अपनी तपस्यासे पतित पतिको सुधारिये
सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके पतिदेवका बर्ताव वास्तवमें अच्छा नहीं है। उसका प्रतीकार अवश्य होना चाहिये। पर आत्महत्या या घरसे निकल जाना उसका प्रतीकार नहीं है। उसका प्रतीकार तो है अपने त्याग, बलिदान, तप और सेवाके द्वारा उनके हृदयको बदल देना। कोई कैसा भी दुराचारी क्यों न हो—सद्भाव, सद्व्यवहार और तपस्यासे उसको बदला जा सकता है। आप उसीके लिये प्रयत्न करें। यद्यपि यह सत्य है कि जो पुरुष अपनी विवाहिता निर्दोष पत्नीका अनादर करता है, उसको सताता है, गाली देता है, मारता है, उसकी अवहेलना या उपेक्षा करके परस्त्रीमें प्रीति करता है और उसे खाने-पीनेको नहीं देता, वह बड़ा पाप करता है और इसके फलस्वरूप उसे भविष्यमें घोर दु:खोंमें फँसना पड़ेगा। उसके लोक-परलोक दोनों ही बिगड़ेंगे। परंतु पत्नीका धर्म तो यही है कि वह अपनी तपस्याके द्वारा उसको पवित्र बनाये, जिससे वह नरकाग्निका अधिकारी होकर भी साध्वी पत्नीके पुण्यसे पापमुक्त हो जाय और नरकोंसे बच जाय। ऐसी तपस्या भारतकी तपस्यामयी आर्य नारी ही कर सकती है!