सत्संगका मूल्य समझें

सत्संग करनेवाले भाई-बहनोंकी प्राय: यह शिकायत रहती है कि जो हम सुनते हैं, वह याद नहीं रहता। पल्ला-झाड़ सत्संग होता है; उठ गये और पल्ला झाड़कर चल देते हैं। अत: इससे कोई फायदा नहीं होता। सत्संगकी बातें काममें आती नहीं, याद रहती नहीं। इस विषयमें मैं जो कहता हूँ, उसे आप लोग ध्यान देकर सुनें।

शुरू-शुरूमें जब हमने पढ़ाई की, तब पाँच-छ: सालके बाद अपने परिचितोंके पास गये। वे कहने लगे कि इतने साल पढ़े हो, कुछ सुनाओ। पर हम नहीं सुना सके। सुनायें भी तो क्या सुनायें? ‘टिड्ढाणञ्द्वयसज्घ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरप:’—ऐसा पाठ सुनायें तो कौन समझे? तो हमें फेल कर दिया कि इतने वर्षोंसे पढ़ता है, पर कुछ नहीं सुनाया। कारण कि इस बातको तो पढ़ा हुआ आदमी ही जान सकता है, दूसरे आदमी नहीं जान सकते। इसी तरह परमार्थिक बातोंको सुननेसे जो असर पड़ता है, उसको परमार्थिक विषयके जानकार ही जान सकते हैं, दूसरे नहीं जान सकते। सत्संग सुननेसे लाभ हुए बिना रहता ही नहीं। कितना ही पल्ला झाड़ दें, तो भी आपकी सुनी हुई बातें जायँगी नहीं। आप प्रेमसे सुनते हो, आदरपूर्वक सुनते हो, बातें आपको अच्छी लगती हैं, हृदयमें जँचती हैं, वे अभी काममें भले ही न आयें, पर वे जायँगी नहीं। जैसे पाँच, सात, दस वर्ष पढ़े, तो भी व्याख्यान नहीं दे सके। व्याकरणमें प्रथमा पास हो गये, मध्यमा पास हो गये, पर व्याख्यान देनेको कहे तो आता ही नहीं। अब हमने व्याकरण पढ़ा है, न्याय पढ़ा है—इसकी बात उनके सामने क्या सुनायें? एक पंडितजी थे। वे राजाको कथा सुनाया करते थे। पंडितजीने अपने लड़केको पढ़नेके लिये काशी भेजा। काशीमें आठ-दस वर्ष पढ़ाई करनेके बाद वह वापस आया तो राजाने पंडितजीसे कहा कि आपका लड़का इतना पढ़कर आया है तो कुछ सुनाये। वह लड़का व्याकरण और न्याय खूब पढ़ा था। उसको सुनानेके लिये कहा गया तो उसने एक कनस्तरमें बहुत-से कंकड़ डालकर उसको जोरसे हिलाया और बोला कि बस, इसके सुनानेमें और मेरे सुनानेमें कोई फरक नहीं है। चाहे यह सुन लो, चाहे मेरी बात सुन लो। अब पढ़ाईकी बातें सुनायें तो उनको कौन समझेगा। इसलिये लिखा है—

विद्वानेव विजानाति विद्वज्जनपरिश्रमम्।

न हि वन्ध्या विजानाति गुर्वीं प्रसववेदनाम्॥

अर्थात् विद्वान् ही विद्वान‍‍्के परिश्रमको जान सकता है, उसकी विद्याकी परीक्षा कर सकता है, मूर्ख नहीं। जो बन्ध्या है, वह स्त्री प्रसवकी पीड़ाको कैसे जान सकती है? ऐसे ही जिन लोगोंने सत्संग नहीं किया है, जिनमें तीव्र जिज्ञासा जाग्रत् नहीं हुई है, वे कैसे जान सकते हैं कि सत्संगसे क्या लाभ होता है? क्योंकि इस विषयमें उनका प्रवेश ही नहीं है। बहुत-सी ऐसी बातें हैं, जिनकी तरफ ख्याल नहीं जाता।

