पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं

श्रोता—गुरुकी सेवा कैसे की जाय?

स्वामीजी—गुरु किसको कहते हैं? गुरु-गीतामें आया है—

गुकारश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते।

अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशय:॥

तात्पर्य है कि जो अन्त:करणके अन्धकारको दूर कर दे, उसका नाम ‘गुरु’ है। बाहरका अन्धकार तो सूर्य दूर करता है, पर भीतरका अन्धकार गुरु दूर करता है। गुरुका संग करके, उनकी आज्ञाका पालन करके अपने भीतरका अन्धकार दूर कर लें—यही गुरुकी वास्तविक सेवा है और इसीसे गुरु प्रसन्न होते हैं। हम शरीरसे उनको सुख दें तो वह भी अच्छा है; परंतु वह गुरु-सेवा नहीं है, प्रत्युत एक शरीरकी सेवा है।

गुरु शरीर नहीं होता। शास्त्रोंमें आया है कि गुरुमें मनुष्यबुद्धि करना और मनुष्यमें गुरुबुद्धि करना पाप है, अन्याय है। कारण कि गुरु अमर होता है, जब कि मनुष्य मरनेवाला होता है। अगर गुरु भी मरनेवाला होता तो वह शिष्यको अमर कैसे बनाता? गुरुकी असली सेवा है—अमरताकी प्राप्ति कर लेना। जैसे, परीक्षा लेनेवाला आता है और विद्यार्थी उसके सवालोंका ठीक जवाब दे देता है, तो उससे विद्या पढ़ानेवाले गुरुजी प्रसन्न हो जाते हैं। ऐसे ही जब शिष्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लेता है, तब उससे पारमार्थिक मार्ग दिखानेवाले गुरुजी प्रसन्न हो जाते हैं। गुरुका प्रसन्न होना ही उनकी सेवा है। आप रोटीसे, कपड़ेसे, मकानसे, सवारीसे जिस किसी तरह भी गुरुको सुख पहुँचाते हैं—यह भी ठीक है; परंतु ये चीजें शरीरतक ही पहुँचती हैं, गुरुतक नहीं।

सन्त-महात्मा हमारेसे तभी प्रसन्न होते हैं, जब हमारा जीवन महान् पवित्र, निर्मल हो जाये और हमारा कल्याण हो जाय। जैसे हृष्ट-पुष्ट बालकको देखकर माँ प्रसन्न हो जाती है, ऐसे ही आपमें ज्ञान बढ़ा हुआ देखकर सन्त-महात्मा प्रसन्न हो जाते हैं। आप भले ही उन्हें रोटीका टुकड़ा भी मत दो, उनकी कुछ भी सेवा मत करो; परन्तु उनकी बातोंको धारण करके वैसे ही बन जाओ तो वे बड़े प्रसन्न हो जायँगे; क्योंकि यही उनकी असली सेवा है।

जड़ चीजोंसे गुरु-तत्त्वकी सेवा नहीं होती। छोटे बच्चेको रेशमकी चमकीली टोपी पहना दी जाय तो वह बहुत राजी हो जाता है। जब वह पिताजीकी गोदमें बैठता है, तब वह उस टोपीको पिताजीके सिरपर रख देता है और समझता है कि मैंने पिताजीको बहुत बढ़िया चीज दे दी। परंतु वह टोपी पिताजीके लिये ठीक है क्या? पिताजी वह टोपी पहने हुए चलेंगे क्या? ऐसे ही जो लोग संतोंको भेंट चढ़ाते हैं, कपड़ा देते हैं, बढ़िया-बढ़िया भोजन कराते हैं, वे मानो उनको रेशमी चमकदार टोपी पहनाते हैं! यह उनका बचपना ही है। यह सन्तोंकी असली सेवा नहीं है। सन्तोंकी असली सेवा है—अपना कल्याण करना। हम अपना कल्याण कर लें तो वे प्रसन्न हो जायँगे, उनका प्रयत्न सफल हो जायगा, उनका कहना-सुनना सफल हो जायगा।

आज मनुष्योंके मनमें धनका महत्त्व बैठा हुआ है। वह हरेक जगह समझता है कि धनसे ही कल्याण होता है। अरे भाई! धन एक जड़ चीज है, इससे जड़ चीजें ही खरीदी जा सकती हैं, परमात्मा नहीं खरीदे जा सकते। अगर परमात्मा धनसे खरीदे जाते, तो हमारे-जैसोंकी क्या दशा होती? बड़ी मुश्किल हो जाती! पर ऐसी बात नहीं है।

श्रोता—धर्मका अनुष्ठान तो धनसे ही होता है?

स्वामीजी—बिलकुल गलत है। रत्तीभर भी सही नहीं, परंतु धनके लोभीको यही दीखता है; क्योंकि धनमें बुद्धि बेच दिया, अपनी अक्लकी बिक्री कर दी। अब अक्लके बिना वे क्या समझें? अक्ल होती तो समझते। शास्त्रमें आया है—

धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता।

प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादस्पर्शनं वरम्॥

अर्थात् जो मनुष्य धर्मके लिये धनकी इच्छा करता हो, उसके लिये धनकी इच्छाका त्याग करना ही उत्तम है। कारण कि कीचड़ लगाकर धोनेकी अपेक्षा उसका स्पर्श न करना ही उत्तम है। राजा रन्तिदेवका पुण्य बहुत बड़ा माना जाता है। उनके सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश—सब प्रकट हो गये। बात क्या थी? गरीबोंको दु:खी देखकर उन्होंने अपना सर्वस्व दान कर दिया था। एक बार उनको और उनके परिवारको अड़तालीस दिनतक कुछ भी खाने-पीनेको नहीं मिला। उनचासवें दिन उनको थोड़ा घी, खीर, हलवा और जल मिला। वे अन्न-जल ग्रहण करना ही चाहते थे कि एक ब्राह्मण अतिथि आ गया। रन्तिदेवने उस ब्राह्मण देवताको भोजन करा दिया। ब्राह्मणके चले जानेके बाद रन्तिदेव बचा हुआ अन्न परिवारमें बाँटकर खाना ही चाहते थे कि एक शूद्र अतिथि आ गया। रन्तिदेवने बचा हुआ खाना, कुछ अन्न उसे दे दिया। इतनेमें ही कुत्तोंको साथ लेकर एक और मनुष्य वहाँ आया और बोला कि मेरे ये कुत्ते बहुत भूखे हैं, कुछ खानेको दीजिये। रन्तिदेवने बचा हुआ सारा अन्न कुत्तोंसहित उस अतिथिको दे दिया। अब केवल एक मनुष्यके पीने लायक जल बाकी बचा था। उसको आपसमें बाँटकर पीना ही चाहते थे कि एक चाण्डाल आ पहुँचा और बड़ी दीनतासे बोला कि महाराज, मैं बड़ा प्यासा हूँ, मुझे जल पिला दीजिये। रन्तिदेवने वह बचा हुआ जल भी उस चाण्डालको पिला दिया। उनकी परीक्षासे बड़े प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके सामने प्रकट हो गये! अगर भगवान‍्की प्राप्ति धनसे होती तो जल पिलानेमात्रसे वे कैसे प्रकट हो जाते?

