अतिप्रश्न
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। धन्यवाद। आपके प्रश्नोंका उत्तर इस प्रकार है—
(१) भगवान्को किसने उत्पन्न किया?—यह अतिप्रश्न है। जो प्रश्न उठानेयोग्य न हो, उसे उठाना ‘अतिप्रश्न’ करना है। यह प्रश्नकर्ताके लिये हानिकर होता है। भगवान् अजन्मा, अविनाशी, नित्य एवं सनातन हैं। उन्हींसे सबकी उत्पत्ति होती है; उनकी कभी किसीसे उत्पत्ति नहीं होती। जो वस्तु सदा मौजूद रहनेवाली है, उसकी उत्पत्ति किससे हो सकती है। जिससे सबकी उत्पत्ति, पालन और संहाररूप कार्य होते हैं तथा जो किसी दूसरेसे उत्पन्न न होकर सदा विद्यमान रहता है, वही भगवान् है।
(२) सृष्टिरचना भगवान्का एक खेल है। अनन्त महासागरके वक्षपर युग-युगसे जो अनन्त लहरें उठती और विलीन होती रहती हैं, उसमें वायुदेवके विभ्रम-विलासके सिवा और क्या कारण हो सकता है। इन उत्ताल तरंगोंके उत्थान और लयका क्या उद्देश्य है, कौन कह सकता है। यदि कोई कहे कि ‘भगवान्की वह लीला किस कामकी, जिसमें असंख्य जीव कष्ट भोगते रहते हैं,’ तो इसका उत्तर यह है कि मनुष्य अपने ही काम, क्रोध, लोभ आदि दुर्गुणोंसे प्रेरित होकर जो शुभाशुभ कर्म करता है, उसीके फलस्वरूप वह सुख-दु:ख भोगता है। जो इन दुर्गुणोंसे बचकर राग-द्वेष, दर्प-अहंकार आदिसे दूर रहता है, वह दु:खका भागी नहीं होता। दु:ख भी अज्ञानवश ही है, वास्तवमें नहीं। शेष भगवत्कृपा।