व्यापार करनेवाला जैसे व्यापारके मर्मको जानता है, वैसे व्यापारकी बातें सुनकर सीखनेवाला नहीं जान सकता। एक बार किसीने मेरेसे व्यापारकी बात पूछी और मैंने उसका उत्तर दे दिया। फिर वही बात उसने गोयन्दकाजीसे पूछी और गोयन्दकाजीने उसका उत्तर दिया। उन दोनोंको मैंने देखा। गोयन्दकाजीने जितनी सुगमतासे व्यापारकी बात बतायी, उतनी सुगमतासे मेरे द्वारा नहीं कही गयी। व्यापारके विषयमें मैंने भी सोचा है, समझा है और बहुत बातें मैं जानता हूँ। अब तो व्यापारकी बातोंका यहाँतक अनुभव हुआ है कि एक व्यापारीने मेरेसे कहा कि मैं तो व्यापार आपसे ही सीखा हूँ। व्यापारकी बातें वे मेरेसे पूछते, सीखते और फिर उसके अनुसार व्यापार करते। वे व्यापारमें अच्छे होशियार और तेज हो गये। वे आजकल हैं, उनकी बात कहता हूँ, पुरानी बात नहीं है। व्यापारकी बातें भी मैंने सुन-सुनकर सीखी है, और गृहस्थकी बातें भी मैंने सुन-सुनकर सीखी हैं।

जो संसारमें रचा-पचा न रहकर उससे ऊँचा उठता है, वह संसारको जितना जानता है, उतना संसारमें रचा-पचा रहनेवाला नहीं जानता। मनुष्य संसारसे अलग होकर ही संसारकी बातोंको विशेषतासे जान सकता है। ऐसे ही वह परमात्माके साथ एक होकर ही परमात्मतत्त्वकी बातोंको विशेषतासे जान सकता है। परमात्मासे अलग रहते हुए कितनी ही परमात्मतत्त्वकी बातें सुन ले, कितने ही शास्त्र पढ़ ले, कितना ही अध्ययन कर ले, पर वह परमात्माको नहीं जान सकता। तात्पर्य यह है कि संसारके तत्त्वको वही जान सकता है, जो संसारसे अलग हो गया है और परमात्मतत्त्वको वही जान सकता है, जो परमात्माके साथ एक हो गया है। जब संसारसे अलग हुए बिना आप संसारके तत्त्वको भी नहीं जान सकते, फिर परमात्माके तत्त्वको जान ही कैसे सकते हैं?

आप कहते हैं कि हमने सत्संगकी बात तो सुन ली, पर वह हमारे काम नहीं आती! परंतु वास्तवमें सच्ची बात कभी निरर्थक जाती ही नहीं; क्योंकि सत् वस्तुका कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सत:’ (गीता २। १६)। इसकी क्या पहचान है? पहचान यह है कि सत्संगका समय होनेपर आप घरपर रह नहीं सकते, सत्संगकी तरफ खिंचते हैं! यह कौन खींचता है? आपके भीतर जो संस्कार जमा हैं, वे ही आपको सत्संगकी तरफ खींचते हैं। सत्संगमें जो आपकी रुचि है, वह रुचि कहती है कि आपके भीतर सत्संगके संस्कार हैं! आप उनको जान नहीं सकते, पर लाभ होता है, होता है, होता है।

अब आप दूसरी बात सुनें। सत्संगके समान उग्र साधन, उग्र तपस्या, उग्र पुण्य कोई है ही नहीं। हजारों वर्षोंकी तपस्यासे जो लाभ नहीं होता, वह लाभ सत्संग सुननेसे तत्काल हो जाता है! कई लोगोंने खुद मेरेसे कहा है कि सत्संग सुननेसे हमें बहुत लाभ है, हमारी वृत्तियोंमें बहुत फर्क पड़ा है। सत्संग करें और फर्क न पड़े—ऐसा हो ही नहीं सकता। कोरी कथा ही न सुनें, प्रत्युत सत्संगकी बातोंको गहरा उतरकर समझें तो एकदम फर्क पड़ता है।