धर्मका अनुष्ठान, पारमार्थिक उन्नति धनपर बिलकुल भी अवलंबित नहीं है। जो इनको धनके आश्रित मानते हैं, वे धनके गुलाम हैं, कौड़ीके गुलाम हैं। पर वे इस बातको समझ ही नहीं सकते! छोटे बालकके सामने एक सोनेकी मुहर रखी जाय और एक बताशा रखा जाय तो बताशा ले लेगा, मुहर नहीं लेगा। आप समझेंगे कि वह भोला है, पर अपनी दृष्टिसे वह भोला नहीं है, प्रत्युत समझदार है। बताशा तो मीठा होता है, और खानेके काम आता है, पर मुहरका वह क्या करे? ऐसे ही ये लोग धन-रूपी मीठा बताशा तो ले लेते हैं, पर भगवान‍्का भजन, धर्मका अनुष्ठान, परमात्माकी प्राप्ति—इन कीमती रत्नोंको फालतू समझ लेते हैं। वे समझते हैं कि इतना बड़ा पण्डाल बनाना, बिछौना बिछाना, लाउड-स्पीकर लगाना आदि सब काम धनसे ही होते हैं। यह बिलकुल मूर्खताकी बात है; इसमें रत्तीभर भी सच्चाई नहीं है; किंतु धनका लोभी इस बातको समझ ही नहीं सकता। मेरेमें ताकत नहीं है कि मैं यह बात आपको समझा दूँ, और आप सब इकट्ठे होकर भी मेरेको यह नहीं समझा सकते कि पारमार्थिक उन्नति धनके अधीन है।

पारमार्थिक उन्नति धनके अधीन नहीं है—यह बात मेरे भीतर ठीक बैठी हुई है। इस विषयमें मैंने खूब अध्ययन किया है। जैसे रुपया कमानेके लिये कलकत्ता जाते हैं। वहाँ रुपये कमा लेते हैं तो हम अपनी यात्रा सफल मान लेते हैं। ऐसे ही कथा करते हैं और उसमें रुपये आ जाते हैं तो अपनी कथाको सफल मान लेते हैं। यह उनकी बात हुई, जो रुपयोंके गुलाम हैं। परंतु कहीं अच्छे संत-महात्मा हों और उनकी सेवामें भोजन दिया जाय, कपड़ा दिया जाय तो आदमी प्रसन्न होता है कि आज मेरा भोजन तथा कपड़ा सफल हो गया! इसलिये सज्जनो! धन देनेसे सफल होता है, लेनेसे नहीं होता। जो लेनेसे सफलता मानते हैं, वे बेचारे समझते ही नहीं! रुपया आनेसे कोई फायदा नहीं है। मर जाओगे तो क्या एक कौड़ी भी साथ चलेगी? परंतु धर्मका अनुष्ठान किया है, भगवान‍्का भजन किया है, गुरुकी प्रसन्नता ली है तो यह सब धन यहाँ नहीं रहेगा, साथ चलेगा। हृदयसे दूसरोंको सुख पहुँचाया जाय, धर्मका अनुष्ठान किया जाय इसमें आपका जितना पैसा लग गया, वह सब सफल हो गया।

सत्संग-भजनमें रुपया लग जाय, तो बड़े भाग्यकी बात है, नहीं तो अच्छे काममें पापीका पैसा लग नहीं सकता—‘पापी रो धन पर ले जाय, कीड़ी संचै तीतर खाय।’ उस धनको डाकू ले जायँगे, इन्कम टैक्सवाले ले जायँगे, डॉक्टर ले जायँगे, वकील ले जायँगे। इनमें बेशक हजारों रुपये खर्च हो जायँ, पर सत्संग-भजन आदिमें वे खर्च नहीं कर सकेंगे। उनका पैसा भी खराब है और भीतरका भाव भी खराब है; अत: वे कैसे खर्च कर सकते हैं? मैं तो यह बात आपको समझानेमें अपनेको असमर्थ मानता हूँ; परंतु बात वास्तवमें ऐसी ही है।

आपकी, आपके पैसोंकी, आपकी वस्तुओंकी सफलता होती है देनेसे। खर्च करनेसे ही पैसा आपके काम आयेगा, संग्रहसे नहीं। संग्रहसे तो अभिमान ही बढ़ेगा। अभिमानके भीतर सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्ति, सम्पूर्ण दुर्गुण-दुराचार रहते हैं—‘संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥ ’ (मानस ७। ७४। ३)। यह अभिमान महान् नरकोंमें ले जानेवाला होगा। परंतु संग्रह करना अच्छा लगता है और खर्च करना बुरा लगता है! अरे भाई, रुपये बढ़िया नहीं हैं, उनका सदुपयोग बढ़िया है।

श्रोता—सदुपयोग भी तो तब करें, जब पासमें रुपया हो। रुपया न हो तो सदुपयोग कैसे करें?

