भगवान्के साथ कोई भी सम्बन्ध मानिये
मान्या बहनजी! सादर हरिस्मरण। आपका पत्र प्राप्त हुआ। आप अपने पतिदेवको उनके गुरुके कथनानुसार शंकर मानती थीं और अपनेको पार्वती मानती थीं; अब पतिदेवके परलोकवासी हो जानेपर भी उसी प्रकार मानती हैं और भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करती हैं तथा उनमें पिताका भाव रखती हैं—सो इसमें कोई दोष या हानिकी बात नहीं है। भगवान्से जो भी सम्बन्ध जोड़ा जाय वही उपयुक्त है। वे पिता, पुत्र, पति, भाई, गुरु—सब कुछ हैं। यह सम्बन्धयुक्त रागात्मिका भक्ति बहुत अच्छी मानी गयी है; पर होनी चाहिये वह सच्ची। मनका सच्चा भाव होगा तो भगवान् उसे अवश्य स्वीकार करेंगे। शेष भगवत्कृपा।