विवाहमें दहेज
वर्तमान समयका एक बड़ा पाप
यद्यपि भगवान् पर विश्वास करके उनके अनन्य शरण हो जानेपर मनुष्यके सारे दोष अपने-आप समूल नष्ट हो जाते हैं और उसके समस्त योगक्षेमका वहन भगवान् स्वयं करते हैं, परंतु ऐसी स्थिति बहुत सहज नहीं है। सच्चे साधनके फलसे नित्य भगवत्कृपाका अनुभव होनेपर ही भगवान्में पूर्ण और अलौकिक विश्वास पैदा होता है और तभी मनुष्य अपने समस्त बल, लोक-परलोक और भोग-मोक्ष सब प्रभुके चरणोंपर अर्पण करके उनके अनन्य शरण होता है। क्षणविश्वासी या अल्पविश्वासी साधारण लोग इस अवस्थासे बहुत दूर रहते हैं। वे भगवान्के गुण और माहात्म्यको सुनकर कभी-कभी विश्वासकी ओर कुछ झुकते हैं परंतु पर्याप्त आगे बढ़नेसे पहले ही कई प्रकारकी बाधाएँ पाकर रुक जाते हैं। इन बाधाओंमें कुछ तो पूर्वकर्मोंके प्रतिबन्धक होते हैं और कुछ वर्तमान कालके सङ्ग, स्थिति आदिके कारण उत्पन्न हुई रुकावटें होती हैं। ये बाधाएँ अनेक हैं, परंतु इस समय साधारणत: उनमेंसे धनकी चिन्ता एक प्रधान बाधा है। धनकी चिन्ताका कारण उदरपूर्ति या परिवार-पालन ही कहा जाता है, परंतु वास्तवमें मूल कारण दूसरा है—वह है हमारी काम-भोगपरायणता। विषयोंके उपभोगको ही परम पुरुषार्थ और परम आनन्द माननेवाले मनुष्योंकी चिन्ताएँ मृत्युकालतक भी दूर नहीं होतीं, क्योंकि ऐसे लोग अपनी स्थितिके अनुकूल साधारण सादा जीवन बिताना भूल जाते हैं। फलस्वरूप उन्हें रात-दिन धनकी इतनी चिन्ता करनी पड़ती है कि उसके सामने भगवान् और धर्मका चिन्तन या विचार तुच्छ, अनावश्यक और कभी-कभी त्याज्य हो जाता है और वे सब कुछ भूल काम-क्रोधपरायण होकर अन्यायपूर्वक धन-संग्रहके कार्यमें लग जाते हैं। यों करते-करते ही उनके जीवनके दिन पूरे हो जाते हैं। बहुमूल्य, दुर्लभ मनुष्य-जीवन पाप-ताप बटोरनेमें ही व्यर्थ बीत जाता है। यह इतनी बड़ी हानि होती है, जिसकी बड़ी कठिनतासे भी पूर्ति नहीं होती और समय हाथसे निकल जानेपर कुछ बेहद पछताना पड़ता है।
मनुष्य यदि चाहे तो प्रारब्ध या संचितजनित प्रतिबन्धकोंको भी दूर कर सकता है, पर वर्तमान कालके सङ्ग और स्थितिसे उपजी हुई बाधाओंको तो मिटा सकनेमें कोई संदेह ही नहीं है। यदि वह सङ्गको बदल डाले और हृदयमें कुछ बल संचय करके कुसङ्ग और दुर्बलतावश होनेवाले प्रमाद और अकर्तव्य कार्योंको छोड़ दे तो ये बाधाएँ सहज ही दूर हो सकती हैं। वास्तवमें हमें अपने और परिवारके लिये साधारणत: अन्न-वस्त्र संग्रह करनेमें उतनी कठिनता नहीं है। कठिनता तो यह है कि हमने अपनी आवश्यकताएँ बहुत अधिक बढ़ा ली हैं और उनकी किसी-न-किसी प्रकार पूर्ति करनेमें ही कर्तव्यकी इतिश्री समझ रखी है। यदि हम ध्यान देकर देखें तो व्यक्तिगत और समाजगत ऐसे हजारों