आत्मा अनिर्वचनीय है
प्रिय महोदय! सादर हरिस्मरण। आपने लिखा कि ‘तुम कौन हो, इस प्रश्नका यथार्थ उत्तर दो।’ तो इसका उत्तर यह है कि आप यदि देहदृष्टिसे मेरा परिचय जानना चाहते हैं तो मैं एक साधारण मनुष्य हूँ, वैश्यजातिमें मेरा जन्म हुआ है और संसारमें अन्य सब लोगोंकी भाँति ही सतत मृत्युकी ओर जा रहा हूँ। और यदि आपका प्रश्न आत्मदृष्टिसे है तो कुछ कहते नहीं बनता। शास्त्रोंने आत्माको ‘सत्-चित्’ और ‘आनन्द’ नाम देकर समझानेकी चेष्टा की है। किंतु यह लक्षण भी अधूरा ही है। क्या असत्, जड और आनन्देतर वस्तु आत्मासे भिन्न है? कोई शब्द नहीं, कोई भाषा नहीं, जो उसका सम्पूर्णरूपसे निर्वचन कर सके। जहाँतक न पहुँचकर मनसहित वाणी लौट आती है, जहाँ बुद्धिकी गति कुण्ठित हो जाती है, जिस तत्त्वको श्रुतियाँ ‘नेति-नेति’ कहकर ही चुप हो जाती हैं, जिसके यथार्थ स्वरूपका प्रकाश नहीं कर सकतीं, उसका वर्णन कौन कर सकता है। वह नेत्रका भी नेत्र, मनका भी मन, बुद्धिकी भी बुद्धि और आत्माका भी आत्मा है। वह सर्वव्यापी, सर्वस्वरूप होता हुआ भी सबसे विलक्षण है—सर्वातीत है। उसके विषयमें तो इतना ही कहकर संतोष करना पड़ता है कि वह अनिर्वचनीय है—अनुभवगम्य है। यह मेरा अनुभव नहीं, शास्त्रोंका सिद्धान्त और महात्माओंका अनुभव है।
भक्त मैं हूँ नहीं, जो कहूँ कि मुझे भगवान्का दासत्व प्राप्त है। ऐसा सौभाग्य जिन महानुभावोंका है, मैं तो उनकी चरणरजका भिखारी हूँ। हाँ, इतना कह सकता हूँ कि श्रीभगवान् अपरिसीम, अनन्त, अविकारी, अनामय एवं अनिर्वचनीय हैं। साथ ही वे सम्पूर्ण भूतोंके सुहृद् तथा परम दयालु हैं। सम्पूर्ण जीवोंके प्रति उनका स्वाभाविक सौहार्द है (‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’)। अत: एक प्राणीके नाते उनकी इस सहज कृपाका, स्वाभाविक सौहार्दका मैं भी अधिकारी हूँ और समय-समयपर मुझे भी इसका अनुभव होता रहता है।
मेरे इस उत्तरसे पता नहीं, आपको संतोष होगा या नहीं? शेष भगवत्कृपा।