स्वामीजी—जिसके पास रुपये नहीं हैं, उसपर सदुपयोगकी जिम्मेवारी है ही नहीं। मालपर जकात लगती है। माल ही नहीं तो जकात किस बातकी? इन्कम ही नहीं तो टैक्स किस बातका? गरीब आदमी जितना पुण्य कर सकता है, उतना धनी आदमी कभी नहीं कर सकता। अच्छे-अच्छे सन्त भिक्षाके लिये जाते हैं, तो अगर वे गरीब आदमीके घर पहुँच जायँ और वह संतको रोटीका एक टुकड़ा भी दे दे तो पुण्य हो जायगा। परंतु धनी आदमीके घर लाठी लिये चौकीदार बैठा रहता है और कहता है—‘ओ बाबा, कहाँ जाते हो; यहाँ नहीं, आगे जाओ।’ बेचारे धनी आदमियोंके भाग्य फूट गये! आप कहते हो कि भाग्यवान् हैं, तो किस बातमें भाग्यवान् हैं? चोरोंमें जो सरदार होता है वह साहूकार होता है क्या? वे बड़े हैं तो किस बातमें बड़े हैं? क्या नरकोंमें जानेके लिये, डूबनेके लिये बड़े हैं? वास्तवमें बड़ा तो वह है, जो अपना और दूसरोंका भी कल्याण कर दे। बड़ा वही है, जिसने साथ चलनेवाले धनका संग्रह कर लिया है। परंतु जिसका धन यहीं रह जाता है और खुद खाली हाथ चला जाता है, वह बड़ा कैसे हुआ?

दातारं कृपणं मन्ये मृतोऽप्यर्थं न मुञ्चति।

अदाता हि महात्यागी धनं हित्वा हि गच्छति॥

अर्थात् जो दान-पुण्य करता है, वह बड़ा कंजूस है; क्योंकि वह मरनेपर भी धनको छोड़ता नहीं, सब साथमें ले जाता है। परंतु जो दान-पुण्य नहीं करता, वह बड़ा त्यागी है; क्योंकि वह सब धन ज्यों-का-त्यों ही यहाँ छोड़कर चला जाता है, साथमें कुछ भी नहीं ले जाता। धनके लोभी ऐसे त्यागी हुआ करते हैं!

गुरुकी सेवा, धर्मका अनुष्ठान रुपयोंके अधीन है—ऐसी जिनकी धारणा है, वे मेरी बात समझ ही नहीं सकते। कारण कि वे रुपयोंमें ही एकदम रच-पच गये। मनमें, बुद्धिमें सब जगह रुपया-ही-रुपया है। वह क्या समझे बेचारा? ‘मायाको मजूर बंदो कहा जाने बंदगी।’ एक संतके पास कोई धनी आदमी आया और उसने एक दुशाला भेंट किया। सन्तने कहा—भाई, हमें जरूरत नहीं है, क्या करेंगे? तो उसने कहा कि महाराज, काम आ जायगा। संतने उससे पूछा कि बात क्या है? किसलिये देते हो? तब उसने कहा—महाराज, आपको देनेसे हजार गुना पुण्य होगा, इसलिये देता हूँ। ऐसा सुनकर सन्तने कहा—मेरेपर एक हजारका कर्जा हुआ; अत: अभी एक तो तू ले ही जा, बाकी नौ सौ निन्यानबेका कर्जा मेरेपर रहा। ऐसा सुनकर वह आदमी चुपचाप दुशाला लेकर चला गया! एक ले लें और बदलेमें हजार देना पड़े—इतना कर्जा कौन उठाये? ये काँटा (तौल) काटनेवाले और ब्याज लेनेवाले भी इतना तो नहीं लेते! धनको ही ऊँचा दर्जा दे रखा है। धन देनेमें, दान-पुण्य करनेमें भी भाव लेनेका ही रहता है। अब ऐसे बेसमझको कौन समझाये? मनुष्यमात्रमें ताकत है कि अगर वह निष्पक्ष होकर सरल हृदयसे समझना चाहे तो बड़ी-बड़ी तात्त्विक बातोंको भी समझ सकता है। इतनी समझ मनुष्यको भगवान‍्ने दी है। परंतु मनुष्यने अपनी सब समझ रुपयोंमें लगा दी, और रुपयोंमें ही नहीं, रुपयोंकी संख्या बढ़ानेमें लगा दी। इतना ही नहीं, अपनी समझ पापोंमें, चालाकियोंमें लगा दी कि किस तरह इन्कमटैक्सकी चोरी करें, किस तरह सेल्सटैक्सकी चोरी करें, आनेवालोंको कैसे ठगें, आदि-आदि। जितनी बुद्धिमानी थी, वह सब-की-सब पाप बटोरनेमें लगा दी। अन्त:करण महान् अशुद्ध हो जाय, आगे नरकोंमें जायँ, चौरासी लाख योनियोंमें दु:ख भोगें—इसमें अपनी समझदारी लगा दी। लोग कहते हैं—वाह-वाह यह लखपति बन गया, करोड़पति बन गया। बड़ा होशियार, चलता पुर्जा है। यह पुर्जा चलता (जन्मता-मरता) ही रहेगा, बस। अब इसको विश्राम नहीं मिलेगा, कल्याण नहीं होगा। पर इस बातको समझे कौन?

मैं पूरबियो पूरब देस को,

म्हारी बोली लखे नहिं कोय।

म्हारी बोली सो लखे,

जो घर पूरबलो होय॥

मैं तो पूरब देशमें रहनेवाला हूँ। मेरी बोलीको यहाँ कोई नहीं समझता। मेरी बोली (भाषा) वही समझ सकता है, जो पूरब देशका हो। अनादि परमात्मतत्त्व ‘पूरब’ है। पूरब देशकी बोली यहाँ रहनेवाला कैसे समझे? जो रुपयोंके गुलाम हैं, वे पारमार्थिक बातें कैसे समझें? कहते हैं कि धर्मका अनुष्ठान पैसोंसे होगा, सत्संगका आयोजन पैसोंसे होगा, तो जिसको गर्ज हो, वह पैसा लगाये। गायका दूध चाहिये तो गायको चारा आदि दो। अगर दूध नहीं चाहिये तो गायको चारा आदि मत दो। ऐसे ही सत्संग सुनना हो तो उसके आयोजनमें पैसा लगाओ, नहीं सुनना हो तो कोई जरूरत नहीं। संतोंको क्या गर्ज है? पैसोंके बिना आपका काम नहीं चलता, पर संतोंका खूब अच्छी तरहसे चलता है।

