें तो आप भी सन्त हो जायँगे। स्वराज्य-प्राप्तिके लिए अच्छे-अच्छे लोगोंने भी कैद भोगी थी; परंतु भोगी थी धर्मके लिये, पापोंके कारण नहीं। ‘कल्याण’ के सम्पादक श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार भी राजनैतिक कैदीके रूपमें जेलखानेमें रहे थे। वहाँ रहकर वे लोगोंको दवाइयाँ वितरण किया करते और भजन-स्मरण किया करते थे। जेलमें उन्होंने लगभग दो हजार पुस्तकें पढ़ीं और नामजपका अभ्यास किया। वे अँगुलीपर नाम-जप किया करते और गिनतीके लिये लकड़ीसे दीवारपर लाईन खींच देते। इस तरह उन्होंने खूब नाम-जप किया। अत: नाम-जपका अभ्यास करनेका यहाँ बड़ा ही सुन्दर मौका है। आपको ज्यादा बोलनेका काम भी नहीं पड़ता। आपके जो अफसर हैं, उनको तो शासन करना पड़ता है, बोलना पड़ता है; परंतु आपके लिये तो कुछ बोलनेकी आवश्यकता नहीं। इसलिये आप विशेषतासे नाम-जप करें। थोड़ी-थोड़ी देरके बाद ‘हे नाथ! मैं आपको भूलूँ नहीं; हे नाथ! आपके चरणोंमें मेरा प्रेम हो जाय’—इस प्रकार भगवान्से प्रार्थना करते रहें और नाम-जप करते रहें।
हृदयसे सबका भला चाहें। किसीका भी बुरा न चाहें। किसीने आपपर मुकदमा करके आपको कैद करा दी है तो उसका भी बुरा न चाहें; क्योंकि उसने आपको शुद्ध बनानेके लिये ही ऐसा किया है। आप शुद्ध बन जायँगे तो आपको बार-बार जन्म नहीं लेना पड़ेगा, बार-बार कैदमें नहीं आना पड़ेगा। माँके गर्भमें रहना भी एक बड़ा भारी कैदखाना है। वहाँ जीव बड़े कष्टसे रहता है, बहुत दु:ख पाता है; परंतु पापोंके कारण वहाँ बार-बार आना पड़ता है। इसलिये कारणको ही मिटा दो तो कार्य अपने-आप मिट जायगा—‘मूलाभावे कुत: शाखा।’ जब मूल ही कट जायगा, तो शाखा कैसे निकलेगी? अत: पाप, अन्याय, दुराचार आदि करना ही नहीं है। न चोरी करनी है, न डाका डालना है, न किसीका अनिष्ट करना है। तनसे, मनसे, वचनसे जो दूसरोंको दु:ख देता है, उसको दु:ख पाना ही पड़ेगा—यह एकदम सच्ची बात है। जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही वृक्ष होता है और वृक्षसे फिर वैसा ही बीज आता है। ऐसे ही जो दूसरोंको दु:ख देता है, उसको दु:ख पाना ही पड़ता है। दूसरोंको दु:ख देकर चाहे अभी सुखी हो जाय, दूसरोंका धन छीनकर चाहे अभी धनी बन जाय, दूसरोंको मारकर चाहे अभी राजी हो जाय; परंतु अन्तमें दु:ख पाना ही पड़ेगा, बच सकेगा नहीं। परमात्माके यहाँ बड़ा इंसाफ है, बड़ा न्याय है। यहाँ तो झूठ-कपट करके भी आदमी दण्डसे बच सकता है, पर परमात्माके यहाँ नहीं बच सकता। वहाँ झूठे गवाह नहीं मिलेंगे और वकील-मुखत्यार भी नहीं मिलेंगे। वहाँ तो अपने किये हुएके अनुसार दण्ड भोगना पड़ेगा।
