भगवान्की सब लीलाओंका अनुकरण नहीं हो सकता
प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। भगवान्की अवतार-लीलाओंके सम्बन्धमें कुछ भी संदेह न करके यह मानना चाहिये कि ‘वे भगवान् हैं, सर्वसमर्थ हैं, सर्वथा स्वतन्त्र हैं, चाहे जैसे, चाहे जो, चाहे जब कर सकते हैं, उनके लिये सभी कुछ ठीक है।’ पर हमें अनुकरण उन्हीं बातोंका करना चाहिये, जिनके लिये उनका तथा उनकी ही वाणीरूप शास्त्रोंका आदेश हो। और सच बात तो यह है कि भगवान्की सारी लीलाओंका अनुकरण किया भी नहीं जा सकता।
भगवान्की लीलाएँ प्रधानतया तीन प्रकारकी होती हैं—
१. लोकसंग्रह या लोकशिक्षाके लिये की जानेवाली आदर्शलीला।
२. अद्भुत, असम्भव जान पड़नेवाली ऐश्वर्यमयी लीला।
३. अन्तरंग प्रेमी भक्तोंके साथ की जानेवाली प्रेममयी लीला।
(१) माता-पिताकी भक्ति, गुरुकी भक्ति, ब्राह्मणभक्ति, सदाचार, देवपूजन, दीनरक्षण, इन्द्रियनिग्रह, ध्यान-पूजन, सत्यव्यवहार, निष्कामभाव, अनासक्ति, समत्व, नित्य आनन्दमें स्थिति आदि अनुकरण करनेयोग्य आदर्श लीलाएँ हैं। इनका अनुकरण अपने-अपने अधिकार एवं योग्यताके अनुसार किया जा सकता है और करना ही चाहिये। भगवान्का आदेश भी है यों करनेके लिये।
(२) अग्नि पीना, वरुणलोकमें जाना, अँगुलीपर सात दिनोंतक पर्वत उठाये रखना, कई प्रकारसे अपने विराट्रूपके दर्शन कराना, अघासुर, शिशुपाल आदिके मरनेपर उनकी आत्मज्योतिको अपनेमें विलीन कर लेना, हजारों-लाखों मनुष्योंके साथ विभिन्न भावोंसे एक ही साथ मिलना, हजारों रानियोंके महलोंमें एक साथ रहना, दो जगह एक ही साथ एक ही समय आतिथ्य स्वीकार करना, सूर्यको ढक देना, असंख्य गोवत्स, गोपबालक तथा उनकी प्रत्येक वस्तुके रूपमें स्वयं बन जाना, ब्रह्माजीको सबमें भगवत्स्वरूपके तथा महान् ऐश्वर्यके दर्शन कराना, अक्रूरको जलमें अपने दर्शन कराना, मारकर असुरोंका उद्धार करना आदि उनकी ऐश्वर्यमयी लीलाएँ हैं। इनका अनुकरण साधारण मनुष्यके द्वारा सर्वथा असम्भव है।
(३) गोपियोंके घरोंसे माखन चुराकर खाना, चीरहरण, रासलीला और निकुंजलीला आदि अन्तरंग मधुर प्रेमलीलाएँ हैं, जो भगवान् अपने आत्मस्वरूप पार्षदों तथा प्रेमियोंके साथ अनर्गल—अमर्याद-रूपमें श्रुति-सेतुका भंग करके अपने-आपमें ही किया करते हैं—
रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभि-
र्यथार्भक: स्वप्रतिबिम्बविभ्रम:।
(श्रीमद्भागवत १०। ३३। १७)
‘रमानाथ भगवान्ने व्रजसुन्दरियोंके साथ वैसे ही खेल किये, जैसे बालक अपनी छायाके साथ करता है।’
इन मधुर लीलाओंका अनुकरण कदापि नहीं करना चाहिये। जो मूढ़ इनका अनुकरण करने जाता है, वह शास्त्र और धर्मसे पतित होकर घोर नरकका अधिकारी होता है।
वस्तुत: इन तीनों प्रकारकी लीलाओंमें केवल प्रथम प्रकारकी लीला ही अनुकरणके योग्य होती है। शेष दोनों प्रकारकी लीलाएँ तो श्रवण, कीर्तन, मनन और ध्यानके द्वारा भगवान्के प्रति भक्ति तथा प्रेम प्राप्त करनेके लिये हैं। शुद्ध मनसे श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवान्की ऐश्वर्य और माधुर्यसे भरी लीलाओंका चिन्तन करना चाहिये और आदर्श लोकशिक्षामयी लीलाओंको अपने जीवनमें उतारना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।