सत् -शास्त्रोंके प्रचारमें, सद्भावोंके प्रचारमें रुपये लग जायँ तो संसारमें इसके समान पुण्यका कोई काम है ही नहीं। कारण कि इनके प्रचारसे लोगोंके भीतरका अँधेरा दूर हो जाता है, आध्यात्मिक लाभ हो जाता है। इसमें जिसका पैसा लग गया, वह बड़ा भाग्यशाली है। ऋषिकेश—स्वर्गाश्रमकी बात है। वैश्य जातिकी एक विधवा बहन थी। ससुरालवालोंने उसका धन दबा लिया था। वह वहाँ साधुओंको भिक्षा दिया करती। भिक्षा कैसे देती? अपने घरमें सिलाईका काम करके पैसे कमाती और उससे अन्न खरीदकर रोटी बनाती और भिक्षा देती। शरणानन्दजी महाराजने कहा कि जैसे सेठ एक ही (जयदयालजी गोयन्दका) हैं, ऐसे ही एक सेठानी भी यहाँ है। लखपति सेठानियाँ तो बहुत हैं, पर उनको सेठानीकी पदवी नहीं मिली। सेठानीकी पदवी मिली उस विधवा बहनको जो सिलाई कर-करके पैसा कमाती और भिक्षा देती। वह संतोंकी दृष्टिमें सेठानी हुई। क्या रुपयोंसे कोई सेठानी होती है? नहीं होती।

महाभारतमें एक कथा आती है। एक बड़े अच्छे ऋषि थे। एक बार उनके यहाँ राजरानियाँ आयीं। उन्होंने देखा कि ब्राह्मणीके शरीरपर साधारण कपड़े हैं और माँग (सुहागका चिह्न)-के सिवाय कोई गहना नहीं है तो वे ब्राह्मणीसे बोलीं कि आप लोग तो हमारे राजाजीके गुरु हो, प्रजाके गुरु हो, पर आपके शरीरपर कोई गहना न देखकर हमें बहुत बुरा लगता है, हमें बड़ी शर्म आती है। ब्राह्मणीको उनकी बात जँच गयी; क्योंकि स्त्रियोंको गहनोंका बड़ा शौक होता है। उसने पतिदेवसे कहा कि मेरेको गहना चाहिये। ऋषिने कहा—ठीक है, ले आयेंगे गहना। जहाँतक बने, पतिको अपनी शक्तिके अनुसार स्त्रीकी न्याययुक्त इच्छाको पूरा करना चाहिये, यह उसका कर्तव्य है। ऋषि एक राजाके पास गये। राजाने पूछा कि महाराज, कैसे पधारे? ऋषिने कहा कि मुझे सोना चाहिये। राजाने खजानेके हिसाबकी बही लाकर सामने रख दी और कहा कि महाराज, आप हिसाब देख लो। ऋषिने देखा कि राजाकी आय और व्यय बराबर है, खजानेमें कुछ नहीं है। ऋषिने कहा कि ठीक है, मैं दूसरे राजाके पास जाता हूँ। राजाने कहा कि मैं भी आपके साथ चलूँगा। वे दोनों वहाँसे चल दिये और तीन-चार राजाओंके पास गये, पर सब जगह आय-व्यय बराबर मिला, खजानेमें कुछ नहीं मिला। फिर पूछनेपर पता लगा कि अमुक राक्षसके पास धन मिलेगा। वे उस राक्षसके पास गये। राक्षसने उनसे कहा कि महाराज, बहुत धन पड़ा है, चाहे जितना ले जाओ। तात्पर्य क्या हुआ? कि धन राजाओंके पास नहीं मिला, राक्षसके पास मिला! आपने पूछा है कि धनके बिना गुरु-सेवा कैसे हो? धार्मिक अनुष्ठान कैसे हो? इसलिये यह बात बतायी। आपकी जो शंका है, वह दूर हो जाय तो बड़ी अच्छी बात है। परंतु मेरेको बहम है कि वह शायद ही दूर हो; क्योंकि रुपया बड़ा प्रिय लगता है।

सत्संग आदिमें कोई पैसा खर्च कर दे तो उसकी बड़ी महिमा होती है। लोग कहते हैं कि अमुक आदमीने बड़ा भारी पुण्य किया। परंतु वास्तवमें वह बेचारा मारसे बच गया! पुण्य करनेका अर्थ टैक्स देना। धनी आदमी जो अच्छे काममें धन खर्च करते हैं, वह उनका टैक्स है। टैक्स चुकानेकी महिमा नहीं होती। दस हजार रुपये टैक्स दे दिया तो यह नहीं कहते कि बड़ा दान कर दिया। टैक्स देकर तो वह मारसे बच गया, नहीं देता तो डंडा पड़ता। इसलिये दान-पुण्य करना कोई बड़ी बात नहीं है, यह तो जो धन रखते हैं, उसका टैक्स है। बड़ी बात तो यह है कि भगवान‍्के भजनमें लग जाओ, भगवान‍्की प्राप्ति कर लो। सगुण क्या है? निर्गुण क्या है? साकार क्या है? निराकार क्या है? बंधन क्या है? मुक्ति क्या है—इन बातोंको ठीक तरहसे समझ लो।

आपके पास धन है तो धनपर टैक्स लगेगा। आपके पास विद्या है तो विद्यापर टैक्स लगेगा। इनको दूसरोंकी सेवामें लगाओ। सरकार तो अपना टैक्स कान पकड़कर जबर्दस्ती ले लेगी। परंतु जहाँ धर्मकी बात है, आप प्रसन्न होकर दोगे तो ले लेगा, नहीं तो आपपर कर्जा रहेगा।

ब्रह्मचारी यतिश्चैव पक्वान्नं स्वामिनावुभौ।

तयोरन्नमदत्त्वा च भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥

एक तो ब्रह्मचारी और एक संन्यासी, जो त्यागी हैं, बनी बनायी रसोईके भागीदार हैं। भोजन बना हुआ हो तो इनको दे दो, बस। जो इनको अन्न न देकर खुद भोजन कर लेता है, वह एक महीनेका चान्द्रायण व्रत करे, तब उसकी शुद्धि होती है। इनको अन्न न देनेका इतना पाप लगता है। जो खेतमें काम नहीं आया, दूकानमें काम नहीं आया, घरके धंधेमें काम नहीं आया, उसको भोजन कराओ और न कराओ तो पाप लग जाय—यह कोई न्याय है? हमने कमाया, हमने बनाया, हमने सब काम किया और उसने किसी भी काममें रत्तीभर भी सहायता नहीं की, उसको भोजन न दें तो पाप लग जाय, कितना अन्याय है? इसका कारण क्या है? जैसे आप धन इकट्ठा करते हो, वैसे ही ब्रह्मचारी और साधु भी धन इकट्ठा कर सकता है। ब्रह्मचारी और साधु पढ़े-लिखे भी होते हैं। कहीं घण्टाभर पढ़ा दें तो क्या उनको रोटी नहीं मिलेगी? आपमें जो योग्यता है, वह योग्यता क्या उनमें नहीं है? अगर वे धन इकट्ठा करेंगे तो वह धन आपके यहाँसे ही आयेगा, और कहाँसे आयेगा बताओ? उन्होंने धन इकट्ठा नहीं किया तो वह धन आपके पास ही रहा और कहाँ रहा? अत: जिसने थोड़ा भी धन नहीं लिया, सब धन आपके पास ही रहने दिया, उसको समयपर टुकड़ा तो दे दो! नहीं देते हो तो पाप लगेगा।

