दाम्पत्य-जीवनके पालनीय धर्म
पत्नीके कर्तव्य—
पतिको ईश्वरवत् मानकर सब प्रकारसे उनको सुख पहुँचाये।
पतिकी सेवाको ही अपना स्वभाव बना ले।
पतिके माननीय माता-पिता आदिका सेवा-सम्मान करे।
पतिके आदेश या सम्मतिके अनुसार घरकी सारी व्यवस्था करे।
पतिसे कोई भूल हो जाय तो उसे बिना किसी क्षोभके शान्तभावसे सहन कर ले।
पतिके अतिरिक्त अन्य पुरुषमात्रको अपने पिता, भाई तथा पुत्रके समान समझे। बिना काम किसीसे भी मिले नहीं।
पतिके अतिरिक्त किसी पुरुषका जान-बूझकर स्पर्श न करे, न किसीको माला पहनाये। चरणस्पर्श भी न करे।
पतिके प्रतिकूल कोई भी कार्य न करे। पतिके अनुकूल हो तो भी पापकर्म न करे।
पतिके अनुकूल निर्दोष कार्य सदा-सर्वथा प्रफुल्ल चित्तसे करे।
पतिको उनके मनके या घरकी परिस्थितिके प्रतिकूल गहने-कपड़े आदिके लिये न कहे, तंग तो कभी करे ही नहीं।
पतिका कभी तिरस्कार-अपमान न करे, कोई चुभती बात न कहे।
पतिके विचारोंका उग्र खण्डन न करे; कभी कुछ कहना हो तो जब वे प्रसन्न हों, तब नम्रतासे कहे।
पतिके सामने सदा हँसमुख तथा विनययुक्त रहे।
पतिके सिवा किसीको गुरु न बनाये।
पतिकी व्यक्तिगत सेवा-सुविधाका कार्य यथासाध्य स्वयं करे।
पतिके लिये ही शृङ्गार करे, शौकीनी अथवा दिखावेके लिये नहीं ।
पतिको जिससे दु:ख पहुँचे, ऐसी बातकी कभी भूल-चूककर कल्पना भी न करे।
पति न चाहते हों तो उनके सामने अपने माता-पिता या नैहरवालोंकी प्रशंसा न करे।
पतिके मित्रों, प्रतिनिधियोंका पतिके इच्छानुकूल ही निर्दोष स्वागत-सत्कार करे।
पतिको धार्मिक कार्योंमें प्रवृत्त, प्रोत्साहित करे, पर उनके सेवा-धर्ममें विघ्न न डाले।
पतिके कर्तव्य—
पत्नीको अपनी दासी न मानकर सम्मान्य मित्र माने तथा उसे यथासाध्य सुख पहुँचाये।
पत्नीकी (आवश्यकता होनेपर) सेवा करनेमें जरा भी न हिचके।
पत्नीके माता-पिता आदिका सदा सम्मान करे, उनके लिये कोई अपमान या निन्दाजनक शब्द कभी न कहे।
पत्नीसे सलाह लेकर घर-सम्बन्धी सब कार्य करे।
पत्नीसे कोई दोष हो जाय तो उसे डाँटे नहीं, प्रेमसे समझा दे और उसे नीचा देखना पड़े, ऐसा बर्ताव न करके सहज क्षमा कर दे।
पत्नीके सिवा किसी पर-स्त्रीसे किसी प्रकारका सम्बन्ध न रखे। सबको माता, बहिन और पुत्रीके समान समझे।
पत्नीके अतिरिक्त किसी भी पर-स्त्रीका जान-बूझकर स्पर्श न करे, उसके द्वारा माला आदि न पहने। चरणस्पर्श भी न कराये।
पत्नीके मनके प्रतिकूल कोई कार्य न करे। पत्नीके अनुकूल हो तो भी पाप-कर्म न करे।
पत्नीके अनुकूल निर्दोष बर्ताव करे। पत्नीसे अपनी ओरसे पूछकर, घरकी परिस्थितिके अनुकूल, पत्नीके इच्छानुसार कपड़े, गहने या अन्यान्य चीजें मँगवा दे, बनवा दे।
पत्नीका कभी भी तिरस्कार-अपमान न करे, न कड़ी बात कहे, न धमकाये-डराये? कभी हाथ तो भूल-चूककर भी न उठाये। यह बड़ा पाप है।
पत्नीको उसके विचार तथा श्रद्धाके अनुसार धर्मसाधनादि करने दे, उसमें बाधा न डाले।
पत्नीको निर्दोष विनोद तथा प्रेमयुक्त बर्तावसे प्रसन्न रखे।
पत्नीको अपनी स्थितिके अनुसार दान-पुण्यादिके तथा अन्य व्ययके लिये प्रसन्नतापूर्वक पर्याप्त धन देता रहे।
पत्नीको तीर्थयात्रा आदिमें साथ रखे।
पत्नीको दीर्घकालतक अकेले न रखे।
पत्नीसे कभी यह न कहे कि तुम अपने माता-पितासे मुझे धन लाकर दो और न उससे धन न मिलनेपर नाराज ही हो।
पत्नीको कभी पापकर्ममें प्रवृत्त होनेके लिये न कहे।