किसीने ‘क’—यह अक्षर सीख लिया तो मानो उसने आचार्यकी पढ़ाईका एक अंश पढ़ लिया! उसने क, ख, ग, घ, ङ—ये पाँच अक्षर पढ़ लिये। लिखाओ तो वह पाँचों अक्षर लिख देगा, पर ‘घ’—ऐसा लिखकर पूछो कि यह क्या है, तो वह जल्दी नहीं बता सकेगा। वह ‘क, ख, ग और घ’ हाँ-हाँ, यह ‘घ’ है—इस प्रकार सोचकर बता देगा। जल्दी नहीं बता पानेसे ऐसा नहीं कह सकते कि उसकी पढ़ाई नहीं हुई। यह आचार्यकी पढ़ाईका ही एक चिह्न है। ऐसे ही सत्संगकी बात समयपर काम नहीं आती—यह बात आपके भीतर पैदा होती है, तो यह आपके सत्संगका ही चिह्न है। जो सत्संग नहीं करते, उनके भीतर यह बात पैदा होती है क्या?

तीसरी बात, भूख लगनेपर भोजन किया जाय तो भोजनका ठीक पाचन होता है, जिससे शक्ति आती है। बिना भूखके भोजन किया जाय तो उसका ठीक पाचन न होनेसे शक्ति नहीं आती। ऐसे ही आपको सत्संगकी भूख लगती और आप उसको ढूँढ़ते, इधर-उधर जाते और फिर सत्संग मिलता, तो सत्संगकी बात आपपर असर करती। आप तो रुपये कमा रहे हो, उनका आवाहन कर रहे हो, पंखा चल रहा है, आराम कर रहे हो, कूलर चल रहा है कि ठंडी रहे, गर्मी न हो जाय—ऐसा करके सत्संग सुनते हो, तो भाई! अभी भूख लगी नहीं है। सुननेकी इच्छा तो है नहीं, भाव यह रहता है कि चलो घूम आयें, यह भी एक तमाशा है! अगर भूख लगती और जगह-जगह भटकते, तब पता लगता। भूख लगनेपर ही वह जँचता है, रुचता है और पचता है। भूख न हो तो वह जँचता नहीं, रुचता नहीं और पचता नहीं।

स्वयंज्योतिजी महाराज बीकानेरमें नरसिंग सागरपर ठहरे हुए थे। एक भाईने कहा—महाराज, आप हमारी बगीचीमें आ जायँ तो अच्छा है। नरसिंग सागर हमारे लिये दूर पड़ता है, बगीची नजदीक पड़ती है। बाबाजी बोले—तो तेरे घरपर ही आ जाऊँ? अब भाव यह है कि बाबाजी हमारे नजदीक आ जायँ तो हमें सुविधा रहे, यह नहीं कि हम बाबाजीके पास चले जायँ और लाभ ले लें। सत्संगका समय कौन-सा रखा जाता है? जब काम-धंधेका समय नहीं हो, वह समय सत्संगका रखा जाता है! फालतू समय सत्संग, भजन, ध्यानके लिये रखा जाता है और कहते हैं कि असर नहीं हुआ! असली समय तो रुपया कमानेमें लगाते हैं और फालतू समय सत्संगमें लगाते हैं तथा लाभ असली चाहते हैं!

मालिन बेर बेचती है तो बालक उसके पास धान ले जाता है और बदलेमें बेर ले लेता है। बालक कहता है कि और बेर दे दे, तो वह एक-दो बेर और दे देती है। जब वह और बेर माँगता है, तब वह कहती है कि ‘कीणों तो सँभाल’ अर्थात् तू कितना धान लाया है, उसको तो देख। मेरेसे ही कहता है कि दे दे, पर तूने खर्च कितना किया है? ऐसे ही आपसे पूछा जाय कि सत्संगके लिये आपने कौन-सा समय खर्च किया है? नींदका समय खर्च किया है कि व्यापारका समय खर्च किया है? या असली कामका समय खर्च किया है? पूछा जाय कि सत्संगमें आप आये नहीं? तो कहेंगे कि ‘आते तो थे, पर एक आदमीसे बात करनेमें लग गये तो भूल गये; फिर देखा तो ओहो, समय तो हो गया।’ पूछा जाय कि कल क्यों नहीं आये? तो कहेंगे कि महाराज, मुकदमेकी बात आ गयी, उधर चले गये, इसलिये नहीं आ सके।’ फिर पूछें कि परसों आप क्यों नहीं आये? तो कहेंगे कि महाराज, क्या करें, बात ऐसी थी कि भोजन करके पलंगके सहारे हुए तो नींद आ गयी। नींद खुली तो देखा—ओहो, सत्संगका समय तो हो गया, अब जाकर क्या करेंगे!’