जो धनका संग्रह करता है, वह धन समुदायमेंसे ही आता है, उतनी कमी हो जाती है समुदायमें। पर जिसने धन लिया ही नहीं, वह धन किसके पास रहा, बताओ? समुदायके पास ही तो रहा। जितने जीव जन्म लेते हैं, उनका प्रारब्ध पहले बनता है, पीछे शरीर मिलता है। उसके जीवन-निर्वाहके लिये अन्न, जल आदिका प्रबन्ध पहलेसे किया रहता है। अत: उसका कहीं-न-कहीं अन्न है, कहीं-न-कहीं जल है, कहीं-न-कहीं वस्त्र है। वह जी रहा है तो उसका उन अन्न, जल, वस्त्र आदिपर हक है। आपके पास जो आवश्यकतासे अधिक अन्न, जल आदि है, उसपर उसका हक लगता है। अत: वह सामने आये तो उसका हक उसे दे दो।

शरणानन्दजी महाराज सूरदास थे। वे एक जगह गये, जहाँ कोई परिचित आदमी नहीं था। वहाँसे उनको आगे स्टेशनतक जाना था, जिसका चार आना टिकट लगता था। वे एक आदमीसे बोले कि भाई! टिकट लाकर दो। वह बोला—बाबा, माफ करो। महाराजजी बोले—माफ कैसे करें तुमको? माफ नहीं कर सकते। माफ तो तब करें जब मैं पात्र न होऊँ और तुम्हारे पास पैसा न हो। मैं पात्र हूँ और तुम्हारे पास पैसा है, फिर माफ कैसे कर दें? उस आदमीको टिकट लाकर देना पड़ा। अपराधीको माफ नहीं किया जाता। अपराध क्या है? जैसे तुम पैसे रखते हो वैसे मैं भी पैसे रख सकता था। पर मैंने पैसे रखे ही नहीं, तो वे पैसे कहाँ गये? तुम्हारे पास ही रहे। तुम खजानची हो। जब हमें जरूरत हो, तब दे दिया करो। जिसको मिलता है, उसको अपने भाग्यका मिलता है। क्या आप अपने भाग्यका देते हो? क्या आप रोटी नहीं खाते? कपड़ा नहीं पहनते? मकानमें नहीं रहते? आप तो पूरा खाते हो, पहनते हो; परंतु जो जमा करते हो, उसपर हमारा हक है। साहूकारीसे दे दो तो अच्छी बात है, नहीं तो दण्ड होगा। माफी कैसे होगी?

जो रात-दिन रुपयोंके लोभमें लगे हैं, वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। जिस बाजारमें वे गये ही नहीं, उस बाजारके भावोंको वे कैसे समझेंगे? वे जिस बाजारमें रहते हैं, उसी बाजारके भावोंको वे समझ सकते हैं। वे रुपयोंके बाजारमें ही रहते हैं। त्यागका भी एक विलक्षण, अलौकिक बाजार है, पर उसकी बात वही समझ सकता है, जो उसी बाजारका हो।

एक अच्छे महात्मा थे। उनसे मैंने अलग-अलग समयपर दो प्रश्न किये। एक समय तो उनसे यह प्रश्न किया कि आप इतने ऊँचे दर्जेकी बातें सुनाते हो, पर क्या आप यह जानते हो कि हमलोग उन बातोंको ठीक समझते हैं? अगर हमलोग उन बातोंको न समझते हों, तो उन बातोंका मूल्य क्या हुआ? उन्होंने उत्तर दिया कि मेरी बातें आकाशमें रहेंगी; जब कोई समझदार होगा, पात्र होगा, उसके सामने वे प्रकट हो जायँगी। दूसरी बार मैंने कहा कि भगवान‍्के घरमें पोल है, न्याय नहीं है। उन्होंने पूछा—कैसे? तो मैंने कहा कि आप-जैसे महात्माओंको हमारे सामने ले आये। हमलोग कोई पात्र थे क्या? भूखेको अन्न देना चाहिये, प्यासेको जल देना चाहिये, ऐसे ही जो योग्य हों, उनको ऊँचे दर्जेकी बातें सुनानी चाहिये। आप-जैसे तो सुनानेवाले मिले और हमारे-जैसे पात्र मिले, इससे मालूम होता है कि भगवान‍्के घर बड़ी पोल है—

अंधाधुंध सरकार है, तुलसी भजो निसंक।

खीजै दीनो परमपद, रीझै दीनी लंक॥

ऐसा मैंने कहा तो वे महात्मा बोले—बेटी कौन-सी कुँआरी रहती है? अच्छा वर मिल जाय तो ठीक है, नहीं तो कैसा भी वर मिले, विवाह करना ही पड़ता है। इस तरह पात्र न होनेपर भी भगवान‍्की कृपासे ऊँचे दर्जेकी बातें मिल जाती हैं।

बीकानेरकी बात है। एक जगह सत्संग हो रहा था। गाड़ीसे उतरते ही लोग मुझे सीधे वहाँ ले गये और कहा कि कुछ सुनाओ। मैंने कहा—मेरे मनमें तो ऐसी आयी है कि मेरे-जैसोंको तो यहाँसे कान पकड़कर निकाल देना चाहिये कि यहाँ सत्संग हो रहा है, तुम कैसे आ गये बीचमें। भगवान‍्के यहाँ पोल चलती है, इसलिये सत्संगकी बातें कहते और सुनते हैं, नहीं तो इतने ऊँचे दर्जेकी बातें हम सुननेके लायक नहीं हैं। फिर भी भगवान् लाज रखते हैं कि कोई बात नहीं, बच्चा है बेचारा। ऊँचे दर्जेकी बातें उनके सामने ही कहनी चाहिये, जो अधिकारी हैं। संतोंने कहा है—

