अपना मत (वोट) किसको दें?*

प्रिय महोदय! आपका पत्र मिला। आपने लिखा कि ‘देशमें चुनाव शीघ्र होनेवाला है और नियमानुसार हम सभीको उसमें अपना मत देना पड़ेगा। अतएव हमलोग किनको मत दें—यह बतलाइये।’ इसके उत्तरमें निवेदन है कि असलमें आजकलका राजनीतिक क्षेत्र अत्यन्त दूषित हो गया है। श्री Shaw Desmond ने अपनी World-birth पुस्तकमें (देखिये पृष्ठ २४८) लिखा है— ‘Like horse-racing, there is something in Politics which degrades. They turn good men into bad men and bad into worse’ ‘घुड़दौड़की भाँति राजनीतिमें भी ऐसा कुछ है, जो मनुष्यको नीचेकी ओर ढकेल देती है। वह अच्छे मनुष्योंको बुरे मनुष्य और बुरोंको और भी पतित बना देती है।’

फिर आजकलकी धर्मशून्य राजनीति तो और भी भयानक है। बुराईमें नाम तो लिया जाता है धर्मका, पर सच पूछा जाय तो सारी बुराई है धर्मसे अनियन्त्रित उच्छृंखल राजनीतिमें ही। इसी राजनीतिने दो महायुद्ध करवाये और यही अब तीसरेके ‘उद्योगपर्व’—में लगी है। सहयोगी ‘आर्यमित्र’ ने बहुत ठीक लिखा है—‘भारतवर्षकी तबाहीका कारण भी यही गंदी और सड़ी राजनीति है। जिस राजनीतिने मानवताका संहार किया, वैर-वृक्षका बीज बोकर छिन्नता-भिन्नता और आपा-धापीका स्वार्थपूर्ण जाल बिछाया, उसे भली कहना सत्यका गला घोंटना और आत्माका हनन करना है।’ हम फिर डंकेकी चोटपर राजनीतिक अखाड़ेबाजोंसे पूछना चाहते हैं कि वे बतायें और जरूर बतायें कि धर्मने कब और क्या अनर्थ किया; यदि नहीं किया तो आज वे ‘धर्म’ शब्दका उच्चारण करनेमें भी अपनेको क्यों कलंकित समझते हैं?

फिर, आजकी राजनीतिमें जनतन्त्रके नामपर मत (वोट) प्राप्त करनेके लिये जिन साधनोंको काममें लाया जाता है, वे कितने घृणित और दूषित हैं। बिना हुए ही अपने मुँहसे बड़े-बड़े गुणोंका अपनेमें आरोप करना और दूसरेके सच्चे गुणोंको भी छिपाकर उसमें बिना हुए ही बड़े-बड़े दोष बतलाना; अपनेको ईमानदार बतलाना—और यह जानते हुए भी कि प्रतिपक्षी मुझसे अधिक ईमानदार है—उसको बेईमान बताना; मतदाताओंको फुसलाना, रिश्वत देना, डराना-धमकाना, बहकाना और धोखा देना; चाहे जैसी प्रतिज्ञा कर लेना, साथ ही द्वेष, दम्भ, छल, मार-पीट आदि न जानें ऐसे कितने पाप-प्रपंच हैं, जो मत पानेके लिये किये जाते हैं। देशके करोड़ों रुपयोंका नाश होनेके साथ ही इसमें जो भयानक चारित्रिक पतन होता है तथा वैर-विरोधकी परम्परा चलती है, वह बड़ी ही अकल्याणकारिणी है। राजनीतिके साथ यदि धर्म हो—यदि राजनीति सत्य, अहिंसा, अस्तेय, प्रेम, तपस्या, मन-इन्द्रियोंका निग्रह, धैर्य, नि:स्वार्थभाव या त्याग और कर्तव्यपरायणता आदि लक्षणोंवाले धर्मसे नियन्त्रित हो, तो ये सब पाप और बेईमानियाँ न हों, चुनाव भी सच्चा हो, न इतनी दलबंदियाँ ही हों। उसमें योग्य पुरुषका ही चुनाव हो। पर ऐसा होना तो इस समय सम्भव नहीं प्रतीत होता। राजनीतिक क्षेत्र बहुत दूषित हो गया है, अधिकार और पदकी लिप्सा बहुत बढ़ गयी है। अतएव किसी भी दबाव, धमकी, लालच, भय आदिके वशमें न होकर अपनी समझसे ऐसे लोगोंको मत देना चाहिये; जो भगवान‍्के विश्वासी हों, सत्यवादी हों, न्यायका पक्ष लेनेवाले हों, त्यागी हों, सदाचारी हों, नि:स्वार्थ हों, बुद्धिमान् हों, निर्भीक हों, धैर्यवान् हों, राजनीतिकुशल हों, द्वेषमूलक साम्प्रदायिक भावोंके दोषसे रहित हों और सारी प्रजाका समान भावसे कल्याण चाहनेवाले हों—फिर चाहे वे कांग्रेसी हों, हिंदू-महासभाई हों या अन्य किसी दलके हों अथवा स्वतन्त्र हों। चुनावका लक्ष्य ही होना चाहिये—सुयोग्यतम पुरुषोंका निर्वाचन।

