मनुष्य-जीवनकी सफलता
शरीर-निर्वाहके लिये वस्तुओंकी आवश्यकता होती है, रुपयोंकी नहीं। कारण कि वस्तुएँ स्वयं काम आती हैं, पर रुपये स्वयं काम नहीं आते। रुपये वस्तुओंके द्वारा काम आते हैं। अत: रुपयोंसे वस्तुएँ विशेष आवश्यक हैं। वस्तुओंसे भी आवश्यक शरीर है। शरीरके लिये ही वस्तुएँ होती हैं। शरीरका जो महत्त्व है, वह वस्तुओंका नहीं है। पशु आदिके शरीर भी बहुत कामके हैं; क्योंकि उनसे मनुष्यके निर्वाहकी कई वस्तुएँ पैदा होती हैं; जैसे—गायसे दूध, भेड़से ऊन आदि। परंतु उनसे भी बढ़कर है मनुष्यका शरीर, जिससे यह लोक और परलोक दोनों सुधर सकते हैं।
शास्त्रोंमें मनुष्य-शरीरकी बड़ी महिमा आती है। इस शरीरमें बढ़िया चीज क्या है? इसमें बढ़िया चीज है—विवेक। जिससे सार-असार, नित्य-अनित्य, कर्तव्य-अकर्तव्य—इन बातोंका ठीक तरहसे बोध होता है, उसे ‘विवेक’ कहते हैं। यह विवेक सर्वोपरि है। इस विवेककी ही महिमा है। यह विवेक जितना अधिक होगा, उतना ही मनुष्य श्रेष्ठ होगा। व्यवहारमें भी किसी मनुष्यका अधिक आदर होता है तो उसमें विवेक ही कारण है। मनुष्यमें विवेक-शक्ति जितनी अधिक जाग्रत् होगी, उतना ही अधिक वह आदरणीय हो जायगा। कारण कि विवेक-शक्तिसे वह हरेक बातका ठीक-ठीक निर्णय करेगा। इस विवेक-शक्तिकी महिमा मनुष्यसे भी बढ़कर है। कारण कि विवेक-शक्ति होनेसे ही मनुष्य-शरीरकी इतनी महिमा है। मनुष्यके इस ढाँचे (शरीर)-की आकृतिकी महिमा नहीं है।
विवेकसे भी बढ़कर क्या है? विवेकसे भी बढ़कर है—परमात्मा। विवेकके द्वारा सार-असार, नित्य-अनित्यको समझकर नित्य, निर्विकार और सर्वोपरि परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लेनेमें ही मनुष्य-शरीरकी सफलता है। उसे प्राप्त न करके सांसारिक भोगोंमें ही समय लगा दिया तो मनुष्य-शरीर सफल नहीं हुआ। भोगका सुख तो पशु-पक्षियोंको भी मिलता है, वे भी आरामसे रहते हैं। मैंने ऐसे कुत्तोंको देखा है, जिनकी देखभालके लिये आदमी रहते हैं। उनके रहनेके कमरोंमें गर्मीके दिनोंमें खसखसके टाटे लगे रहते हैं, बैठनेके लिये बहुत अच्छा बिछौना होता है, ऊपर पंखे लगे रहते हैं, टहलनेके लिये जाते हैं तो आदमी साथ रहते हैं, मोटर, हवाई जहाजमें वे यात्रा करते हैं, आदि। मनुष्योंमें भी बहुत कम आदमियोंको ऐसा आराम मिलता है। अत: सांसारिक सुखभोग और आराम मिलना होगा तो कुत्ते, गधे आदिकी योनिमें भी मिल जायगा। परंतु परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति इस मनुष्यमें ही हो सकती है। मनुष्यको छोड़कर दूसरे जितने भी पशु-पक्षी हैं, वे परमात्मतत्त्वको समझ भी नहीं सकते।
पशुओंमें सबसे उत्तम गाय मानी गयी है। गोबर और गोमूत्रसे पवित्रता आती है, रोगोंका नाश होता है। गाय पृथ्वीको पुष्ट करती है और पृथ्वी गायको पुष्ट करती है—इन दोनोंकी पुष्टिसे सब मनुष्योंका पालन होता है, उनके शरीरोंका निर्वाह होता है। इतनी श्रेष्ठ गायको भी आप परमात्मतत्त्वके विषयमें नहीं समझा सकते कि परमात्मा ऐसे हैं। गाय बहुत उपयोगी है, श्रेष्ठ भी है, हम उससे लाभ भी बहुत लेते हैं, इसलिये गायकी रक्षा करना हमारा मुख्य कर्तव्य होता है। परंतु गाय परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर ले, ऐसी योग्यता उसमें नहीं