हरि हीरा की गाँठड़ी, गाहक बिनु मत खोल।

आसी हीरा पारखी, बिकसी मँहगे मोल॥

परंतु भगवान‍्की इतनी कृपा है कि हमारे-जैसे अयोग्यको भी इतनी विचित्र-विचित्र बातें मिलती हैं। भगवान् अधिकारी नहीं देखते, योग्यता नहीं देखते। वर्षा होती है तो जंगलपर भी पानी बरसता है और समुद्रपर भी। समुद्रमें पानीकी कमी है क्या? पर फिर भी बरसता है। ऐसे ही जो संत-महात्मा होते हैं वे भी कृपा करके बरस पड़ते हैं, कोई ग्रहण करे, चाहे न करे। इसी तरह भगवान् भी कृपा करते हैं, तो पात्र-कुपात्र नहीं देखते। कुपात्रको भी भगवान् कृपा करके ऐसा बढ़िया (सत्संगका) मौका देते हैं; अगर ऐसा बढ़िया मौका सुपात्रको मिल जाय तो फिर कहना ही क्या है! मैंने तो एक सज्जनसे कहा था कि आपकी बुद्धि अच्छी है, अगर आप इधर लग जाओ तो बहुत लाभ उठा सकते हो। पर उन्होंने मेरी बात मानी नहीं। मेरे मनमें आयी कि ऐसी अच्छी बुद्धि है, अच्छे काममें लग जाय तो कितनी बढ़िया बात है! परंतु उनको जँचती नहीं तो हम क्या करें?

आप लोगोंने धन कमानेमें खूब बुद्धि लगायी है। बेईमानी करनेमें, झूठ-कपट, ठगी-जालसाजी करनेमें, टैक्सोंसे बचनेमें बुद्धि लगानी पड़ती है। बिना बुद्धि लगाये ये काम नहीं होते। ज्यों-ज्यों नया कानून बनता है, त्यों-त्यों आपकी बुद्धि और तेज होती है। खुदसे काम न होता हो तो वकीलसे पूछते हैं; क्योंकि वह आपका अक्लदाता है, गुरुजी महाराज है। वह आपको बताता है कि ऐसा करो, इस तरहसे करो। उस गुरुजीसे शिक्षा ले-लेकर आप रात-दिन अध्ययन करनेमें लगे हैं; फिर मेरे-जैसे भिक्षुककी बात कौन माने? आपको वहम है कि इनकी बात मानेंगे तो हम भी इन्हींकी तरह हो जायँगे।

त्याग क्या है? भजन-स्मरण क्या है? भगवत्सम्बन्धी बात क्या है? धर्म क्या है? इसको दूसरा कोई क्या जाने, जाननेवाला ही जानता है। पैसेवाले समझते हैं कि यह पैसोंके अधीन है। परंतु यह पैसोंके अधीन नहीं है, बाहरी चीजोंके अधीन नहीं है। यह तो भावके अधीन है—‘भावग्राही जनार्दन:’ भगवान् भावग्राही हैं। जिसका भाव होगा, उसकी आध्यात्मिक उन्नति होगी। कलकत्तेकी बात है। एक धनी आदमी श्रीजयदयालजी गोयन्दकासे मिलने आया। बात चलनेपर उसने कहा कि धनसे सब कुछ मिलता है। गोयन्दकाजीने कहा कि धनसे सब कुछ मिलता है, पर महात्मा नहीं मिलते। उसने कहा धनसे तो कई महात्मा आ जायँ। गोयन्दकाजी बोले कि जो धनसे मिलते हैं, वे महात्मा नहीं होते और जो महात्मा होते हैं, वे धनसे नहीं मिलते। धनसे धनका गुलाम मिलता है। जैसे, हमें सौ रुपयोंमें घड़ी मिलती है, तो क्या दुकानदारके सौ रुपये लगे हैं? अगर उसके सौ रुपये लगे हैं, तो फिर वह बेचे ही क्यों? अत: जो चीज पैसोंसे मिलती है, वह पैसोंसे कम कीमती होती है। पैसोंके बदले जो कोई मिलेगा, वह पैसोंका गुलाम ही होगा। सत्संग पैसोंसे नहीं होता। यह तो भगवान‍्की कृपासे ही होता है—‘बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता॥ ’ (मानस ५। ७। २)। कृपा करते समय भगवान् यह नहीं देखते कि इसने कितना पुण्य किया है? इसमें कितनी योग्यता है? इसका कितना अधिकार है?