आप थोड़ा-सा ध्यान दें। जैसे पंखा चलता है, बत्ती जलती है, लाउडस्पीकरसे आवाज होती है—ये सब काम बिजलीसे होते हैं। जब बिजलीघरका आदमी आता है, तब वह आप लोगोंसे यह नहीं पूछता कि आपने कितनी बिजली जलायी, कैसे जलायी, कब जलायी? बिजलीका यन्त्र (मीटर) लगा रहता है। उस यन्त्रको देखकर वह आपके पास बिल भेज देता है कि इतने नम्बर (यूनिट) आये हैं, इतने पैसे हुए। वे पैसे आपको चुकाने पड़ते हैं। इसी तरहसे आप, हम जितने मनुष्य हैं, उनके भीतर भी एक मीटर रखा हुआ है। इस शरीरके ऊपर गरदनसे खोपड़ीतक यह मीटर लगा है। हम जैसा देखते हैं, जैसा सुनते हैं, जैसा चखते हैं, जैसा स्पर्श करते हैं, जैसा सूँघते हैं, वह सब इस मीटरमें अंकित हो जाता है। हमारे मनमें किसीका नुकसान करनेकी भावना पैदा होती है, तो वह भी इस मीटरमें अंकित हो जाती है। जेलखानेमें पहरा देनेवालोंके गलेमें एक यन्त्र लटका देते हैं। वह जितनी नींद लेता है, उतना उस यन्त्रमें अंकित हो जाता है। इसी तरहसे हमारे भीतर भी ऐसे यन्त्र रखे हुए हैं, जिनके अनुसार आगे दण्डकी और पुरस्कारकी व्यवस्था होगी। वे यह नहीं पूछेंगे कि कितना किया और क्या किया? ऐसा पूछनेकी जरूरत ही नहीं है, वे खुद ही सब देख लेंगे। यहाँ तो सत्य बुलवानेके लिये पहले आदमीको बेहोश कर देते हैं। उस अवस्थामें जो संस्कार पड़े हुए होते हैं, उसके अनुसार जैसी बात होती है, वह खोल देता है। परंतु हमारे भीतर ऐसा सुन्दर यन्त्र रखा हुआ है, जिसमें बोलनेकी जरूरत ही नहीं पड़ती! भीतरके भावोंका अपने-आप पता लग जाता है। उसके अनुसार ही सुखदायी और दु:खदायी परिस्थिति आती है।
दु:खदायी परिस्थिति जितनी लाभदायक होती है, सुखदायी परिस्थिति उतनी लाभदायक नहीं होती। सुखभोग दीखता तो अच्छा है, पर उसका नतीजा खराब होता है। सुख भोगनेसे पुराने पुण्य नष्ट होते हैं और आदत खराब होती है, जिससे आगे फिर सुख भोगनेकी इच्छा होती है। सुख भोगनेकी इच्छा ही पापोंकी जड़ है। अर्जुनने पूछा कि महाराज, यह मनुष्य पाप करना नहीं चाहता, फिर भी इसको जबर्दस्ती पापमें लगानेवाला कौन है? (गीता ३। ३६)। भगवान्ने उत्तर दिया कि सुखभोग और संग्रहकी इच्छा ही पापोंका कारण है। ज्यों-ज्यों मनुष्य अधिक सुख भोगेगा, त्यों-ही-त्यों उसके भीतर भोगोंकी इच्छा बढ़ेगी। वह इच्छा ही आगे उससे पाप करायेगी। पुण्योंका फल—सुख भोगनेसे पुराने पुण्य नष्ट होते हैं और सुखभोगकी इच्छा पैदा होनेसे पापोंका बीज बोया जाता है, जिससे वह पापी बनता है। इसलिये सुखभोगमें लाभ नहीं है। परंतु दु:ख-भोगमें बड़ा भारी लाभ है—एक तो पुराने पाप नष्ट होते हैं और एक भोगोंसे उपरति होती है कि भोगोंके लिये हमने अमुक-अमुक काम किये, इसलिये दु:ख भोगना पड़ा। अत: अब ऐसा पाप नहीं करेंगे—यह भाव होनेसे वह शुद्ध हो जाता है।
यह बात देखी हुई है कि कोई आदमी बहुत ज्यादा बीमार हो जाता है तो बीमारीसे उठनेपर उसका अन्त:करण शुद्ध हो जाता है। इसकी पहचान यह है कि उसके सामने कोई भगवत्सम्बन्धी बात रखें, भक्तोंका चरित्र रखें तो उसे सुनकर गद्गद हो जाता है, आँसू आने लगते हैं। उसको भगवान्की बात बड़ी प्यारी लगती है। कारण क्या है? बीमारीका कष्ट भोगनेसे अन्त:करण शुद्ध, निर्मल हो जाता है। शुद्ध अन्त:करणमें भगवान्का प्रेम पैदा होता है! इसी तरहसे आपलोग भी कैद भोगनेसे शुद्ध हो जायँगे। यहाँ रहते हुए अपना भाव, अपनी नीयत अच्छी रखें। इसका नतीजा आपके लिये बहुत उत्तम होगा। जो लोग सुख भोगते हैं और स्वतन्त्रतासे घूमते हैं, उनकी अपेक्षा आप बड़े भाग्यशाली हैं।
