भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य मथुरा और गोकुल दोनोंमें हुआ था

प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपने लिखा कि ‘श्रीमद्भागवत, दशमस्कन्धके पंचम अध्यायके प्रथम श्लोकमें आया है—‘नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने जाताह्लादो महामना:।’ अर्थात् ‘महामना श्रीनन्दजीके आत्मज (पुत्र) उत्पन्न होनेपर उनको परमानन्द हुआ।’ तो क्या नन्दजीके यहाँ भी श्रीभगवान् पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे? यदि नहीं, तो ‘नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने’ न कहकर श्रीमद्भागवतकारको यों कहना चाहिये था; ‘नन्दस्तमात्मजं मत्वा’ (नन्दने वसुदेवनन्दनको आत्मज—अपना पुत्र मानकर)। परंतु श्रीशुकदेवजीने स्पष्ट ‘आत्मज उत्पन्ने’ कहा है। इससे यही सिद्ध होता है कि नन्दबाबाके घर भी भगवान् प्रकट हुए थे। इस सम्बन्धमें आपका क्या विचार है?’

इसके उत्तरमें निवेदन है कि यद्यपि श्रीमद्भागवतमें ऐसा कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि भगवान् दोनों स्थलोंपर प्रकट हुए थे, तथापि भगवान‍्ने ऐसी लीला की हो तो भी क्या आश्चर्य है? श्रीमद्भागवत (स्क० १० अ० ८६) में ही वर्णन आता है कि भगवान् मिथिलामें श्रुतदेव नामक ब्राह्मण तथा मिथिलानरेश बहुलाश्व—दोनों ही भक्तोंके यहाँ एक ही साथ अलग-अलग गये थे और उनकी मन:कामना पूर्ण की थी। श्रुतदेवने समझा कि भगवान् हमारे घर पधारे हैं और बहुलाश्वने जाना कि हमारे घर। रासमण्डलमें तो कोटि-कोटि गोपियोंमें भगवान् प्रत्येक दो गोपियोंके बीच एक-एक रूपसे प्रकट थे। प्रत्येक गोपी देखती थी कि भगवान् हमारे ही साथ हैं। ऐसे सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीवसुदेव-देवकीके यहाँ कंसके कारागारमें और नन्द-यशोदाके घर गोकुलमें पृथक्-पृथक् प्रकट हो जायँ, इसमें क्या बड़ी बात है?

कुछ प्रेमी भक्तोंकी ऐसी मान्यता भी है कि श्रीवसुदेव-देवकीकी भक्ति ऐश्वर्यमिश्रित वात्सल्यमयी थी और श्रीनन्द-यशोदाकी ऐश्वर्यगन्धशून्य विशुद्ध वात्सल्यमयी। इसीसे वसुदेव-देवकीके सामने भगवान् चतुर्भुज, शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी बालकके रूपमें आविर्भूत हुए। भगवान‍्के इस ऐश्वर्यमय स्वरूपको देखकर उन्होंने समझा कि श्रीभगवान् हमारे पुत्ररूपमें प्रकट हुए हैं; अतएव उन्होंने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की और भगवान‍्ने भी उनके पूर्वजन्मोंकी याद दिलाकर उन्हें अपने भगवान् होनेका परिचय दिया। इसमें ‘ऐश्वर्य’ प्रत्यक्ष है। तदनन्तर वात्सल्यभावका उदय होनेपर कंसके भयसे उन्होंने भगवान‍्से बार-बार अपने चतुर्भुज रूपको छिपानेके लिये अनुरोध किया। इससे यह सिद्ध है कि श्रीवसुदेव-देवकीका वात्सल्यप्रेम ऐश्वर्यमिश्रित था और भगवान‍्का ऐश्वर्यमय चतुर्भुज रूप ही उनका आराध्य था तथा वे उसीको पुत्ररूपमें प्राप्त करना तथा देखना चाहते थे। परंतु श्रीनन्द-यशोदाका विशुद्ध वात्सल्यप्रेम था; उसमें ऐश्वर्य-ज्ञानका तनिक भी सम्बन्ध नहीं था; इससे उनके सामने भगवान् द्विभुज प्राकृत बालकके रूपमें ही आविर्भूत हुए और उन्होंने कोई स्तुति-प्रार्थना भी नहीं की। पुत्र समझकर गोदमें उठा लिया और नवजात बालकके कल्याणार्थ जातकर्मादि करवाये।

यह प्रसिद्ध ही है कि भगवान् उसी रूपमें भक्तके सामने प्रकट होते हैं, जो रूप भक्तके मनमें होता है। श्रीमद्भागवत (३।९।११) में श्रीब्रह्माजीने कहा है—

‘यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति

तत् तद् वपु: प्रणयसे सदनुग्रहाय॥’