सतगुरु पूठा इंद्रसम, कमी न राखी कोय।

वैसा ही फल नीपजै, जैसी भूमी होय॥

वर्षा तो बरस जाती है, पर आगे भूमिमें जैसा बीज होगा वैसा ही फल होगा। मारवाड़के लोग समझते हैं, एक मतीरा होता है और एक बिस्लुंबा (तस्तुंबा) होता है। दोनोंकी बेल बराबर ही दीखती है और फल भी आरम्भमें समान दीखता है। परंतु मतीरा तो मीठा होता है और बिस्लुंबा बड़ा कड़ुआ होता है। वर्षा भी एक, जमीन भी एक, हवा भी एक, धूप भी एक, खाद भी एक, फिर यह फर्क क्यों है? फर्क बीजमें है जैसा बीज होगा, उसीके अनुसार फल होगा। वह बीज बदला नहीं जा सकता। ऐसे ही चौरासी लाख योनियाँ बदली नहीं जा सकतीं, पर मनुष्य बदल सकता है। मनुष्य अपनेको बहुत बड़ा संत-महात्मा, तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त बना सकता है—इतनी योग्यता भगवान‍्ने दी है। परंतु मनुष्यने वह योग्यता पैसोंमें लगा दी है! तेलीके घर जो तेल होता है, वह पैर धोनेके लिये थोड़े-ही होता है? लाखों रुपयोंकी एक मणि लाकर दी, तो बोरीमेंसे एक धागा निकाल लिया और मणिको उसमें पिरोकर पैरोंमें बाँध लिया। बाँधनेवालेकी बुद्धि तो देखो! राजाके मुकुटपर लगनेवाली मणि क्या पैरोंमें बाँधनेके लिये है? ऐसे ही मनुष्य-जीवन-जैसी बढ़िया चीजको तुच्छ भोगोंमें और रुपयोंके संग्रहमें लगा दिया! मनुष्यजन्म खराब क्यों किया भाई? तुम्हारी जगह कोई दूसरा जीव आता तो अपना कल्याण करता बेचारा। परंतु तुमने आकर यह सीट रोक ली। गीता कहती है कि ऐसा आदमी निरर्थक ही जीता है—‘मोघं पार्थ स जीवति॥ ’ (३। १६)। अर्थात् वह मर जाय तो अच्छा है! कारण कि मनुष्य-शरीर पाकर कल्याण नहीं करता, रात-दिन पशुओंकी तरह भोग भोगनेमें लगा हुआ है। पशुओंके भी बाल-बच्चे होते हैं तो वे राजी होते हैं। एक सूअरीके पाँच-सात, दस-ग्यारह बच्चे होते देखे हैं। इतने बच्चे उसके साथ घूमते हैं, तो वह राजी होती है। ऐसे ही आप भी बाल-बच्चोंमें राजी होते हैं। यह मनुष्य-जीवन इसीलिये मिला है क्या? बच्चोंका पालन-पोषण करो, उनको शिक्षा दो, पर उनमें मोह मत करो। अगर वे आपका कहना नहीं मानते तो उनका भाग्य फूट गया, पर आपका तो काम बन गया! एक कुम्हार था। एक दिन वह अपने घर गया और उसने अपनी स्त्रीसे पूछा कि रसोई बनायी या नहीं? स्त्रीने कहा कि रसोई तो नहीं बनी। घरमें अन्नका दाना भी नहीं है, किसकी रसोई बनायें? वह कुम्हार एक हाँड़ी लेकर बाजार गया और एक दुकानदारसे कहा कि यह हाँड़ी ले लो और बदलेमें थोड़ा बाजरा दे दो। दूकानदारने हाँड़ी लेकर बदलेमें बाजरा दे दिया। कुम्हार बाजरा लेकर घरपर आया। फिर उन्होंने रसोई बनाकर भोजन कर लिया। दूसरे दिन वह दूकानदार कुम्हारसे मिला तो उसने कहा—अरे! यह कैसी हाँड़ी दी तुमने? हाँड़ी तो फूटी हुई थी, चूल्हेपर रखी तो आग बुझ गयी। तुम्हारी हाँड़ी चढ़ी ही नहीं! तब वह कुम्हार बोला कि तुम्हारी हाँड़ी तो नहीं चढ़ी, पर हमारी हाँड़ी तो चढ़ गयी (हमारी रसोई तो बन गयी)। ऐसे ही जो अपना काम कर ले उसकी हाँड़ी तो चढ़ ही गयी। आप बालकोंका ठीक तरहसे पालन-पोषण करें, उनको अच्छी शिक्षा दें तो आपकी हाँड़ी चढ़ गयी।

सज्जनो! अपना उद्धार कर लो, अभी मौका है। भगवान‍्ने बड़ी कृपा करके यह मानव-शरीर दिया है। यह मानव-शरीर भगवान‍्का भजन करनेके योग्य है, इसलिये इसको निरर्थक नष्ट मत होने दो। इस संसारमें अपना कोई भी नहीं है, अपने तो एक परमात्मा ही हैं। यह जो आपके पास धन है, शरीर है, योग्यता है, यह संसारकी सेवाके लिये है। शरीर भी आपका नहीं है, मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ भी आपकी नहीं हैं, कुटुम्ब भी आपका नहीं है, रुपये-पैसे भी आपके नहीं हैं। ये तो दूसरोंकी सेवा करनेके लिये हैं। अपने लिये तो केवल परमात्मा ही हैं। इससे भी बढ़िया बात है कि आप परमात्माके लिये हो जाओ। परमात्मासे अपने लिये कुछ भी मत चाहो। जो परमात्मासे कुछ भी नहीं चाहता, उसकी गरज परमात्मा करते हैं!

एक बाबाजी थे। एक दिन वे एक ऊँची टोपी पहनकर बड़ी मस्तीसे भजन कर रहे थे। भगवान् विनोदी ठहरे, वे बाबाजीके पास आये और बोले—वाह-वाह, आज तो बड़ी ऊँची टोपी लगाकर बैठे हो! बाबाजी बोले—किसीसे माँगकर थोड़े ही लाया हूँ, अपनी है। भगवान‍्ने कहा—मिजाज करते हो? बाबाजी बोले—उधार लाये हैं क्या मिजाज? भगवान् बोले—तुम मेरेको जानते हो कि नहीं? बाबाजी बोले—अच्छी तरहसे जानता हूँ। भगवान‍्ने कहा—मैं सबसे कह दूँगा कि यह अभिमानी है, भक्त नहीं है, तब क्या दशा होगी? दुनिया भक्त मानकर ही तो तुम्हारी सेवा करती है और तुम मिजाज करते हो? बाबाजी बोले—तुम कह दोगे तो मैं भी कह दूँगा कि मैंने भजन करके देखा है, भगवान् कुछ भी नहीं हैं। तुम्हारी प्रसिद्धि तो हमने ही कर रखी है, नहीं तो कौन पूछता तुम्हें? भगवान् बोले—ऐसा मत कहना। बाबाजीने कहा—तो आप भी मत कहना, हम भी नहीं कहेंगे। इस प्रकार भक्त भगवान‍्की भी गरज नहीं करते। ऐसे भक्तोंके लिये भगवान् कहते हैं—‘मैं तो हूँ भगतनको दास, भगत मेरे मुकुटमणि।’ भक्तोंमें ऐसा नहीं है कि साधु ही भक्त होते हैं, बहनें भी भक्त होती हैं।

मीराँ जाई मेड़ते परणाई चितोड़।

राम भगतिके कारणे सकल सृष्टि को मोड़।

राम दड़ी चौड़ै पड़ी, सब कोई खेलो आय।

दावा नहीं संतदास, जीते सो ले जाय॥

जाट भजो गूजर भजो, भावे भजो अहीर।

तुलसी रघुबर नाम में, सब काहू का सीर॥

कोई भी क्यों न हो, वह भगवान‍्का अंश है। भगवान‍्का अंश होनेसे प्रत्येक जीवका भगवान् पर हक लगता है; जैसे बालकका अपनी माँ पर हक लगता है। भगवान् हमें कपूत या सपूत कह सकते हैं, पर ‘पूत नहीं है’ अर्थात् मेरा नहीं है—ऐसा नहीं कह सकते। हम चाहे कपूत हैं, चाहे सपूत, पर पूत तो हैं ही, हैं तो हम भगवान‍्के ही। अब कपूताई दूर कर दो तो काम बन गया, बस। इतनी-सी बात है, कोई लंबी-चौड़ी बात नहीं।

