भगवान‍्का मंगलमय विधान

प्रिय महोदय! सादर हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। आपके पुत्र और पुत्री दोनोंका आकस्मिक परलोकवास हो गया, यह पढ़कर खेद हुआ। आपलोग भगवान‍्के भक्त हैं। सदा उनकी पूजा करते रहे हैं। फिर भी बालकोंका आपके साथ असमयमें विछोह हो गया। भगवान‍्ने चेचकके द्वारा उन बालकोंको आपसे विलग कर दिया। इसके लिये आपको तथा आपकी धर्मपत्नीको शोक होना स्वाभाविक ही है।

परंतु ऐसी परिस्थितिमें अधीर नहीं होना चाहिये। आपने अथवा आपके बच्चोंने जो भगवान‍्का भजन अथवा भगवान‍्की सेवा-पूजामें सहयोग किया है, उसका फल तो आप सब लोगोंके लिये परम मंगलमय होगा ही। वर्तमान दु:ख तो आपके पूर्वजन्मोंके किये हुए किसी कर्मका परिणाम है। मनुष्यको इस जन्ममें जो भी सुख-दु:ख प्राप्त होते हैं, वे उसके पूर्वकृत कर्मोंके परिणाम हैं। उनका वर्तमान शुभाशुभ कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये। आपके दोनों बच्चे कोई पुण्यात्मा जीव थे, कर्मका भोग शेष रह जानेसे उन्हें थोड़े दिनोंके लिये इस संसारमें जन्म लेना पड़ा था। संसारमें आकर वे आप-जैसे पुण्यवानोंके घरमें उत्पन्न हुए, बचपनसे ही भगवान‍्की सेवामें योग देते रहे और अन्तमें तीर्थराजकी पावन त्रिवेणीमें स्नान करके घर लौटनेपर उन्होंने इस क्षणभंगुर शरीरका त्याग किया। अत: उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये। वे उतनी ही आयु लेकर आये थे, अत: जल्दी चले गये। वे भगवान‍्के ही थे, भगवान‍्ने उन्हें अपने समीप बुला लिया। आपके पास तो कुछ दिनोंतक धरोहरकी भाँति उन्हें भगवान‍्ने रख दिया था। आप उन्हें अपनी वस्तु मानकर ममताके अतिरेकसे दु:ख उठा रहे हैं। आपको यह सोचकर संतोष करना चाहिये कि भगवान‍्ने अपनी वस्तु अपने पास मँगवा ली।

संसारका सम्बन्ध अनित्य है। यहाँकी प्रत्येक वस्तु क्षणभंगुर है। अपना यह शरीर भी सदा साथ नहीं देता। अत: यहाँकी सब वस्तुओंको अपना माननेसे दु:खके सिवा और कुछ नहीं मिल सकता। ममता ही सब दु:खोंका मूल है, इसे नष्ट कर देनेसे ही शान्ति मिलती है। भगवान‍्के भक्तको भगवान‍्के प्रत्येक विधानमें अपना परम मंगल ही मानना और देखना चाहिये। हमारी दृष्टि सीमित है; अत: प्रभुके सौहार्दपूर्ण विधानका रहस्य हम समझ नहीं पाते। इसीलिये हम मनके प्रतिकूल कुछ भी होता देख घबरा उठते हैं। किंतु भगवान् सबके सखा हैं, सुहृद् हैं, प्रियतम हैं; वे सबका परम कल्याण ही करना चाहते हैं। मनुष्य अपने ऊपर जो पाप-पुण्यकी मैल चढ़ा लेता है, उसकी शुद्धिके लिये भगवान् जीवको दु:ख-सुखके जलसे नहलाया करते हैं। वे जीवको शुद्ध करके माताकी भाँति छातीसे चिपका लेते हैं। जैसे, माँ अपने बालकके मलको धोकर उसे गोदमें ले लेती है, इसी प्रकार प्रभु भी किया करते हैं। माता जब नहलाती है तो बालक रोता है और माताके उस कार्यको निष्ठुरतापूर्ण बर्ताव मानता है। यही दशा संसारके हम सब जीवोंकी है। हम उस ममतामयी माँकी वत्सलताको नहीं देख पाते।

आप भगवान‍्की दयापर विश्वास करके निश्चिन्त हो जायँ। आप भगवान‍्के हैं, फिर चिन्ता किस बातकी। विश्वम्भर आपकी स्वयं सँभाल करेंगे। आप तो उन्हींकी प्रसन्नताके लिये स्वधर्मका पालन करते रहें। शेष भगवत्कृपा।