भगवान् विश्वम्भर हैं
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला था.......। उत्तरमें निवेदन है कि भगवान् विश्वम्भर हैं। वे ही सबका भरण-पोषण करते हैं। विश्वके स्रष्टा तथा संहारक भी वे ही हैं। आप कई प्राणी ऐसे देखते होंगे, जिनके विषयमें आप सोचते होंगे कि ये खानेको कुछ भी नहीं पाते। परंतु ऐसी बात नहीं है। जो जीवित हैं, उन्हें जीवन-धारणोपयोगी वस्तु अथवा शक्ति भगवान्से ही प्राप्त होती है। माली पेड़ लगाता और उसे सींचता है। जिस पेड़को वह रखना नहीं चाहता, उसे सूखनेपर या बिना सूखे ही उखाड़ देता है। विश्वम्भर भी जिसे रखते हैं, उसे जीवन-धारणका साधन देते हैं; जिन्हें नहीं रखना चाहते हैं, उन्हें इस जगत्से उठा लेते हैं। उन्होंने प्रत्येक जीवके कर्मानुसार उसकी आयु नियत कर दी है। जबतक आयु शेष रहती है, तबतक उसे भोजनादि देकर वे ही जीवित रखते हैं। आयुकी समाप्ति होनेपर वे ही उस शरीरसे उसको अलग कर लेते हैं। स्थूलशरीरसे अलग होकर भी जीव अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है और उस समय भी उसे संरक्षण एवं भरण-पोषणकी आवश्यकता होती है। उस दशामें जगत्का दूसरा कोई प्राणी उसकी प्रत्यक्ष सहायता नहीं कर सकता। वहाँ तो सर्वत्र फैला हुआ केवल भगवान्का वरद हस्त ही उसको सुरक्षित एवं संतुष्ट रख पाता है। जीवकी दृष्टि स्थूल एवं सीमित है। इसलिये वह मृत्युमें विश्वम्भरके भरण-पोषणकी क्रिया नहीं देख पाता। जिसकी आयु शेष नहीं है, उसकी मृत्यु होगी ही, चाहे उसमें निमित्त कुछ भी हो। भूखसे भी मनुष्य अथवा प्राणी मर सकता है। उसकी मृत्युके लिये विश्वम्भरने यह निमित्त क्यों चुना, यह उस जीवके पूर्वकर्मोंको देखनेवाला ही बता सकता है। भगवान् ही उसके कर्म तथा आयुको देखते हैं, अत: वे ही उसके अनुरूप निमित्तका चुनाव कर सकते हैं। अधिक भोजन देकर भी किसीको मारा जा सकता है। अधिक भोजनसे मृत्यु होनेपर आप ‘विश्वम्भर’ में त्रुटि नहीं पाते; केवल भूखसे मरनेपर ‘विश्वम्भर’ नाम सार्थक नहीं होगा, ऐसी आपकी धारणा है। किंतु यह धारणा बुद्धिसंगत नहीं है। ‘विश्वम्भर’ का अर्थ है—विश्वका रक्षक और पोषक। वह किसी प्रकारकी भी अरक्षासे बचानेके लिये उत्तरदायी है। हम अपने बच्चेको सर्दी, गरमी और बरसातके अनुरूप कपड़े पहनाते और बदलते हैं। इसी प्रकार भगवान् भी आवश्यकता समझकर जीवका एक शरीरसे वियोग और दूसरेसे संयोग कराते रहते हैं। जबतक उसे उस शरीरमें रखना होता है, तबतक उसे भूख, अधिक भोजन, अस्त्र-शस्त्र, अग्नि, विष, जल आदि सभी मृत्युकारक भयोंसे बचाकर उसका भरण-पोषण करते हैं। जब शरीर नहीं रखना होता तब उसकी मृत्युका उचित कारण पैदा करके उसका अन्त कर देते हैं। भगवान्के द्वारा जन्म देना, जीवित रखना या मारना—ये सारी क्रियाएँ जीव-जगत्के सहज भरण-पोषण-कल्याणके लिये ही होती हैं—यह रहस्य भगवान्की दयासे तथा शास्त्र एवं महात्माओंके स्वाध्याय-सत्संग आदिसे समझमें आता है।
भगवन्नाम-जपसे महर्षि वाल्मीकिको भगवत्प्राप्ति हुई थी। अनेकानेक ऋषि-महर्षि इस नाम-जपके द्वारा भगवच्चरणारविन्द-मकरन्दका पान करनेमें समर्थ हुए हैं। शास्त्रोंका भी यही मत है—
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥
(ना० पु० १।४१।११५)
‘कलिजुग केवल नाम अधारा’—संत महात्माओंका भी ऐसा ही अनुभव है। यह ध्रुव सत्य है कि भगवन्नामके प्रभावसे प्रभुके दर्शन होते हैं और नामाश्रयी पुरुष समस्त पाप-तापोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है। शेष भगवत्कृपा।