‘भगवन्! आपके भक्त जिस स्वरूपकी निरन्तर भावना करते हैं, आप उसी रूपमें प्रकट होकर भक्तोंकी मन:कामना पूर्ण करते हैं।’

श्रीमद्भागवतमें जो यह स्पष्ट वर्णन नहीं आया है, इसका कारण यह बताया जाता है कि श्रीशुकदेवजी भक्तराज परीक्षित् को कथा सुना रहे थे। परीक्षित् का सम्बन्ध वसुदेवजीसे था। अत: उन्हें विशेष आनन्द देनेके लिये शुकदेवजीने नन्दालयमें भी भगवान‍्के प्रकट होनेका वर्णन नहीं किया; परंतु उनका प्रेमपूर्ण हृदय माना नहीं और इस श्लोकमें उनके श्रीमुखसे ‘नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने’ रूपमें रहस्य प्रकट हो ही गया। श्रीमद्भागवतमें एक संकेत और भी है—कंसने जब गोकुलसे लायी हुई यशोदाकी कन्याको देवकीकी कन्या समझकर उसे मारनेके लिये शिलापर पटकना चाहा, तब वह उसके हाथसे छूटकर आकाशमें चली गयी और देवीरूपसे प्रकट हुई। उस समय भागवतमें उसके लिये ‘अदृश्यतानुजा विष्णो:’ अर्थात् कंसने भगवान‍्की अनुजा(छोटी बहिन) को देखा—यह लिखा है। पर यदि भगवान् श्रीकृष्ण केवल श्रीदेवकीके पुत्र होते तो यशोदाकी कन्याको भगवान‍्की ‘अनुजा’ कहना युक्तियुक्त तथा सत्य न होता। किंतु परमानन्दघनविग्रह भक्तवाञ्छाकल्पतरु श्रीभगवान् जिस समय कंस-कारागारमें वसुदेवात्मजके रूपमें प्रकट हुए थे, ठीक उसी समय गोकुलमें नन्दात्मजके रूपमें भी प्रकट हुए थे तथा उसीके थोड़ी देर बाद योगमाया कन्याके रूपमें प्रकट हुई थी। श्रीहरिवंशमें कहा गया है—

गर्भकाले त्वसम्पूर्णे अष्टमे मासि ते स्त्रियौ।

देवकी च यशोदा च सुषुवाते समं तदा॥

(विष्णुपर्व ४।११)

अर्थात् देवकी और यशोदा दोनोंने गर्भकाल पूरा होनेके पहले ही आठवें महीनेमें एक ही साथ बालकको जन्म दिया था। इसपर यह कहा जा सकता है कि ‘जिस समय देवकीजीके भगवान् पुत्ररूपमें प्रकट हुए, उसी समय यशोदाजीके योगमाया प्रकट हुईं।’ पर यह कथन बनता नहीं; क्योंकि श्रीमद्भागवत (१०।३।४) में यह स्पष्ट उल्लेख है कि ‘श्रीभगवान‍्से प्रेरित वसुदेवजीने पुत्रको गोदमें लेकर कारागारसे बाहर निकलनेकी इच्छा की, उस समय ‘योगमाया’ प्रकट हुईं।’ अतएव कारागारमें भगवान‍्का और गोकुलमें योगमायाका प्राकट्य आगे-पीछे हुआ, एक ही समय नहीं हुआ था। इसपर यह शंका की जा सकती है कि ‘गोकुलमें भगवान् प्रकट हुए हों, इसमें स्पष्ट प्रमाण क्या है?’ तो इसके समाधानमें ‘श्रीकृष्णयामल’ का कहना है कि नन्दपत्नी यशोदाके यमज संतान हुई थी, पहले एक पुत्र हुआ, तदनन्तर एक कन्या हुई; पुत्र साक्षात् श्रीगोविन्द थे और कन्या थीं स्वयं अम्बिका (योगमाया)। यशोदाकी इस कन्याको ही वसुदेवजी मथुरा ले गये थे—