हमारे छ: दर्शन-शास्त्र हैं। उनमेंसे एक शास्त्र है—पातंजलयोगदर्शन। उसमें बताया है कि ‘हेयं दु:खमनागतम्’(२।१६)—जो दु:ख आया नहीं है, पर आनेकी सम्भावना है, वह दु:ख त्याज्य है। अर्थात् उस दु:खसे हम बच सकते हैं! जो दु:ख भोग चुके, वह तो भोग ही चुके, उसका क्या किया जाय? अभी जो दु:ख भोग रहे हैं, वह भोगनेसे नष्ट हो जायगा। अब आगे आनेवाले दु:खसे बचना चाहिये। उससे बचनेके लिये ही यह मानव-शरीर मिला है। इस मानव-शरीरमें अगर हम सावधान रहें, ठीक तरहसे आचरण करें और मर्यादाके अनुसार चलें तो आगे दु:ख नहीं होगा। आनेवाले दु:खसे बचनेके लिये आपका यह स्थान बहुत बढ़िया है। अब आपके लिये सावधानीकी विशेष आवश्यकता है। जो बाहर गृहस्थमें रहते हैं और अपनेको स्वतन्त्र मानते हैं, उनमें भी सावधानीकी पूरी आवश्यकता है। सावधानीके बिना प्रमाद, आलस्य आदि तमोगुणी वृत्तियाँ मिटेंगी नहीं। हिंसा, प्रमाद, आलस्य, निरर्थक समय बर्बाद करना बहुत खराब चीज है। इसलिये आपलोगोंके लिये बहुत उचित बात यह है कि सब-का-सब समय अच्छे काममें लगाये रखें।
हरेक आदमीके लिये, वह साधु हो चाहे गृहस्थ हो, भाई हो चाहे बहन हो, पढ़ा-लिखा हो चाहे अपढ़ हो, मैं चार बातें कहा करता हूँ। उन बातोंको काममें लायें तो बहुत लाभ होगा, जीवन शुद्ध बन जायगा। वे चार बातें इस प्रकार हैं—
(१) सबसे पहली बात है समयकी। हमारे पास जितना समय है, उस समयको अच्छे-से-अच्छे काममें, उत्तम-से-उत्तम काममें लगाये। समयको बर्बाद न करे। ताश, खेल, चौपड़, सिनेमा, नाटक, खेलकूद (हाकी, क्रिकेट आदि खेलने)-में जो समय जाता है, वह बर्बाद होता है। न तो उससे परमात्मा मिलते हैं और न संसारका कोई लाभ होता है। हाँ, कई खेल ऐसे हैं, जिनसे शारीरिक व्यायाम होता है, स्वास्थ भी ठीक होता है; परंतु प्राय: निरर्थक समय जाता है। सिनेमा देखनेसे आँखें भी खराब होती हैं, धन भी नष्ट होता है, समय भी बर्बाद होता है और चरित्र भी खराब होता है। खेल-तमाशोंमें उम्र बर्बाद हो जाती है।
हमें जो समय मिला है, वह सीमित है, असीम नहीं है। जैसे घड़ीमें जितनी चाबी भरी हुई होती है, उतनी देर ही वह चलती है। चाबी समाप्त होते ही घड़ी बंद हो जाती है। ऐसे ही हमारी श्वासरूपी घड़ी चलती है। श्वास खत्म होते ही मरना पड़ता है। फिर कोई जी नहीं सकता। किसी बल, अधिकार, योग्यतासे जी जायँ या विद्वान् होनेसे जी जायँ—यह हाथकी बात नहीं। वे श्वास अगर निरर्थक कामोंमें खर्च होते हैं, पाप करनेमें और दुर्व्यसनोंका सेवन करनेमें खर्च होते हैं तो यह महान् मूढ़ता है!
