आडम्बरपूर्ण खर्चीले जीवनसे हानि

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। उत्तरमें देर हो गयी, इसके लिये क्षमा करें। आपने अपनी परिस्थिति लिखते हुए अभावोंका और उनके कारण होनेवाले कष्टोंका विस्तारसे उल्लेख किया, वह बिलकुल ठीक है। धनियोंकी देखा-देखी समाजमें प्रशंसा पानेका एक विलक्षण मोह जाग उठा है, जिसके कारण जीवनकी व्यर्थ आवश्यकताएँ बढ़ गयी हैं। खान-पान, कपड़े-लत्ते, जूते-चप्पल, तेल-साबुन, मोटर-विमान, सिनेमा-रेडियो, उच्च श्रेणियोंमें रेलयात्रा, क्लब-पार्टी, बढ़िया मकान, पल-पलमें छायाचित्र लेनेकी प्रवृत्ति, उच्च स्तरके रहन-सहन आदिमें मानो होड़ लग रही है। धनियोंमें परस्पर प्रतियोगिता है ही, गरीब असमर्थ लोग भी इसी चक्‍करमें पड़े हैं। इससे इतना दु:ख बढ़ गया है कि जिसकी कोई सीमा नहीं है और वह अभी बढ़ता ही जा रहा है।

पहले साधारण गृहस्थजीवनमें लोग अपनी हैसियतके अनुसार पूजा-पर्वका महोत्सव, अतिथिसेवा, अपने जाति-समाजके अपनेसे गरीब भाइयोंकी सेवा-सहायता आदि करते थे। अधिक सम्पन्न लोग कुआँ, धर्मशाला आदि बनवाते थे। उसमें भी खर्च होता था, पर उससे लोकोपकार होता था—भूखोंको अन्न मिलता था, गरीबोंको आश्वासन मिलता था और देवपूजादिसे मनमें पवित्रता आती थी। उससे भोगप्रवृत्ति या विलासिताको आश्रय नहीं मिलता था। निजका खर्च कम-से-कम करनेमें और दूसरोंकी सेवामें अधिक-से-अधिक खर्च करनेमें होनेवाली प्रतियोगिता—ऐसी होड़ हानिकारक नहीं होती। पर अब तो उच्च स्तरके जीवनमें इतने अभाव बढ़ गये हैं कि उनकी पूर्तिमें जीवनकी सारी कमाई ही पूरी नहीं हो जाती है, ऋणभार भी बढ़ता जाता है। इसीलिये नाना प्रकारके छल-कपट, चोरी-बेईमानी, झूठ-दगा करके धन कमानेकी चेष्टा होती है। अतिथिसेवा और परार्थ धन लगानेके लिये तो अवकाश ही नहीं रह गया है। अपना ही खर्च नहीं चलता, तब दूसरेकी सेवा कोई कैसे करे।

प्राचीन समाज-व्यवस्थाके शिथिल हो जानेसे सब ओर मनमानी हो रही है और व्यर्थकी बाबूगिरीमें व्ययभार दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। एक ओर श्रमकी महिमा गायी जा रही है, दूसरी ओर पीढ़ियोंके श्रमिक लोग भी श्रम छोड़कर कलम पकड़नेमें गौरव मानने लगे हैं। शारीरिक श्रम मानो अप्रतिष्ठाका स्वरूप समझा जाने लगा है। सिनेमामें करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और उससे समाजमें सदाचारका बड़ी बुरी तरहसे नाश हो रहा है, परंतु आवश्यक आमोद-प्रमोद और धनोत्पादक धंधेके नामपर उसकी पतनकारिणी प्रवृत्ति दिनोदिन बढ़ती जा रही है। भोगका आडम्बर, विलासकी लालसा और झूठी शौकीनी बढ़ रही है!