हाँ, आपने जो सनातनधर्मियोंकी दृष्टिसे पूछा—इस सम्बन्धमें कुछ अवश्य विचार करना है। यद्यपि देशमें सनातनधर्मियोंकी संख्या ही अभीतक अधिक है, फिर भी अवहेलना उन्हींकी होती है और आघात भी उन्हींके धर्मपर होता है। इसका कारण है उनकी उदासीनता। सरकार अपनेको धर्मनिरपेक्ष घोषित करती है। विधानमें स्पष्ट उल्लेख भी है कि सबको अपने-अपने विश्वासके अनुसार धर्मपालनका अधिकार है। परंतु उसी स्थानपर सुधारके नामपर सनातनधर्मियोंके इस अधिकारपर पानी फेर दिया गया है। ‘हिंदू-कोडबिल’ आदि इसीके परिणाम हैं। महान् तपस्वी स्वामीजी श्रीकरपात्रीजी महाराजके तप, अनुष्ठान, प्रचार और प्रबल विरोधके कारण यह हिंदूकोड कानून नहीं बन सका; नहीं तो, अबतक यह कानून बन गया होता। जैसे ईसाई, पारसी, मुसलमान—सबको अपनी-अपनी पद्धतिके अनुसार अपने-अपने धर्मके पालनका अधिकार है, वैसे ही सनातनी हिंदुओंको भी होना चाहिये। थोड़ी देरको यह भी मान लें कि सनातनी हिंदुओंकी संख्या बहुत कम है, तो भी उनको अपने विश्वासके अनुसार धर्मपालनका अधिकार होना चाहिये। कानून बनाकर उन्हें बलात् अपने विश्वासके विरुद्ध कार्य करनेको बाध्य क्यों करना चाहिये। उनके धर्मका निर्णय कानूनसे नहीं, उस धर्मसे अनजान लोगोंसे नहीं, बल्कि उसके पालन करनेवाले और जाननेवाले आचार्यों तथा विद्वानोंके द्वारा होना चाहिये। यह न्याय होते हुए भी इसका पालन नहीं हो रहा है और सनातनी हिंदुओंके विश्वासपर कुठाराघात किया जा रहा है। इसीलिये अगले चुनावमें कुछ विद्वान् सनातनी पुरुषोंका भी निर्वाचित होना अत्यन्त आवश्यक है। इस समय देशमें जो दल चुनावमें आनेवाले हैं, उनमें स्वामीजी श्रीकरपात्रीजीकी एक ‘रामराज्यपरिषद्’ ही ऐसी है, जो शुद्ध सनातनी भावोंका उदारतापूर्वक समर्थन करती है और सबको अपने-अपने विश्वासके अनुसार धर्मपालनकी छूट देती है। अतएव सनातनधर्मी जनताको(उपर्युक्त गुणोंसे युक्त पुरुष), जो रामराज्यपरिषद्की ओरसे खड़े हों, उन्हें ही अपना मत देना चाहिये। उसके बाद हिंदू-सभा आदि जैसी संस्थाओंके उपर्युक्त गुणोंसे युक्त पुरुषोंको देना चाहिये। हिंदू-सभा सनातनी भावोंका पूर्णतया समर्थन न करनेवाली होनेपर भी भारतीय संस्कृतिकी रक्षा, गोवधनिवारण, देशकी अखण्डता आदि विषयोंमें बहुत अच्छे विचार रखती है। सबसे पहली बात तो है चुनावमें खड़े होनेवाले पुरुषकी योग्यता। वे यदि निष्पक्ष, न्यायप्रिय, धर्मभीरु, ईश्वरको माननेवाले,सत्यवादी, कुशाग्रबुद्धि और स्वार्थहीन होंगे तो फिर वे चाहे किसी दलके हों, उनके द्वारा अन्यायकी सम्भावना बहुत कम रहेगी।

मतदाताको असलमें इसी बातका ध्यान रखना है कि सुयोग्यतम पुरुष चुने जायँ। इसके लिये किसी संस्थाका और उसके द्वारा जानेवाले किसी भी पुरुषका विरोध करें, इसमें कोई आपत्ति नहीं है; परंतु उचित-अनुचितका विचार न करके अमुक संस्थाका—कांग्रेस, हिंदू-महासभा या अन्य किसीका विरोध ही करना है, इस प्रकारकी द्वेषमूलक प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये। जैसे पिछले चुनावमें लोग कहते थे कि ‘हमें तो कांग्रेसके कुत्तेको भी वोट देना है, पर कांग्रेससे बाहरी देवताको भी नहीं’, वैसे ही अब यह न कहें कि ‘हमें तो कांग्रेसके विरोध करनेवाले कुत्तेको भी वोट देना है, कांग्रेसी देवताको भी नहीं।’ राग-द्वेषहीनता, विवेक, न्याय, निष्पक्षभाव रहना चाहिये; तभी मतदाताका निर्णय यथार्थ और विशुद्ध होगा। नहीं तो जिनसे द्वेष है, उनमें दोष-ही-दोष दिखायी देंगे और जिनमें राग है, उनमें गुण-ही-गुण। यथार्थ निर्णय होगा ही नहीं और इस दशामें अवांछनीय पुरुष चुने ही जायँगे।

पर जिनको भी मत दें, उनसे कम-से-कम ये चार प्रतिज्ञाएँ अवश्य करा लेनी चाहिये—

१. गोवधको कानूनके द्वारा कतई बंद करायेंगे। २. किसी भी धर्ममें दखल देनेवाला कोई कानून नहीं बनायेंगे। ३. भारतीय संस्कृतिकी रक्षा करेंगे और ४. अन्न, वस्त्र, न्याय, शिक्षा और चिकित्साको सस्ती-से-सस्ती बनायेंगे।

‘कल्याण’ का यह क्षेत्र नहीं है। आपने पूछा, इसलिये इतनी बातें लिख दी गयी हैं।