आप कहते हैं कि धनके बिना धार्मिक आयोजन कैसे होगा? वास्तवमें उस धनको ही धार्मिक आयोजनोंकी गरज है, धार्मिक आयोजनोंको उस धनकी गरज नहीं है। जो धनकी गरज मानते हैं, वे धनके दास हैं, धर्मके दास नहीं। धर्मके लिये तो सही पैसोंकी भी जरूरत नहीं है, फिर पापसे कमाये हुए पैसोंकी क्या जरूरत है? हमारे घरमें पानीका नल लगा है तो इसका मतलब यह नहीं कि हम धोये हुए कपड़ोंको कीचड़से मैला कर लें और फिर उनको नलसे धोयें। ऐसे ही झूठ, कपट, बेईमानी करके कमाये हुए पैसोंसे धर्म करते हो, तो फिर पहले पाप ही क्यों करते हो? कपड़ेमें एक छटाँक कीचड़ लग जाय तो वह एक छटाँक जलसे साफ नहीं होता। सेरोंभर जल लगनेपर भी बाहरसे भले ही धुल जाय, पर भीतरसे गंदापन बाकी रह ही जाता है। इसलिये धर्मके लिये भी जो पाप करता है कि पाप करके पैसा कमायें और फिर उसे अच्छे काममें लगा दें, तो उसका पैसा अच्छे काममें लगेगा ही नहीं और लगेगा तो भी वह पापसे शुद्ध होगा नहीं। सब-का-सब पैसा लगा दें, तो भी वह पाप दूर नहीं होगा। अगर धर्म करनेकी आपकी इच्छा होती तो पहले पाप करते ही नहीं। अगर पाप करते हो, तो केवल लोगोंको दिखानेके लिये धर्म करते हो। धर्मकी भावना भीतर है ही नहीं। असली धर्मका तत्त्व जाननेवाला धर्मके लिये पाप कर ही नहीं सकता।

एक बड़े सदाचारी और विद्वान् ब्राह्मण थे। उनके घरमें प्राय: रोटी-कपड़ेकी तंगी रहती थी। साधारण निर्वाहमात्र होता था। वहाँके राजा बड़े धर्मात्मा थे। ब्राह्मणीने अपने पतिसे कई बार कहा कि आप एक बार तो राजासे मिल आओ, पर ब्राह्मण कहते कि वहाँ जानेके लिये मेरा मन नहीं करता। ब्राह्मणीने कहा कि मैं आपसे माँगनेके लिये नहीं कहती। वहाँ जाकर आप माँगो कुछ नहीं, केवल एक बार जाकर आ जाओ। ज्यादा कहा तो स्त्रीकी प्रसन्नताके लिये वे राजाके पास चले गये। राजाने उनको बड़े त्यागसे रहनेवाले गृहस्थ ब्राह्मण जानकर उनका बड़ा आदर-सत्कार किया और उनसे कहा कि आप एक दिन और पधारें। अभी तो आप अपनी मर्जीसे आये हैं, एक दिन आप मेरेपर कृपा करके मेरी मर्जीसे पधारें। ऐसा कहकर राजाने उनकी पूजा करके आनन्दपूर्वक उनको विदा कर दिया। घर आनेपर ब्राह्मणीने पूछा कि राजाने क्या दिया? ब्राह्मण बोले—दिया क्या, उन्होंने कहा कि एक दिन आप फिर आओ। ब्राह्मणीने सोचा कि अब माल मिलेगा। राजाने निमन्त्रण दिया है, इसलिये अब जरूर कुछ देंगे।

एक दिन राजा रात्रिमें अपना वेश बदलकर, बहुत गरीब आदमीके कपड़े पहनकर घूमने लगे। ठण्डीके दिन थे। एक लुहारके यहाँ एक कड़ाह बन रहा था। उसमें घन मारनेवाले आदमीकी जरूरत थी। राजा इस कामके लिये तैयार हो गये। लुहारने कहा कि एक घंटा काम करनेके दो पैसे दिये जायँगे। राजाने बड़े उत्साहसे, बड़ी तत्परतासे दो घंटे काम किया। राजाके हाथोंमें छाले पड़ गये, पसीना आ गया, बड़ी मेहनत पड़ी। लुहारने चार पैसे दे दिये। राजा उन चार पैसोंको लेकर आ गया और आकर हाथोंपर पट्टी बाँधी। धीरे-धीरे हाथोंमें पड़े छाले ठीक हो गये।

एक दिन ब्राह्मणीके कहनेपर वे ब्राह्मण-देवता राजाके यहाँ फिर पधारे। राजाने उनका बड़ा आदर किया, आसन दिया, पूजन किया और उनको वे चार पैसे भेंट दे दिये। ब्राह्मण बड़े संतोषी थे। वे उन चार पैसोंको लेकर घर पहुँचे। ब्राह्मणी सोच रही थी कि आज खूब माल मिलेगा। जब उसने चार पैसोंको देखा तो कहा कि राजाने क्या तो दिया और क्या आपने लिया! आप-जैसे पण्डित ब्राह्मण और देनेवाला राजा! ब्राह्मणीने चार पैसे फेंक दिये। जब सुबह उठकर देखा तो वहाँ चार जगह सोनेकी सीकें दिखायी दीं। सच्चा धन उग जाता है। सोनेकी उन सीकोंको वे रोजाना काटते पर दूसरे दिन वे पुन: उग आतीं। उनको खोदकर देखा तो मूलमें वे ही चार पैसे मिले!

राजाने ब्राह्मणको अन्न नहीं दिया; क्योंकि राजाका अन्न शुद्ध नहीं होता, खराब पैसोंका होता है। मदिरा आदिपर लगे टैक्सके पैसे होते हैं, चोरोंको दण्ड देनेसे प्राप्त हुए पैसे होते हैं—ऐसे पैसोंको देकर ब्राह्मणको भ्रष्ट नहीं करना है। इसलिये राजाने अपनी खरी कमाईके पैसे दिये। आप भी धार्मिक अनुष्ठान आदिमें अपनी खरी कमाईका धन खर्च करो।