भगवान्का चिन्तन किये बिना जो समय जाता है, वह सब निरर्थक होता है। अत: हर समय सावधान रहना चाहिये कि हमारा समय निरर्थक न चला जाय। यहाँ जितना काम करना होता है जितनी ड्यूटी बजानी होती है उतना काम बड़े उत्साहसे करो और छुट्टी मिलते ही भगवान्के नामका जप करो, कीर्तन करो, गीता आदि पुस्तकें पढ़ो।
(२) दूसरी बात आपके लिये बहुत सुगम है; वह है—अपना जीवन सादगीसे बितायें, अपना व्यक्तिगत खर्चा कम-से-कम करें। साधारण भोजन करना, साधारण कपड़ा पहनना और साधारण मकानमें रहना—ऐसे शरीर-निर्वाह करनेकी आदत बन जाय। ऐसी आदत बन जायगी तो समयपर आप बढ़िया भोजन भी कर सकते हो, बढ़िया कपड़ा भी पहन सकते हो, बढ़िया मकानमें भी रह सकते हो और समयपर साधारण-से-साधारण भोजन, कपड़ा और मकानमें भी निर्वाह कर सकते हो। आपको स्वत: ऐसा अवसर मिला हुआ है, जिसमें आप अपना व्यक्तिगत खर्चा कम करके सादगीसे अपना जीवन बितानेका अभ्यास कर सकते हो।
यहाँसे बाहर जानेपर भी आप ऐश-आरामका जीवन न बितायें। जीवनमें सादगी रखें। ऐसा स्वभाव बननेसे आप चाहें जहाँ खूब आरामसे रह सकते हैं। जितने अच्छे-अच्छे संत-महात्मा हुए हैं, उन्होंने बिलकुल साधारण कपड़ोंमें, साधारण बिछौनोंमें, साधारण मकानोंमें रहते हुए और साधारण भोजन करते हुए अपना जीवन बिताया है। आपमेंसे जिनके पास पैसे हों, वे दानमें, पुण्यमें, कुटुम्बियोंके लिये, अरक्षितोंके लिये, अपाहिजोंके लिये, दीन-दु:खियोंके लिये खर्च करें। अपना व्यक्तिगत खर्चा कम करें।
(३) तीसरी बात यह है कि आप जो काम करें, उस काममें कारीगरी, चतुराई, होशियारी-बुद्धिमानी बढ़ाते रहें। यह विद्या आप यहाँ सीख लोगे तो यह सदा आपके पास रहेगी। ऐसा आया है कि अगर ब्रह्माजी अपने वाहन हंसपर क्रोध करके उसे अपने यहाँसे निकाल दें, तो बेशक निकाल दें, परंतु ‘दूध-दूध पी लेना और जल छोड़ देना’—यह विद्या उससे ब्रह्माजी भी नहीं छीन सकते। वह जहाँ भी जायगा, यह विद्या तो उसके पास ही रहेगी। अत: हरेक काम करनेमें कुशलताको, चतुराईको, समझदारीको, विद्याको बढ़ाते चले जायँ।
(४) चौथी बात है—पराया हक न लेना। चोरी-डकैती आदि करना तो बहुत दूर रहा, दूसरोंका हक हमारे पास न आये—इस विषयमें खूब सावधान रहना है। अपनी खरी कमाईका अन्न खाओगे तो अन्त:करण निर्मल होगा और अगर चोरीका, ठगी-धोखेबाजीका, अन्यायका अन्न खाओगे तो अन्त:करण महान् अशुद्ध हो जायगा।
आजकल टैक्स बहुत बढ़ जानेसे लोग व्यापार आदिमें चोरी-छिपाव करते हैं। जैसे-जैसे वकील सिखाता है, वैसा-वैसा करके वे धन बचानेकी चेष्टा करते हैं। वे विचार ही नहीं करते कि इस प्रकार धन बचानेसे अन्त:करण कितना मैला हो जायगा! एक संत कहा करते थे कि शुद्ध कमाईके धनसे बहुत पवित्रता आती है। उनके पास एक राजा आया करते थे। एक बार राजाने उनसे पूछा कि ‘महाराज, आपके यहाँ बहुत-से लोग आया करते हैं और आप भी कई लोगोंके घरोंमें भिक्षाके लिये जाया करते हैं। ऐसा कोई घर आपकी दृष्टिमें है, जिसका अन्न शुद्ध कमाईका हो? अगर ऐसा घर आपको दीखता है तो बतायें।’ सन्तने कहा कि ‘अमुक स्थानपर एक बूढ़ी माई रहती है। उसके घरका अन्न शुद्ध है। वह ऊनको कातकर उससे अपनी जीविका चलाती है। उसके पास धन नहीं है, साधारण घास-फूसकी कुटिया है; परंतु वह पराया हक नहीं लेती, इस कारण उसका अन्न शुद्ध है।’ ऐसा सुनकर राजाके मनमें आया कि उसके घरकी रोटी मिल जाय तो बड़ा अच्छा है! राजा स्वयं एक भिखारी बनकर उसके घर पहुँचा और बोला—‘माताजी! कुछ भिक्षा मिल जाय।’ वह बूढ़ी माई भीतरसे रोटी लायी और बोली—‘बेटा! यह रोटी ले लो।’ तब राजाने पूछा—‘माताजी, एक बात बताओ कि यह रोटी शुद्ध है न? इसमें पराया हक तो नहीं है?’ तो वह बोली—‘देख बेटा, बात यह है कि यह पूरी शुद्ध नहीं है, इसमें थोड़ा पराया हक आ गया है! एक दिन रातमें बारात जा रही थी। बारातमें जो गैस-बत्तियाँ थीं, उनके प्रकाशमें मैंने ऊन ठीक की थी—इतना इसमें पराया हक आ गया है। इसके सिवाय मेरी कमाईमें कोई कसर नहीं है।’ राजाने बड़ा आश्चर्य किया कि इतनी-सी कमीका भी इतना ख्याल है! दूसरेके उस प्रकाशमें हमारा क्या अधिकार है कि उसमें हम अपनी ऊन ठीक करें?
इस तरह ये चार बातें हुईं—पहली, समय बर्बाद न करना, उसको उत्तम-से-उत्तम काममें लगाना; दूसरी, जो काम करें, उसमें अपनी जानकारी-होशियारी बढ़ाते रहना; तीसरी, अपने शरीरके निर्वाहके लिये थोड़े खर्चेकी आदत बना लेना और चौथी, पराया हक न लेना। ये चार बातें जिसमें होती हैं, उसको लोग बहुत चाहते हैं। अगर वह नौकरी करना चाहेगा, तो उसको नौकरी जरूर मिल जायगी। ये जो बड़े-बड़े व्यापार करनेवाले सेठ होते हैं, वे प्राय: झूठ-कपट करते हैं, सरकारको धोखा देते हैं, बही भी दूसरी बना देते हैं और वक्तपर विश्वासघात भी कर लेते हैं; परंतु वे भी यह नहीं चाहते कि हमारा मुनीम हमारे साथ झूठ-कपट करे, हमारेको धोखा दे, हमारे साथ विश्वासघात करे। वे चाहते हैं कि हमें ईमानदार अच्छा नौकर मिले। बेईमान आदमी भी ईमानदार नौकर चाहते हैं और ईमानदार आदमी भी ईमानदार नौकर चाहते हैं। काम करनेवाला सच्चा और ईमानदार आदमी मिले—इसकी भूख सबको रहती है।
एक विधवा बहन मिली। उसके ससुरालवालोंने सब रुपये-गहने ले लिये, उसको दिये नहीं। वह कहती थी कि ‘मेरा खर्चा ही क्या है, दो हाथके बीचमें एक पेट है! लोग अपने पूरे कुटुम्बका पालन करते हैं, मेरा तो एक पेट है; न लड़का, न लड़की। एक मैं हूँ और दो हाथ हैं मेरे पास। मुझे क्या कमी है?’ जो कम खर्चा करता है, थोड़े ही खर्चेमें अपना काम चलाता है, उसके मनमें बड़ा उत्साह रहता है। उस उत्साहसे वह कमाकर खाता है, तो उसका चित्त खूब प्रसन्न रहता है। परंतु पराया हक लेनेसे चित्त शुद्ध नहीं होता। दूसरोंका हक लेनेवाला बाहरसे चाहे धनी बन जाय, चाहे खा-पीकर पुष्ट हो जाय, पर वह निर्भय नहीं हो सकता। जिसने किसीका कोई हक लिया ही नहीं, उसको भय किस बातका? वह तो निर्भय, नि:शंक रहता है। उसको कभी कष्ट नहीं पाना पड़ता। इस तरह आप भी अपना जीवन निर्मल बनायें। इन चारों बातोंको काममें लायें। इससे आपका अन्त:करण निर्मल होगा। इसके सिवाय जिनमें आपकी श्रद्धा है, उन संतोंकी पुस्तकें पढे़ं और उनके अनुसार अपना जीवन बनायें।