मिली हुई सामग्री अपनी नहीं

यह प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है कि जिन व्यक्तियों और वस्तुओंके साथ हम रहते हैं, वे हमारे साथ हरदम रहेंगी, ऐसी बात नहीं है और हम उनके साथ हरदम रहेंगे, यह बात भी नहीं है। इतना ही नहीं, शरीरके साथ हम सदा रहेंगे और शरीर हमारे साथ सदा रहेगा—ऐसा भी नहीं है। इस बातपर खूब विचार करना है। जब ये हमारे साथ सदा नहीं रह सकते और हम इनके साथ सदा नहीं रह सकते, तो फिर इनके भरोसे कितने दिन काम चलेगा? यह तो उसकी बात हुई जो हमारे सामने दीखता है। परंतु जो परमात्मा हैं, जिनके बारेमें हमने शास्त्रोंसे, संतोंसे सुना है, वे परमात्मा सदासे हमारे साथ थे, साथ हैं और सदा साथ रहेंगे। केवल सांसारिक वस्तुओंकी ओर दृष्टि रहनेसे उस परमात्माको पहचान नहीं सकते, उनको देख नहीं सकते। अगर हम इन नाशवान् वस्तुओंसे विमुख हो जायँ तो परमात्माके दर्शन हो जायँगे। विमुख होना क्या है? इनसे सुख लेना छोड़ दें, इनको दूसरोंकी सेवामें लगायें। वस्तुओंको तो दूसरोंके हितके लिये खर्च करें और व्यक्तियोंको सुख दें, आराम दें, उनका हित करें। ऐसा भाव बना लें कि हमारे पास जितनी वस्तुएँ हैं उनके द्वारा दूसरोंकी सेवा करनी है। अभी जो यह भाव है कि संग्रह करना है, अपने पास रखना है, इस भावको बिलकुल उलटना पड़ेगा कि इनको दूसरोंकी सेवामें लगाना है। विचार करें, रुपयोंको तो सदा साथमें रख सकोगे नहीं और इन रुपयोंके साथ आप सदा रह सकोगे नहीं। रुपये तो साथ जायँगे नहीं, पर रुपये रखनेका जो भाव है, वह मरनेपर भी साथ रहेगा। रुपये रखनेका भाव महान् पतन करनेवाला और स्वभाव बिगाड़नेवाला है।

रुपये दूसरोंका हित करनेके लिये हैं, सेवा करनेके लिये हैं—ऐसा भाव रखनेपर सब रुपये चले नहीं जायँगे। जितना-जितना सेवामें खर्च करोगे, उतने ही जायँगे और पासमें रहनेपर भी बाधा नहीं देंगे। जैसे, अधिक मासमें दान देनेके लिये माताएँ चीजें इकट्ठी कर लेती हैं कि ये थाली, लोटा, गिलास, आसन, छाता, कपड़ा आदि दान करनेके लिये हैं, अपने काममें लेनेके लिये नहीं हैं। भूलसे कोई बालक वहाँसे कोई चीज उठाकर ले आये तो कहती हैं ना! ना! इसको वहीं रख दे, यह अपने काममें लेनेकी नहीं है, यह तो देनेकी है। इस प्रकार देनेका भाव हो जानेसे उन चीजोंके साथ ममता नहीं रहती। इसी तरहसे यहाँ हमें जितनी वस्तुएँ मिली हैं, वे सब सेवा करनेके लिये मिली हैं। वे हमारी नहीं हैं, सेवाके लिये हैं—ऐसे केवल भावना बदल दें। इसमें आपका एक कौड़ीका, एक पैसेका भी नुकसान नहीं है। जितनी सेवामें लगनी है, उतनी सेवामें लग जायगी, बाकी बची हुई फिर लगेगी। लगे या न लगे, अपने काममें नहीं लेना है। बस, निर्वाहमात्रके लिये प्रसादरूपसे लेना है—तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।(मानस २।१२९।१)। सब कुछ भगवान‍्के अर्पण कर दिया, अब इसमेंसे जो भोजन पायेंगे, कपड़ा लेंगे, वह प्रसादरूपसे लेंगे। जिस मकानमें रहेंगे, वह हमारा नहीं है, ठाकुरजीका प्रसाद है। प्रसादमें स्वाद नहीं देखा जाता, शौकीनी नहीं देखी जाती, ऐश-आराम नहीं देखा जाता। केवल प्रसादका सेवन करना है। प्रसाद लेनेका भी माहात्म्य होगा और दूसरोंको देनेका भी फर्क कुछ पड़ेगा नहीं। जैसे, भगवान‍्को कोई भोग लगाये तो चीजें उतनी-की-उतनी रहेंगी, माशाभर भी कम नहीं होंगी। परंतु वे परम पवित्र हो जायँगी। बड़े-बड़े धनी आदमी भी हाथ पसारेंगे और प्रसादका कणमात्र देनेसे राजी हो जायँगे। कारण क्या है? वह ठाकुरजीका प्रसाद है!