नन्दपत्न्यां यशोदायां मिथुनं समपद्यत।

गोविन्दाख्य: पुमान् कन्या साम्बिका मथुरां गता॥

इस स्पष्टोक्तिसे योगमायाको ‘श्रीकृष्णकी अनुजा’ कहा जाना भी सार्थक हो गया।

इसपर प्रश्न किया जा सकता है, ‘फिर श्रीवसुदेवजी जब शिशु श्रीकृष्णको लेकर गोकुल गये, तब वहाँ उन्हें केवल शिशु बालिका ही क्यों दिखायी दी, बालक क्यों नहीं दिखायी दिया और बालक भी था तो फिर वह बालक कहाँ गया? वहाँ दो बालक होने चाहिये।’ इस शंकाका समाधान यह है कि इनके वहाँ पहुँचते ही उसी क्षण इनका बालक उस बालकमें विलीन हो गया। इन्हें पता ही नहीं लगा कि वहाँ कोई बालक और भी था। वरं महानुभावोंने यहाँतक माना है कि जिस समय कंसके कारागारमें देवकीने यह प्रबल इच्छा की कि श्रीभगवान‍्का चतुर्भुज रूप छिप जाय, उसी समय यशोदाहृदयस्थ भगवान‍्का द्विभुज बालकरूप उस चतुर्भुज रूपको छिपाकर देवकीके सामने आविर्भूत हो गया। (यदा स्वाविर्भूतचतुर्भुजरूपाच्छादनाय श्रीदेवकीच्छा जायते, तदा यशोदाहृदयस्थद्विभुजरूपस्य तद्रूपाच्छादनपूर्वकाविर्भावस्तत्रासीदिति गम्यते—वैष्णवतोषिणी) यशोदाकी कोखसे प्रकट भगवान् वहाँसे तुरंत यहाँ आकर प्रकट हो गये और उनमें भगवान‍्का शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी चतुर्भुज रूप तुरंत वैसे ही विलीन हो गया, जैसे बादलमें बिजली विलीन हो जाती है—

वसुदेवसुत: श्रीमान् वासुदेवेऽखिलात्मनि।

लीनो नन्दसुते राजन् घने सौदामनी यथा॥

(श्रीकृष्णयामल)

इसके अतिरिक्त श्रीभागवतमें भी देवकी और यशोदा दोनोंके ही सामने भगवान‍्के प्रकट होनेका संकेत है—

देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णु: सर्वगुहाशय:।

आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कल:॥

(१०।३।८)

यह ‘देवकी’ शब्द ‘देहली-दीपक’ न्यायसे श्रीदेवकीजी और श्रीयशोदाजी दोनोंका ही वाचक है; क्योंकि यशोदाजीका भी दूसरा नाम ‘देवकी’ था। श्रीहरिवंशपुराणमें आया है—

द्वे नाम्नी नन्दभार्याया यशोदा देवकीति च।

अत: सख्यमभूत्तस्या देवक्या शौरिजायया॥

‘नन्दभार्या यशोदाके यशोदा और देवकी—दो नाम थे, इसीलिये उनका नामसाम्यके कारण वसुदेव-पत्नी देवकीसे सख्यभाव था।’

इस वाक्यसे भी यह कहा जा सकता है कि सांकेतिक भाषामें श्रीशुकदेवजीने दोनों जगह भगवान‍्के प्राकट्यकी बात कह दी थी। महानुभावोंका कहना है कि भगवान‍्के दो रूप हैं—‘ऐश्वर’ और ‘ब्राह्म’। ‘ऐश्वर’ मायाविशिष्ट है और ‘ब्राह्म’ स्वरूप मायातीत है। अचिन्त्यानन्त-अतुलनीय-कल्याण-गुणगणसम्पन्न स्वमायाविशिष्ट ‘ऐश्वर’ रूपके द्वारा इस विश्वब्रह्माण्डका सृजन-पालन आदि होता है। भगवान‍्का शुद्ध ब्राह्म-स्वरूप उत्पादन-पालनादि लीलाओंसे रहित केवल आनन्द-प्रेममय है। अत: वसुदेवजीके यहाँ भगवान‍्के जिस रूपका प्राकट्य हुआ था, वह उनका ‘ऐश्वर’ रूप था और ‘नन्दात्मज’ रूपसे ब्राह्म-स्वरूप भगवान् अवतरित हुए थे। श्रीवसुदेवजीके यहाँ आविर्भूत ‘ऐश्वर’ रूप नन्दात्मज ब्राह्म-स्वरूपमें विलीन हो गया था। रास आदि मधुरतम लीलाओंमें ‘ब्राह्म’ स्वरूप प्रकट था और असुरादि-वध, अग्निपान आदि लीलाओंमें ‘ऐश्वर्य’ स्वरूप रहता था। जब भगवान‍्को श्रीअक्रूरजी मथुरा ले गये, तब ‘ऐश्वर्य’ स्वरूपसे भगवान् उनके साथ चले गये और भगवान‍्का विशुद्ध आनन्द-प्रेममय ब्राह्म-स्वरूप अप्रकटरूपसे गोपांगनाओंके साथ व्रजमण्डलमें रह गया। यही ‘वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति’ का रहस्य है।

इस विवेचनके अनुसार श्रीभगवान् ‘नन्दात्मज’ रूपमें भी अवतीर्ण हुए हों तो कोई बड़ी बात नहीं है। भगवान‍्के लिये क्या असम्भव है। शेष भगवत्कृपा।