घरका कोई काम न हो, बात करनेके लिये कोई आदमी न मिले; नींद भी नहीं आये—ऐसे फालतू समयमें सत्संग करना चाहते हो! पहले आप अपना कीणा तो सँभालो, यह तो देखो कि आप कितना खर्च करते हो। फिर देखो कि लाभ होता है कि नहीं होता है। आप जितनी लगनसे यहाँ आते हो, उससे ज्यादा लाभ आपको होता है—यह एकदम पक्‍की बात है, सच्ची बात है। आप जितना खर्च करते हो, उसकी अपेक्षा ज्यादा लाभ होता है—इसमें मेरेको संदेह नहीं है। अगर ज्यादा खर्च करोगे तो ज्यादा लाभ होगा।

सत्संगकी बातें कुछ काम नहीं आतीं—ऐसी बात क्यों पैदा हुई? कि लोगोंने यह कहना शुरू कर दिया। सत्संग सुननेसे क्या लाभ होता है—ऐसा एकने कहा, दोने कहा, तीनने कहा, चारने कहा हल्ला हो गया! अच्छे आचरणोंवाले आठ-दस ब्राह्मण थे। उनके मनमें आ गयी कि ये लोग मदिरा पीते हैं। हम यदि पी लें तो हमें पंक्तिसे बाहर कर दें। पर हम एक बार देखें तो सही कि इसमें कितना रस है। वे सब एक जगह इकट्ठे हुए और सभी दरवाजे बन्द कर लिये, जिससे भीतर कोई नहीं आये। अब लगे पीने। थोड़ा नशा आया तो एकने कहा हल्ला मत करो; दूसरा बोला हल्ला मत करो; तीसरा बोला—देखो, हल्ला मत करो, हल्ला मत करो। ‘हल्ला मत करो’ में हल्ला हो गया! ऐसे ही एकने कहा सत्संगकी बात काम नहीं आती; दूसरेने कहा—हाँ सा, काम नहीं आती, तीसरेने कहा—हाँ सा, काम नहीं आती। इस प्रकार ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिला दी, हल्ला मचा दिया। ठंडे दिमागसे विचार नहीं करते कि सत्संगकी बातें कितनी काममें आयीं, कैसे-कैसे काममें आयीं।

सत्संगकी बातें काममें आती हैं, ऐसा हमने देखा है। जो आदमी सत्संग करनेवाले हैं, उनके बीच आपसमें खटपट मचती है और उसको मिटाने जाते हैं तो वह बहुत जल्दी मिट जाती है। परंतु जो सत्संग नहीं करते हैं, उनकी खटपटको मिटाने जाते हैं, तो वह मिटती नहीं, उलटे हमारेसे लड़ पड़ते हैं। यह बीती हुई बात है। हमने तो गाँवोंमें भटककर देखा है कि जिन गाँवोंमें सौ-दोसौ वर्षोंसे कोई सन्त नहीं आये, सत्संग नहीं हुआ, वहाँके लोगोंके आचरण बिलकुल भूत-प्रेतोंकी तरह, पशुओंकी तरह हैं। परंतु जिन गाँवमें संत आये हैं, सत्संग हुआ है, उन गाँवोंमें दूसरे गाँवसे विलक्षणता है।