कुछ लोग मानते हैं कि समाजमें विलासिताकी वृद्धि अथवा उच्च स्तरका जीवन हमारी धनवृद्धिका लक्षण है; पर वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। धन नहीं बढ़ा है—बढ़ा है आडम्बर, बढ़ी है सादगीमें शर्म, बढ़ा है अनाचार-मिथ्याचार और कदाचारका व्यसन, बढ़ी है उच्छृंखलता और शौकीनी तथा झूठे दिखावेकी बेबसी, बढ़ा है आलस्य, प्रमाद और मोह तथा बढ़ी है अविवेकशीलता और स्वेच्छाचारिता! पहले जो धन सर्वसाधारणके लिये खर्च होता था, अब वह व्यक्तिगत भोगमें खर्च होता है। पहले धनव्ययसे किसीका भला होता था, अब उससे किसीका भला तो होता ही नहीं, अपनी भी हानि होती है।

अधिकांश शहरोंमें रहनेको स्थान नहीं हैं, बड़े-बड़े महल झुक रहे हैं, मोटरोंके मारे रास्ता नहीं मिलता, सिनेमाओंके संगीतोंसे आकाश भरा रहता है, चारों ओर बिजलीकी रोशनी जगमगाती है, खान-पानमें अनाप-शनाप व्यय होता है। इस प्रकार विलास और आडम्बरके समुद्रमें डूबे रहनेपर भी प्राय: किसीको भी सुख-शान्ति नहीं है। कुछ लोगोंको छोड़कर (वे कुछ लोग भी दूसरी तरहके दु:खोंसे पीड़ित हैं) शेष सभी अभावग्रस्त, दु:खी हैं। कहीं घरमें बीमारी है, पर दवाके लिये दाम नहीं है; कहीं नौकरी नहीं है, कहीं व्यापार नहीं चलता, कहीं बड़ी कन्याके विवाहकी चिन्ता है, कहीं बालकोंकी शिक्षाका भार वहन करना कठिन हो रहा है। जीवन कष्टों और दु:खोंका भण्डार बन रहा है, इतनेपर भी विलासिता और आडम्बरका खर्च तो करना ही पड़ेगा; क्योंकि जीवनके उच्च स्तरको कायम रखना है! कैसी विडम्बना है!

इस दशामें अभावका नाश कैसे होगा और अभाव रहते दु:ख मिटेगा कैसे? महँगीकी राक्षसी तो मुँह बाये खड़ी ही है; पर इसमें भी यदि जीवन आडम्बरहीन और सादा हो तो अपेक्षाकृत बहुत कम खर्चमें काम चल सकता है और जीवनका दु:खभार बहुत कुछ हलका हो सकता है; पर इस ओर प्रवृत्ति ही नहीं है।

आपकी परिस्थितिपर आप स्वयं ध्यान देकर देखिये—आपको यथार्थ अभाव कितना है और आडम्बरके लिये कल्पित अभाव कितना है। माना कि आजकल समय बहुत कठिन है; पर यदि आप आडम्बर छोड़ दें और समाजकी मिथ्या प्रशंसाका मोह अथवा इज्जत घटनेका भय त्यागकर अनावश्यक खर्चोंको कम कर दें तो मैं दावेके साथ कह सकता हूँ कि आपकी जितनी आमदनी है, उतनेमें आपका काम मजेमें चल सकता है। आपकी दृष्टिमें इसीलिये कोई-सा भी खर्च अनावश्यक नहीं है कि आप झूठी तारीफके लोभमें उसको अपनाये हुए हैं। चार नौकरोंकी जगह एक नौकर रखें, मोटर निकाल दें, कम भाड़ेका छोटा मकान ले लें, सादे तथा सीधी सिलाईके कपड़े पहनें, साधारण साफ-सुथरी साड़ियाँ लेकर घरके लोग काम चलावें, तेल-साबुन आदि कम कर दें, सिनेमाको तो बिलकुल ही त्याग दें, मित्रोंको कभी दावत न दें, कुछ बचाकर उससे ऋणका भार कम करें, जिससे ब्याजका नुकसान कम हो जाय—इस प्रकार सब ओर कोर-कसर करनेसे खर्च घट सकता है और आप सुखी हो सकते हैं। यह दु:ख तो आपका अपना ही खरीदा हुआ है, जो आपकी कोशिशसे ही मिट सकता है। साथ ही आतुर होकर विश्वासके साथ आप भगवत्प्रार्थना करें। प्रार्थनामें अमोघ शक्ति है। सच्ची विश्वासभरी प्रार्थना धैर्यके साथ निरन्तर होनेपर आपको भगवान‍्की ओरसे सद‍्बुद्धि, शक्ति, सम्पत्ति और सहज स्थिति अवश्य प्राप्त होगी। शेष भगवत्कृपा।