दहेजसे उत्पन्न भीषण बुराइयाँ

एक पिताके तीन लड़कियाँ थीं। दोके विवाह बड़ी कठिनतासे हो पाये थे। तीसरीका सम्बन्ध किया। बरात आयी, पर धन न होनेसे मुँहमाँगा दहेज नहीं दिया जा सका। बरात बिना विवाह किये लौट गयी। कन्याके दु:खी पिताने अफीम खाकर आत्महत्या कर ली। कन्या और उसकी माता कुएँमें गिरकर मर गयी।

एक कन्याके पिताने अपने रहनेका पैतृक बड़ा मकान बंधक रखकर कन्याके विवाहमें दहेज दिया। मकान छुड़ाया नहीं जा सका, नीलाम हो गया। सारा परिवार बिना घरके हो गया।

एक कन्याकी विधवा माताने किसीसे ऋण लेकर कन्याका विवाह किया। ऋण देनेवालीकी पाप-बुद्धि हो गयी। उसने अपनी इच्छा जतायी। अस्वीकार करनेपर नालिश करके मकान नीलाम करवा दिया और उसे जबरदस्ती रास्तेमें निकाल दिया गया।

एक कन्याके पिताने पहली कन्याके विवाहमें ऋण लिया था। दूसरी कन्याका विवाह किसी तरह ठीक किया। पहला ऋण चुका नहीं था। दूसरी कन्याके विवाहके समय ऋणदाताने वारंट लाकर कन्याके पिताको गिरफ्तार करा दिया। कन्याने दु:खके मारे किरासिन तेल डालकर आत्महत्या कर ली।

एक कन्याकी सगाई हो गयी थी, कन्या सोलह वर्षकी थी; विवाहकी तिथि निश्चित हुई। डेढ़ वर्ष आगे लगन नहीं था। वरके पिताने ठीक विवाहकी तिथिसे तीन दिन पहले विवाहसे इन्कार कर दिया; क्योंकि उसको किसी दूसरी कन्याके पिताने अधिक रुपये तथा एक मोटर देनेका लालच दे दिया था। कन्याके पिताका यह सुनते ही हार्टफेल हो गया।

भारतवर्षके एक महान् श्रेष्ठ पुरुषके घरकी कन्याओंका २८, ३० सालकी होनेपर अर्थाभावसे विवाह नहीं हो पाया है और उनके माता-पिता बड़े दु:खी हैं।

ऐसी लाखों घटनाएँ घर-घर होती होंगी। हमारी जानकारीमें जो अनेकों घटनाएँ हैं, उनमेंसे कुछ ऊपर लिखी हैं। इनको पढ़कर भी क्या कोई सन्देह रह जाता है कि ऐसा दहेज दहेज नहीं है, यह कन्यापरिवारका रक्त है और कन्यापरिवारकी बुरी आत्महत्या और उनके घुल-घुल मरनेकी व्यवस्था है। वर-पक्षके लोग तथा विवाहके योग्य लड़के लाखोंकी संख्यामें प्रतिज्ञा करें कि वे बिना दहेजके ही विवाह करेंगे।