अंडे फल नहीं हैं

प्रिय बहन! सादर हरिस्मरण! आपका पत्र मिला। ‘दूध मांस अथवा रक्त है और अंडे फल हैं’ यह मानना सर्वथा भ्रमात्मक है तथा ऐसा मानने या कहनेवाले चाहे कितने ही बड़े आदमी क्यों न हों, उनका अनुकरण करना सर्वथा हानिकारक है। अंडे खाना मांस खानेके समान ही है। इसी प्रकार हर-एकके साथ खान-पान भी हानिकारक है। डॉक्टर लोग किसी रोगीको छूकर हाथ धोते हैं। विलायती दवाओंकी शीशियोंके लेबलपर लिखा रहता है—‘हाथसे स्पृष्ट नहीं’ (Untouched by hand) तब हर किसीके साथ खान-पान करनेसे स्वास्थ्य न बिगड़ेगा, यह मानना प्रत्यक्ष भूल है। इससे देशोद्धार और प्रेमका क्या सम्पर्क है? रूस, जर्मनी, ब्रिटेन, अमरीकाके लोग सब साथ-साथ खाने-पीनेवाले हैं; उनमें महायुद्ध क्यों हुआ? ये सब अनाचार हैं और इनसे बचना चाहिये। परंतु विरोध करनेमें प्रेम और नम्रता होनी चाहिये। लड़ने, कलह करनेसे लाभ नहीं होगा, उन लोगोंका हठ और भी बढ़ेगा। घरमें रात-दिन लड़ाई-झगड़ा होना तो एक दूसरी बड़ी बुराईका उदय होना है। प्रेमसे समझाइये और उनसे कहिये कि मेरी प्रसन्नताके लिये, मुझे सुखी रखनेके लिये ही यह सब आपलोग मत कीजिये। न मानें तो लड़िये मत। अपने खान-पानकी व्यवस्था सादगी तथा प्रेमके साथ अलग कर लीजिये।

आजकल मछली, अंडे खानेका प्रचार किया जाता है, गोमांसतक खानेकी प्रेरणा दी जाती है; पर इसे आप रोक नहीं सकेंगे। ये सब पतनके लक्षण हैं। मनुष्यकी बुद्धि जब तमोगुणसे ढक जाती है, तब वह पापको पुण्य और पुण्यको पाप मानने लगता है। इसका परिणाम अध:पतन ही होता है—‘अधो गच्छन्ति तामसा:।’ शेष भगवत्कृपा।