भगवान‍्का दिव्यरूप

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला, धन्यवाद। उत्तरमें निवेदन है कि गोस्वामीजीने—

‘रंगभूमि जब सिय पगु धारी।

देखि रूप मोहे नर नारी॥’

(मानस १।२४७।२)

—इस पद्यमें जिस मोहकी बात लिखी है, इसमें और ‘मोह न नारि नारि के रूपा। (मानस ७।१४१।१)’ वाले मोहमें बहुत अन्तर है। ‘स्त्री स्त्रीके रूपपर मोहित नहीं होती।’ तात्पर्य यह है कि वह पुरुषके रूपपर मोहित होती है और पुरुष स्त्रीके रूपपर मोहित होता है। यही उनके लिये स्वाभाविक है। इन पंक्तियोंमें जो मोह है वह काममूलक या वासनामूलक है। विषयासक्तिसे प्रेरित होकर स्त्री पुरुषपर और पुरुष स्त्रीपर मोहित होते हैं। यह बहुत ही घृणित एवं निकृष्ट मोह है। ऐसे मोहके लिये ऐसा कहना सर्वथा उपयुक्त ही है कि ‘मोह न नारि नारि के रूपा।’

परंतु जनकनन्दिनीजीके रंगभूमिमें पधारनेपर जो समस्त नर-नारी मोहित हो गये, उनका मोह और ही प्रकारका था। वह मोह नहीं, अनिर्वचनीय आनन्दका उन्माद था। भगवती सीता भगवान् श्रीरामकी आह्लादिनी शक्ति हैं। वे दोनों अभिन्नस्वरूप हैं। ये ही समस्त जड-चेतनके आत्मा हैं, अतएव वे सबके परम प्रेमास्पद हैं। संसारकी जितनी सुखद वस्तुएँ हैं, वे सब अपने आत्माको प्रिय लगनेके कारण सुखदायिनी मानी जाती हैं। स्त्री, पुत्र, धन, यह शरीर और प्राण भी स्वत: प्रिय नहीं हैं; आत्माके लिये ही ये प्रिय माने गये हैं। अत: अधिक प्रिय एवं सुखस्वरूप आत्मा है। आत्माकी ओर सबका स्वाभाविक आकर्षण है। सबके आत्मा हैं—भगवान् श्रीराम और सीता; अत: उनकी ओर प्राणिमात्रका स्वाभाविक आकर्षण है। वे ही जब लोकोत्तर लावण्य, माधुर्य एवं आनन्दके पुंजीभूत चिन्मय दिव्यविग्रह धारण करके नेत्रोंके सामने प्रकट हों, तब उनकी अनुपम रूप-माधुरीका पान करके प्राणिमात्रका अलौकिक आनन्दमें निमग्न हो जाना क्या आश्चर्यकी बात है। इस आनन्दोन्मादको ही वहाँ ‘मोह’ कहा गया है। ऐसा मोह बड़े भाग्यसे प्राप्त होता है। यही मोह या आनन्दोन्माद श्रीरामकी दिव्य छबि देखकर जनकपुरके नर-नारियोंको भी हुआ था।

भगवान् और उनकी चिन्मयी शक्तिके लोकोत्तर सौन्दर्य-माधुर्यमय दिव्य-विग्रहका गुण ही ऐसा है, जिसकी ओर समस्त नर-नारियोंका ही नहीं, बड़े-बड़े आत्माराम मुनियोंका मन भी हठात् आकृष्ट हो जाता है—

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।

कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरि:॥

(भागवत १।७।१०)

उन्हें देखते ही प्राणिमात्र प्रेमविह्वल हो जाते हैं। सनकादि मुनीश्वरोंने एक बार भगवान् श्रीहरिकी झाँकी की और उनके प्राण प्रेमजनित आनन्दसे उन्मत्त हो उठे।