जिन प्रदेशोंमें अच्छे संत व्याख्यान देते हैं और सुननेवाले रुचिसे सुनते हैं, वहाँके आदमियोंमें दूसरोंकी अपेक्षा बहुत फर्क होता है। सत्संग सुननेसे आपमें क्या फर्क पड़ा है—इसका पता आपको तब लगेगा, जब आप दूसरोंके साथ मिलोगे और उनकी बातें सुनोगे। एक सत्संगी भाईने मेरेको बताया कि जब मैं कटनी गया, तब वहाँके लोगोंसे मिलनेपर और बातचीत करनेपर पता लगा कि उनसे तो हम बहुत अच्छे हैं! जो सत्संग नहीं करते, ऐसे आदमियोंकी बातें आप सुनो, उनका व्यवहार देखो तो आपको होश होगा कि सत्संगकी बात कितनी काममें आयी है, कितना फर्क पड़ा? कोयल भी काली होती है और कौआ भी काला होता है; परंतु जब वसन्त-ऋतु आती है, तब कोयल ‘पिऊ-पिऊ’ करती है और कौआ ‘काँय-काँय’ करता है। वाणीसे उनके भेदका पता लगता है। इसलिये गोस्वामीजीने कहा है—

मज्जन फल पेखिअ ततकाला।

काक होहिं पिक बकउ मराला॥

(मानस १।३।१)

यह साधु-समाज प्रयाग है। इसमें स्नान करनेसे तत्काल फल होता है, कौआ कोयल हो जाता और बगुला हंस हो जाता है। कौआ हंस नहीं होता, कोयल होता है अर्थात् उसका रंग नहीं बदलता, पर वाणी (व्यवहार) बदलती है। ऐसे ही बगुला हंस होता है तो उसका रंग तो वही रहता है, पर उसमें नीर-क्षीर-विवेक आ जाता है। तात्पर्य है कि सत्संगरूपी प्रयागराजमें स्नान करनेसे कौए और बगुलेका रूप तथा रंग तो वही रहता है, पर व्यवहार तथा विवेकमें फर्क पड़ जाता है। परंतु इसकी पहचान किसको होती है? ‘विद्वानेव विजानाति विद्वज्जनपरिश्रमम्’ अर्थात् विद्वान् ही विद्वान‍्को पहचानता है। जो अच्छे संत हैं, वे देखते ही परख लेते हैं। एक बूढ़े सन्त थे, वे अपनी बात कहते थे। जब वे वैरागी साधु हुए, तब वे जोधपुर चले गये और वहाँ मोती चौकमें श्रीगुपतरामजी महाराजके पास रहकर नाम-जप करने लगे। उनको देखते ही महाराजजी बोले कि यह सुलगा हुआ है अर्थात् इसके भीतर वैराग्यकी आग लगी हुई है ! अब इस बातको वैराग्यवान‍्के सिवाय दूसरा कौन पहचाने? ऐसे ही सत्संग करनेवालेको संतलोग पहचान लेते हैं। वे उसकी बात सुनकर जान लेते हैं कि इसको कोई-न-कोई सन्त मिला है। आप कहते हो कि कुछ फायदा नहीं हुआ, पल्ला-झाड़ सत्संग है, ऐसी बात है नहीं। असर हुए बिना रहेगा ही नहीं।

एक कहानी आती है। डाकुओंका एक दल था। उनमें जो बड़ा-बूढ़ा डाकू था, वह सबसे कहता था कि ‘भाई, जहाँ कथा-सत्संग होता हो, वहाँ कभी मत जाना, नहीं तो तुम्हारा काम बंद हो जायगा। कहीं जा रहे हो, बीचमें कथा होती हो तो जोरसे कान दबा लेना, उसको सुनना बिलकुल नहीं।’ ऐसी शिक्षा डाकुओंको मिली हुई थी। एक दिन एक डाकू कहीं जा रहा था। रास्तेमें एक जगह सत्संग-प्रवचन हो रहा था। रास्ता वही था, उधर ही जाना था। जब वह डाकू उधरसे गुजरने लगा तो उसने जोरसे अपने कान दबा लिये। चलते हुए अचानक उसके पैरमें एक काँटा लग गया। उसने एक हाथसे काँटा निकाला और फिर कान दबाकर चल पड़ा। काँटा निकालते समय उसको यह बात सुनायी दी कि देवताकी छाया नहीं होती।