अवसर हैं, जिनमें हम बहुत धन खर्च किया करते हैं, परंतु जहाँ बिना खर्च किये ही काम मजेमें चल सकता है, ऐसे अवसरोंपर खर्च करनेकी आवश्यकता हमने उत्पन्न कर ली है; वस्तुत: है नहीं। खाने-पहनने तथा गृहस्थीके दूसरे-दूसरे कार्योंके लिये हम ऐसी बहुत-सी चीजें खरीदते हैं, जिनके न खरीदनेसे हमें अपने जीवन-यापनमें कोई रुकावट नहीं होती। उदाहरणके लिये, मनुष्यका दो कपड़ोंमें काम चल सकता है, पर वह चार-पाँच पहनता है। खानेमें मिठाई अथवा बहुत तरहकी तरकारी, अचार आदिके बिना कोई अड़चन नहीं होती, परंतु इनमें बहुत व्यय किया जाता है। छोटे साफ मकानमें रहा जा सकता है, पर दिखावेके लिये बड़ी-बड़ी इमारतें बनवायी जाती हैं। शाल-दुशाले, इत्र-फुलेल, साबुन-क्रीम, फर्नीचर आदि हजारों प्रकारके शौकके सामानमें पानीकी-ज्यों पैसा बरबाद किया जाता है। यह तो व्यक्तिगत बात हुई। समाजमें ब्याह-शादी, कर्णछेदन, जनेऊ, मरण आदिपर इतनी बुरी तरह खर्च किया जाता है कि जिसका दु:ख पीढ़ियोंतक भोगना पड़ता है। सैकड़ों अच्छे-अच्छे घराने इस व्यय-भारसे दबकर नष्ट हो गये और होते जा रहे हैं। इधर वर्षोंसे खर्च घटानेकी तथा रीतियोंमें सुधारकी बात चल रही है और अनेक प्रकारके परिवर्तन भी हुए हैं, परंतु खर्चकी रकम घटनेके बदले बढ़ी है। खर्चके तरीके बदले हैं, खर्च नहीं घटा। बल्कि पहले जो कुछ खर्च किया जाता था, वह प्राय: ऐसी चीजोंमें खर्च होता था जो चीजें बुरे समयपर काम आती थीं और उनकी लागतसे कुछ ही कम कीमत चाहे जब बेचकर वसूल की जा सकती थी; परंतु अब तो जो कुछ खर्च होता है, वह प्राय: स्वाहा ही हो जाता है। फैशनने सबको तबाह कर दिया है। इस सारे अनर्थका कारण हमारी काम-भोग-परायणताकी वृद्धि है और इसके छूटनेका असली उपाय विषय-वैराग्यपूर्वक ईश्वरपरायणता ही है। उस ईश्वरपरायणतामें भजनकी आवश्यकता है और भजन होनेमें आज यह धनकी ‘हाय-हाय’ बुरी तरह बाधक हो रही है। अतएव अपना, समाजका और देशका लौकिक-पारलौकिक हित चाहनेवाले प्रत्येक मनुष्यका यह कर्तव्य है कि वह खर्च घटाये, जीवनमें सब ओर सादगीका व्यवहार करे, व्यक्तिगत और समाजगत धनकी फजूलखर्चीको दृढ़ता और बलके साथ नासमझीसे होनेवाली बदनामीको सहकर भी रोके। अधिकतर लोग झूठी कीर्ति या बड़ाईके फेरमें पड़कर ही ज्यादा खर्च किया करते हैं, इस बड़ाईका रूप बदलकर खर्च कम करनेवालेकी बड़ाई करें और उसीके कार्यको अच्छा बतावें। इससे बड़ाईके लोभी भी कम खर्च करने लगेंगे। आजकल विवाह-शादीमें तो जो अनर्थ हो रहा है वह बड़ा ही रोमाञ्चकारी है। खर्चकी भयानकताके कारण लड़कियोंका ब्याह नहीं होने पाता और अच्छे-अच्छे परिवार इसके लिये दु:खी हो रहे हैं। इसीके कारण प्राय: लड़के-लड़कियोंमें