श्रीमद्भागवतमें आया है—

तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द-

किंजल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायु:।

अन्तर्गत: स्वविवरेण चकार तेषां

संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वो:॥

(३।१५।४३)

‘कमलनयन भगवान‍्के चरणारविन्दोंपर विराजमान तुलसी-मंजरीके सौरभ और मकरन्दको लेकर जो हवा चली, वह नासिकारन्ध्रसे उन सनकादिके भीतर प्रवेश कर गयी। यद्यपि वे निर्गुण-निराकार अक्षरतत्त्वके चिन्तन करनेवाले वीतराग महात्मा थे, तो भी उस दिव्य वायुने उनके मन और शरीरको क्षुब्ध कर दिया। वे उन्मत्त हो गये।’

भगवान् श्रीराम-लक्ष्मणकी रूप-छटाको देखकर स्वयं विदेहराज मोहित हो गये थे—

सहज बिराग रूप मनु मोरा।

थकित होत जिमि चंद चकोरा॥

इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा।

बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥

(मानस १। २१५। १-१/२, २-१/२)

ऐसे मोहका सौभाग्य विरले भाग्यवानोंको ही प्राप्त होता है।

‘रंगभूमि जब सिय पगु धारी।

देखि रूप मोहे नर नारी॥’

—में बताये अनुसार समस्त नर-नारी इसी प्रकार मोहित—आनन्दनिमग्न हुए थे।

२—तुलसीकृत रामायण तथा वाल्मीकीय रामायणके कुछ प्रसंगोंमें कुछ मतभेद आपने दिखाये, सो ठीक है। इनके सिवा और भी बहुत-से रामायण हैं तथा उन सबमें भी कुछ-न-कुछ अन्तर मिलता है। इसके कई कारण हैं। कुछ तो लेखक भिन्न-भिन्न होनेसे ही भेद दिखायी पड़ता है। फिर ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ के अनुसार तो भगवान‍्की कथाको कोई ‘इदमित्थम्’ रूपसे कह भी नहीं सकता। दूसरा समाधान कल्पभेदसे किया जाता है। सृष्टिके अबतक असंख्य कल्प बीत गये। सब कल्पोंमें श्रीरामके अवतार होते हैं। भिन्न-भिन्न ऋषियोंने समाधिके द्वारा या भगवत्कृपासे भिन्न-भिन्न कल्पोंकी कथाको साक्षात्कार करके लिखा है; अत: कल्पभेदसे उनमें कुछ अन्तर होना स्वाभाविक ही है।

३—यह ठीक है कि आजकल भारतवर्षमें बड़ी दुर्दशा है, भगवान‍्को अवतार लेना चाहिये; परंतु अवतार तब होता है, जब मनुष्यके लिये भगवान‍्के सिवा और कोई भरोसा नहीं रह जाता, जब सब लोग आर्तभावसे भगवान‍्को पुकारते हैं। आज तो भगवान‍्की आवश्यकता ही नहीं मानी जाती; लोगोंको अपने वैज्ञानिक बलपर गर्व है, अपने बुद्धिकौशलका अभिमान है; अत: भगवान‍्को पुकारनेकी आवश्यकता नहीं समझी जाती। ऐसी दशामें भगवान् भी चुपचाप देखते हैं। अभिमान और भगवान् एक साथ नहीं रहते। यदि हम चाहते हैं कि भगवान् प्रकट हों तो हम सबको एक स्वरसे व्याकुलतापूर्वक भगवान‍्को पुकारना चाहिये। जो भगवान‍्के लिये एक कदम चलता है, भगवान् उसके लिये सौ कदम आगे बढ़ते हैं। यदि स्वेच्छासे ही भगवान‍्को अवतार लेना है, हमको-आपको आवश्यकता नहीं है, तब भगवान् जब उपयुक्त अवसर समझेंगे, तब प्रकट होंगे। अभी तो हमें अपने दु:खमय प्रारब्धका भोग करना ही बदा जान पड़ता है। शेष भगवत्कृपा।