सभी प्राप्त वस्तुओंको आप भगवान‍्की मान लें, जो सच्ची बात है। साथमें लाये नहीं, ले जा सकते नहीं, रख सकते नहीं, उनके साथमें रह सकते नहीं। ये तो ठाकुरजीकी हैं; अत: ईमानदारीके साथ ठाकुरजीके अर्पण कर दो कि महाराज! आपकी वस्तु आपके अर्पण। कितनी बढ़िया बात है। एकदम निर्लिप्तता है। निर्वाहमात्रका प्रसाद लेंगे; नहीं लेंगे तो भगवान‍्की सेवा कैसे होगी? सब कुछ ठाकुरजीका माननेपर कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। आपके पास चीजें ज्यों-की-त्यों रहेंगी, कुटुम्ब वैसा-का-वैसा ही रहेगा, मकान वैसा-का-वैसा ही रहेगा। शरीर वैसा-का-वैसा ही रहेगा। पर आपका चट कल्याण हो जायगा। नहीं तो उन चीजोंको अपना माननेसे बंधन हो जायगा और रहेगा कुछ नहीं आपके पासमें।

‘आप बुद्धिमानीसे जरा सोचो। अपना कुछ भी खर्च न हो और कल्याण हो जाय, कितनी बढ़िया बात है! खर्च होनेवाला तो खर्च हो ही जायगा। घाटा लगना है तो लग ही जायगा। दिवालिया होना है तो हो ही जायगा। चाहे कितनी ही कंजूसी करो, क्या बच सकते हो? शरीरके साथ कितना ही मोह रखो, क्या शरीरको रख सकते हो? रख सकते ही नहीं। इसलिये इन चीजोंको भगवान‍्की ही मान लो। अब घाटा लगे तो भगवान् का, नफा हो तो भगवान् का। हम क्यों रोयें? हम क्यों दु:ख पायें? ये चीजें भगवान‍्की हैं। भीतरसे भगवान‍्की ही मान लो तो आपको क्या घाटा लगता है? आपका क्या नुकसान होता है? जैसे कहावत है—‘हींग लगे न फिटकरी, रंग झकाझक आय।’ खर्चा कुछ लगे ही नहीं, और हम निहाल हो जायँ। जो होना है, वह होगा ही; जिसको रहना है, वह रहेगा ही; जिसको जाना है वह जायगा ही, इसमें तो कोई फर्क पड़ेगा नहीं। केवल भावसे भगवान‍्के अर्पण कर दो कि यह तो भगवान‍्की चीज है।

आपके घर लड़की जन्मती है तो शुरूसे आप ऐसा समझते हो कि यह लड़की तो दूसरे घर जायगी। घरमें भाई-बहन आपसमें झगड़ते हैं तो लड़केसे कहते हैं, कि ‘अरे, बहनसे क्यों झगड़ता है, यह तो अपने घर जानेवाली है।’ ऐसे ही आप कृपा करके जितनी सम्पत्ति मिली है, उसको बेटीकी तरह मान लो, तो क्या हर्ज है? अब बहन तो अपने घर जायगी ही, अपने पास तो रहेगी नहीं। बेटी घरपर कबतक रहेगी, बताओ? शरीर, सम्पत्ति, मकान, परिवार आदि सब-का-सब भगवान‍्की बेटी है, यह तो अपने घर जायगी—ऐसा मान लें।

लड़की तो अपने घर जायगी—ऐसा भाव होनेसे लड़केमें जितनी ममता होती है, उतनी लड़कीमें नहीं होती। लड़का बीमार हो जाय तो बड़ा असर पड़ता है, लड़की बीमार हो जाय तो उतना असर नहीं पड़ता। कारण कि यह अपनी नहीं है। जिसको अपना मानते हो, वह बेटा आपकी सारी सम्पत्तिका मालिक होता है। जो आपका बेटा नहीं है और जिसको आप अपना नहीं मानते, वह मालिक नहीं होता। जो अपना होता है, वह मालिक बनता है और अन्तमें वही खोपड़ी बिखेरता है। बेटी न तो मालिक बनती है और न खोपड़ी बिखेरती है। इसलिये सब सम्पत्ति, परिवार आदिको भगवान‍्का मान लें, नहीं तो वे मालिक भी बनेंगे और आपकी दुर्दशा भी करेंगे, फायदा इसमें कुछ नहीं होगा। भगवान‍्का मान लो तो नुकसान कुछ नहीं होगा और फायदा बड़ा भारी होगा।