जन्मकालसे ही भेददृष्टि हो जाती है और लड़कियोंके साथ बुरे-से-बुरा अन्यायभरा बर्ताव होता है। राजपूतोंमें इस खर्चकी भयानकताके कारण ही लड़कियोंको जन्मते ही विष देकर मार डालनेका नृशंस पाप शुरू हो गया था। जिसके कई लड़कियाँ हैं, उसका तो जीवन ही दु:खमय बन रहा है। खर्चके भारसे पीड़ित पिता-माताका दु:ख न देख सकनेके कारण बंगालमें स्नेहलता आदि कुमारियोंने पहले आत्महत्या कर ली थी, आज भी अपने कारण माता-पिताको दु:खी होते देखकर सयानी लड़कियाँ मन-ही-मन कितना रोती हैं, इस बातको उनका हृदय ही जानता है। ऐसी स्थितिमें प्रत्येक हृदयवान् गृहस्थको इस विषयपर विचार करके कर्तव्य स्थिर करना चाहिये। कन्याके माता-पिता क्या करें, उन्हें तो किसी प्रकार खेत-जमीन, घर-द्वार बन्धक रखकर वरके माता-पिताको राजी करना ही पड़ता है। परंतु वह हृदयका रक्त दिया जाता है, दहेज नहीं। मेरे मित्र एक सरयूपारी ब्राह्मण हैं, उनके घरमें कई कन्याएँ हैं, एक कन्या विवाह-योग्य है, उसकी उम्र लगभग १८ सालकी हो गयी है। कन्या सुशीला है, बहुत अच्छे ब्राह्मण हैं, परंतु दहेजके अभावमें विवाह नहीं हो पाता। वे बड़े दु:खी हो रहे हैं। कई हजार रकमसे कममें तो कोई बात ही नहीं करता। यू० पी० के एक सज्जनका पत्र मिला है। वे पहले वकील थे। उनके एक कन्या है। वे लिखते हैं—‘कन्या विवाह-योग्य हो गयी है, परन्तु दहेजका प्रश्न सामने है। मैट्रिक पास बालकके पिता तो मोटर बिना बात नहीं करते। यह पाप है और आज हिन्दुओंके घर-घरमें इस पापका दावानल धधक रहा है। मैं प्रत्येक हृदयवान् सत्सङ्गी भाई और बहनोंसे एक विनय करता हूँ, जो घरमें सम्पन्न हैं और जो परमार्थके मार्गपर आगे बढ़ना चाहते हैं, वे अपनी व्यक्तिगत और समाजगत आवश्यकताओंको तुरंत कम कर दें और अपने लड़कोंका विवाह ढूँढ़-ढूँढ़कर बिना दहेज लिये गरीब माता-पिताकी सुयोग्य कन्याओंसे करनेकी प्रतिज्ञा करें। धर्मप्रेमी अविवाहित युवक भी दृढ़ताके साथ यह प्रण करें कि वे अपना विवाह बिना दहेज लिये ही करें। मेरा विश्वास है कि ऐसा करनेसे उन्हें परमार्थ-मार्गमें बड़ा लाभ होगा।
यह निवेदन सामाजिक दृष्टिसे ही नहीं, शुद्ध परमार्थदृष्टिसे भी है और इसी दृष्टिसे सत्सङ्गी सज्जनों, माताओं और धर्मप्रेमी अविवाहित युवकोंसे प्रतिज्ञा करनेकी प्रार्थना की गयी है; क्योंकि यह विषय भजनमें बड़ा ही बाधक सिद्ध हो रहा है और इस बाधाके दूर होनेकी बड़ी ही आवश्यकता है। क्या मैं आशा करूँ कि धर्मप्रेमी सज्जनोंमें कुछ तो ऐसी प्रतिज्ञा कर ही लेंगे।