एक दिन उन डाकुओंने राजाके खजानेमें डाका डाला। राजाके गुप्तचरोंने खोज की। एक गुप्तचरको उन डाकुओंपर शक हो गया। डाकूलोग देवीकी पूजा किया करते थे। वह गुप्तचर देवीका रूप बनाकर उनके मंदिरमें देवीकी प्रतिमाके पास खड़ा हो गया। जब डाकूलोग वहाँ आये तो उसने कुपित होकर डाकुओंसे कहा कि तुम लोगोंने इतना धन खा लिया, पर मेरी पूजा ही नहीं की! मैं तुम सबको खत्म कर दूँगी। ऐसा सुनकर वे सब डाकू डर गये और बोले कि क्षमा करो, हमसे भूल हो गयी। हम जरूर पूजा करेंगे। अब वे धूप-दीप जलाकर देवीकी आरती करने लगे। उनमेंसे जिस डाकूने कथाकी यह बात सुन रखी थी कि देवताकी छाया नहीं होती, वह बोला—यह देवी नहीं है। देवीकी छाया नहीं पड़ती, पर इसकी तो छाया पड़ रही है! ऐसा सुनते ही डाकुओंने देवीका रूप बनाये हुए उस गुप्तचरको पकड़ लिया और लगे मारने। वे बोले कि चोर तो तू है, हम कैसे हैं? हमने चोरी की ही नहीं। वह गुप्तचर वहाँसे भाग गया। सत्संगकी एक बात सुननेसे ही फर्क पड़ गया।

एकने सत्संग सुना ही नहीं और एकने सत्संग सुना, तो दोनोंमें फर्क हुआ कि नहीं? सत्संग करनेवालेको माप-तौल लो तो कुछ फर्क नहीं पड़ा, पर भीतरसे बहुत फर्क पड़ा है। ठाकुरजीको भोग लगाते हैं तो प्रसाद एक तोला भी कम नहीं होता, पर उसको लेनेके लिये लखपति-करोड़पति हाथ फैला देते हैं। उनको प्रसादका कणमात्र भी दे दो तो वे प्रसन्न हो जाते हैं। यह क्या है? भगवान‍्का प्रसाद है! भगवान‍्के अर्पण किये हुए पदार्थमें एक विलक्षणता आ जाती है, जिसको हरेक नहीं देख सकता, विवेकवाला ही देख सकता है।

वैष्णवे हरिभक्तौ च प्रसादे हरिनाम्नि च।

अल्पपुण्यवतां श्रद्धा यथावन्नैव जायते॥

अर्थात् भगवान‍्के भक्तोंमें, भक्तिमें, प्रसादमें और भगवान‍्के नाममें थोड़े पुण्यवालोंकी रुचि नहीं होती, वे इनको पहचानते नहीं। जो पुण्यशाली होते हैं, उनको ही भगवान‍्के अर्पण किये हुए प्रसादमें विचित्रता दीखती है, दूसरोंको नहीं दीखती। अर्पण करनेवाला जितना ही भावपूर्वक अर्पण करता है, उतनी ही उस वस्तुकी विलक्षणता आती है। भगवान‍्के सामने रख दे तो भी अच्छा है; परंतु भावपूर्वक अर्पण करनेसे इतनी विलक्षणता आती है कि स्वादमें फर्क पड़ जाता है! भावमें बड़ी भारी शक्ति है। ऐसी बातें देखी हुई हैं और शास्त्रोंमें भी आती हैं। कोई गृहस्थ किसी साधुको अन्न देता है तो उसका भाव जितना तेज होता है, उतनी ही उस अन्नमें विलक्षणता आ जाती है। एक जगहकी बात है, ऐसा भावपूर्वक बनाया हुआ भोजन दो-तीन दिनतक रह गया, पर वह खराब नहीं हुआ! ऐसे अन्नको खानेपर असर पड़ता है। परंतु जाननेवाला ही जाने, दूसरा क्या जाने?‘जिसके लागी है सोई जाणे, दूजा क्या जाणे रे भाई।’ घाव होनेपर कैसी पीड़ा होती है, यह घायल ही जानता है। एक बाबाजीसे कोई बोला—महाराज, आप भजन करते हो, तो क्या अनुभव हुआ बताओ? बाबाजी कुछ बोले नहीं। वह ज्यादा पीछे पड़ गया, तो बाबाजीने उसकी पीठपर पत्थर मारा। उसने पूछा कि पत्थर क्यों मारा? बाबाजी बोले—तो क्या हुआ? वह बोला कि पीड़ा हो रही है। बाबाजीने कहा—पीड़ाको दिखाओ कि कैसी पीड़ा है। वह बोला—मैं कहता हूँ न बाबा, पीड़ा मुझे हो रही है, आपको क्या पता? जब पीड़ा भी नहीं दिखा सकते, तो फिर पारमार्थिक बातें कैसे दिखा देंगे?