है। यह योग्यता केवल मनुष्य-शरीरमें ही है। मनुष्यकी जितनी महिमा है, उतनी देवताओंकी भी नहीं है। देवताओंके शरीर दिव्य होते हैं, हमारे शरीरकी तरह हाड़-माँसके नहीं होते। हमारा शरीर पृथ्वी-तत्त्व प्रधान होता है, देवताओंके शरीर तैजस् तत्त्व प्रधान होते हैं। जैसे, यह प्रकाश है, इस प्रकाशमें सब दीखते हैं न? यह तैजस् तत्त्व है। इसकी प्रधानता होती है देवताओंमें। जैसे कोई मलसे भरा हुआ सूअर हो और वह हमारे पाससे निकले तो हमारेको दुर्गंध आती है, ऐसे ही देवताओंको हमारे शरीरसे दुर्गंध आती है। ऐसा मलिन हमारा शरीर है। परंतु सज्जनो! उन देवताओंको भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका अधिकार नहीं है। देवता सुख भोगनेके लिये ही हैं। उनका शरीर अच्छा है, उनका लोक अच्छा है, उनका भोजन अमृतका है; परंतु कल्याण करनेके लिये मानव-शरीरकी ही महिमा है, देवताओंके शरीरोंकी नहीं। इसीलिये मनुष्य-शरीरको सबसे दुर्लभ बताया गया है—‘नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥ ’ (मानस ७। १२१। ५)। परंतु मनुष्य-शरीरमें आकर भी जो अपना उद्धार नहीं करता, केवल खाने-कमानेमें ही लगा रहता है, उसकी निंदा की गयी है।
रुपये-पैसोंका संग्रह हो जाय और उनसे हम सुख भोगें—इन दोनोंमें जो अत्यन्त आसक्त हो जाते हैं, वे मनुष्य परमात्मतत्त्व क्या है? मुक्ति क्या है? जन्म-मरण मिटनेसे क्या लाभ है? महान् आनन्द क्या है?—इसको जान ही नहीं सकते। दु:ख सदाके लिये मिट जाय और सदाके लिये महान् आनन्द हो जाय—तत्त्वको समझनेकी ताकत उनमें नहीं रहती।
हमें उस तत्त्वको प्राप्त करना है, जो इस मनुष्य-शरीरसे ही प्राप्त किया जा सकता है। उसकी प्राप्ति कैसे हो? इसके लिये एक बात मुख्य है कि हमारा ध्येय, हमारा लक्ष्य केवल परमात्मतत्त्व हो। जैसे मनुष्यका लक्ष्य धन कमानेका होता है तो वह कहीं-का-कहीं चला जाता है, ऐसे ही हमारा लक्ष्य परमात्मप्राप्तिका हो जाय। चाहे हम दु:ख पायें, चाहे सुख पायें; चाहे निर्धन हो जायँ, चाहे धनवान् हो जायँ; चाहे रोगी हो जायँ, चाहे नीरोग हो जायँ; चाहे जीते रहें, चाहे मर जायँ; चाहे लोग आदर करें, चाहे निरादर करें—हमें तो उस परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है। ऐसा मुख्य लक्ष्य हो जाता है तो परमात्मप्राप्ति बहुत सुगम हो जाती है। जबतक ऐसा लक्ष्य नहीं होता तभीतक परमात्मप्राप्ति कठिन मालूम देती है। वास्तवमें परमात्मतत्त्व-प्राप्ति कठिन नहीं है। कारण कि वह सब जगह है, सब देशमें है, सब कालमें है, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें है, सम्पूर्ण घटनाओंमें है, सम्पूर्ण क्रियाओंमें है। संसारका कोई भी, किंचिन्मात्र भी ऐसा परमाणु नहीं है, जहाँ परमात्मा न हो। उसकी प्राप्तिमें कठिनाई यही है कि उसे प्राप्त करनेकी जोरदार इच्छा नहीं है, सांसारिक भोगोंमें और संग्रहमें फँसे हुए हैं, अत: इनसे उपराम होकर परमात्मतत्त्वको प्राप्त करनेका उद्देश्य बनाना चाहिये।
रुपयोंसे वस्तु, वस्तुसे शरीर, शरीरसे विवेक और विवेकसे भी सत्य-तत्त्व परमात्मा श्रेष्ठ है। इसलिये परमात्माको सबसे अधिक आदर देकर उसको प्राप्त कर लेना ही मनुष्यका खास कर्तव्य है और इसीमें मनुष्य-जीवनकी सफलता है।