वस्तुत: धन अत्यन्त ही तुच्छ पदार्थ है, प्रेमधन परमात्माकी तुलनामें तो यह रखा ही नहीं जा सकता। सूर्य और जुगुनूकी उपमा भी इसके लिये पर्याप्त नहीं है! इसलिये इस विषयमें वृत्तियोंके अधिक लगानेकी आवश्यकता नहीं है; तथापि आज इस जड-युगमें चारों ओर धनकी पूजा हो रही है और लोग धन-चिन्तामें पड़े हुए ईश्वरको भूल रहे हैं। इसीसे ऐसा लिखा गया है। धन कम खर्च करनेकी इस प्रार्थनासे यह नहीं समझना चाहिये कि इसमें धनका महत्त्व बतलाया गया है; वरं यह समझना चाहिये कि धन अत्यन्त तुच्छ पदार्थ है, व्यर्थ खर्चकर उसके उपार्जनमें समय लगाकर उसका महत्त्व बढ़ाना उचित नहीं। हम अपनी आवश्यकताओंको जितना कम करेंगे, उतना ही धनका महत्त्व घटेगा और उतना ही शीघ्र हम पाप-तापसे छूटकर परमात्माकी ओर अग्रसर हो सकेंगे। हमारी आवश्यकताएँ ही धनकी लालसा उत्पन्न कर हमें दरवाजे-दरवाजे भटकाती और भगवान्से विमुख करती हैं। जिस दिन चाह मिट जायगी, उस दिन हम बादशाह बन जायँगे।
चाह गई चिंता गई मनुआँ बेपरवाह।
जिसको कछू न चाहिये सो जग शाहंशाह॥
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जबतक देशमें तिलक या ठहरौनीकी प्रथा जारी है, जबतक लड़केकी अमुक कीमत दहेजके रूपमें माँगी जाती है और जबतक धनके अभावसे कन्याके माता-पिता अपनी प्राणोंकी पुतली कन्याके लिये सुयोग्य वर नहीं पाते, तबतक समाजमें पापकी वृद्धि ही होती जायगी। कुछ समय पहले कलकत्तेमें एक दिल दहला देनेवाली घटना हुई थी। श्रीयुत किशोरी मोहन मजूमदार नामक एक बंगाली सज्जनकी चार नवयुवती कन्याओंने अफीम खाकर आत्महत्याकी चेष्टा की, जिनमें तीन मर गयीं और एक बची। मजूमदार महोदय कुलीन ब्राह्मण थे। उनके सात लड़कियाँ थीं। तीनका विवाह वे कर चुके थे और उन तीन विवाहोंमें ही उनका सब कुछ स्वाहा होकर ऋण हो गया था। अब उनके पास दहेज देनेके लिये धन नहीं था और बिना धनके लड़के नहीं मिलते थे। रात-दिन घरमें दु:ख रहता था। पिताको इस प्रकार रात-दिन अपने लिये जलते देखकर सयानी लड़कियोंने अपना अन्त कर डालना ही उचित समझा और इसीलिये उन्होंने जहर खा लिया। यद्यपि आत्महत्या एक प्रबल नैतिक दोष है और धार्मिक दृष्टिसे भी बड़ा पाप है। इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। तथापि गरीब पिताकी कन्याओंने जिस परिस्थितिमें पड़कर अत्यधिक मनोवेदनाकी हालतमें जो कुछ किया, उसके देखनेसे प्रत्येक सहृदय मनुष्यकी उनके प्रति सहानुभूति होगी। पता नहीं, घरोंमें गुपचुप ऐसी कितनी दु:खभरी घटनाएँ होती होंगी, साथ ही कितने माता-पिताओंको घुल-घुलकर मरना पड़ता होगा। यह मामूली सामाजिक पाप नहीं है, बहुत बड़ा पाप है। मैं प्रत्येक हृदयवान् अविवाहित नवयुवकसे और उनके धर्मप्रेमी माता-पिताओंसे ईश्वर और धर्मके नामपर अपील करता हूँ कि वे बिना दहेज लिये विवाह करनेका प्रण करें और इस भयानक पापकी जड़ काटनेमें क्रियाशील सहायक बनें।