भगवान‍्के आश्रयसे दोषोंका नाश

प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके चित्तमें नाना प्रकारकी चिन्ताएँ हैं, विषाद है, संदेह है, भूतकालके लिये पश्चात्ताप है, भविष्यके लिये व्याकुलता है और नाना प्रकारके भय हैं। इन सबके होनेमें चाहे कितने ही, कैसे भी कारण क्यों न हों, इन सबका नाश मनसे भगवान‍्का आश्रय ग्रहण करते ही हो जायगा; यह निश्चित है। भगवान‍्ने गीतामें कहा है—

मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

(१८। ५८)

‘मुझमें निरन्तर चित्त लगाता हुआ तू मेरी कृपासे सब संकटोंसे अनायास ही तर जायगा।’

प्रात:काल उठते ही सबसे पहले भगवान‍्का स्मरण करके अपनेको उनके चरणोंमें डाल देना चाहिये। विभिन्न आवश्यकताओं, क्रियाओं और कर्तव्योंके विचार मनमें आनेसे पहले ही उन सबको भगवान् पर छोड़ देना चाहिये। ऐसा कौन-सा कठिन-से-कठिन कार्य है, जो भगवान‍्की कृपासे नहीं हो सकता। अपने पुरुषार्थ, अपनी कल्पना, अपनी बुद्धि आदिको परे रखकर भगवत्कृपाको, भगवान‍्की दिव्य चेतनाको सीधे काम करने देना चाहिये। कुछ ही दिन यह करनेपर आप देखेंगे कि आपका मन भगवान‍्के विशुद्ध प्रकाशसे भर जायगा और फिर उसमें भय, विषाद, संदेह, निराशा आदिका अन्धकार नहीं प्रवेश कर सकेगा।

अभी आपने भगवत् प्रकाशके लिये अपने हृदयके द्वार बंद कर रखे हैं और आप जो कुछ करना या पाना चाहते हैं, सब बाहरी प्रयत्नों, पदार्थों या प्राणियोंके द्वारा ही; तथा इन प्रयत्नों आदिमें भी शुद्धि नहीं है, सात्त्विकता नहीं है। एक तो भरोसा ही शक्तिहीन, प्राणहीन, सत्त्वहीन वस्तुओंका है। दूसरे, उस भरोसेकी सफलता चाहते हैं—झूठ, कपट, छल, द्वेष, हिंसा, मत्सर, क्रोध, ईर्ष्या आदि दुर्भावों एवं दुष्प्रवृत्तियोंके द्वारा। ऐसी हालतमें चिन्ता, विषाद, शोक, निराशाके अतिरिक्त और क्या मिलेगा?

इस स्थितिसे निकलना चाहते हैं तो आप अपने हृदयके द्वार खोल दीजिये और भगवान‍्की कृपाशक्तिको अपने दिव्य, समर्थ और कभी असफल न होनेवाले भावोंके सहयोगसे निर्बाध काम करने दीजिये। अपनी कोई बात बीचमें न लाइये। फिर, कुछ ही समयमें आपको अपनी स्थितिमें प्रत्यक्ष परिवर्तन दिखायी देगा।

पर भगवान‍्का यह आश्रय करना पड़ेगा स्वयं आपको ही। दूसरा कोई जबरदस्ती आपसे यह नहीं करवा देगा। दूसरा आपको सम्मति दे सकता है, साहस और उत्साह दिला सकता है, पर आपके बदलेमें वह भगवान‍्का आश्रय नहीं ले सकता; अपने लिये यह अधिकार तो बस, आपको ही है। आप अपनी अन्तर्दृष्टिको भगवान‍्की ओर फिराइये। उनकी दयापूर्ण चरण-कमल-रजके आश्रयमें अपनेको डाल दीजिये; फिर उनकी कृपासे आपकी सारी कठिनाइयाँ दूर हो जायँगी। आपके हृदयमें जब भगवान‍्की कृपाशक्ति आ जायगी, तब उसीके साथ-साथ निर्भयता, निश्चिन्तता, आनन्द, सुख, आशा, समाधान और परम विश्वास अपने-आप ही आ जायँगे। तभी आप परम सुखी हो सकेंगे। शेष भगवत्कृपा।