सत्संगसे फर्क न पड़े—ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। बहुत विचित्र फर्क पड़ता है। उस विचित्रताको जानकार आदमी ही जान सकते हैं, दूसरे नहीं जान सकते। साधारण आदमी तो कहेगा कि तुम्हारेमें क्या फर्क पड़ा? हमारे-जैसे ही तुम हो। हाथ, पाँव, नाक, कान, आँख आदिमें क्या फर्क पड़ा? ठीक है, इनमें कुछ फर्क नहीं पड़ा। कौआ भी काला होता है और कोयल भी काली होती है, पर फर्क वाणीमें पड़ता है, विवेकमें पड़ता है, चित्तकी वृत्तियोंमें पड़ता है। आप विचार करें कि सत्संग करनेसे पहले हरेकके साथ बर्ताव करनेपर जैसा असर पड़ता था, वैसा असर अब पड़ता है क्या? वैसा असर पड़ भी जाय तो क्या वह उतनी देर रहता है? मैं तो समझता हूँ कि फर्क न पड़े—ऐसा हो ही नहीं सकता। यह बात अलग है कि जिनका सत्संग करते हैं, वे अनुभवी महापुरुष होने चाहिये और सुननेवाले भी जिज्ञासु होने चाहिये—

पारस केरा गुण किसा, पलट्या नहीं लोहा।

कै तो निज पारस नहीं, कै बीच रहा बिछोहा॥

पारससे लोहेका स्पर्श किया जाय तो लोहा सोना बन जाता है। अगर पारससे स्पर्श करनेपर भी लोहा सोना न बने, तो समझना चाहिये कि पारस नहीं है; कोई पत्थरका टुकड़ा है। अगर वह पारस है, तो फिर लोहा असली नहीं होगा। अगर पारस और लोहा—दोनों असली हैं, तो उन दोनोंके बीचमें कोई दूसरी वस्तु आ गयी होगी, जिससे उनका आपसमें स्पर्श नहीं हुआ। ऐसे ही असली संत हो और असली जिज्ञासु हो, तो जिज्ञासुमें फर्क पड़े बिना रह नहीं सकता। परंतु बीचमें कुछ-न-कुछ व्यवधान डाल देनेसे लाभ नहीं होता। बड़े विचित्र-विचित्र व्यवधान होते हैं, जिनका वर्णन क्या करें और कहाँतक करें! जैसे—हम भी पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले हैं और आप भी पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले हैं; परंतु हमारी दीक्षा वैष्णव-सम्प्रदायमें हुई है और आपकी दीक्षा शैव-सम्प्रदायमें हुई है। वैष्णवोंके संस्कार हैं कि शैव ठीक नहीं होते और शैवोंके संस्कार हैं कि वैष्णव ठीक नहीं होते। अब दूसरे सम्प्रदायवाले बढ़िया-से-बढ़िया बात सुनायेंगे तो भी उनकी बात नहीं सुनेंगे—यह आड़ लगा दी। ऐसे ही सगुण और निर्गुणको लेकर, साकार और निराकारको लेकर, राम और कृष्णको लेकर आड़ लगा ली। जैसे, हम ‘जय श्रीकृष्ण’ कहेंगे, पर ‘जय श्रीराम’ नहीं कहेंगे। ऐसे विचारवाले दूसरेकी बात क्या सुनेंगे और क्या समझेंगे? ‘राम-राम’ कहनेवालोंमें भी रत्न (श्रेष्ठ पुरुष) होते हैं। ऐसा नहीं है कि ‘कृष्ण-कृष्ण’ कहनेवालोंमें तो रत्न होते हैं, पर ‘शिव-शिव’ कहनेवालोंमें नहीं होते। परंतु सम्प्रदायको लेकर एक-दूसरेकी निंदा शुरू कर देते हैं, अब रत्नका असर कहाँ पड़े?