भगवान‍्की शक्ति ही प्रकृति है

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। उत्तर विलम्बसे जा रहा है, क्षमा कीजियेगा। आपके प्रश्नोंके उत्तर नीचे लिखे जाते हैं—

(१) भगवान‍्का सगुण स्वरूप सविशेष यानी नित्य शक्तियुक्त ही है। हम चाहे भगवान् लक्ष्मी-नारायण, गौरी-शंकर, सीता-राम, राधा-कृष्णके युगल विग्रहका पूजन करें या केवल भगवान् नारायण, शंकर, राम या श्रीकृष्णका। जहाँ भगवान् सगुण-साकार हैं, वहीं उनकी शक्ति भी साथ हैं और उन्हींको लेकर भगवान‍्की सारी लीलाएँ होती हैं। ‘गौरतेजके बिना केवल श्यामतेजकी समाराधनासे पाप लगता है’—तन्त्रकी यह बात ठीक ही है; क्योंकि बिना शक्तिके शक्तिमान‍्का आराधन हो ही नहीं सकता। उसका अस्तित्व ही शक्तिपर निर्भर है। शक्ति है तो शक्तिमान् है और शक्तिमान् है तो शक्ति है। एकके बिना दूसरेका अभाव है तथा शक्ति और शक्तिमान् उसी प्रकार अभिन्न हैं, जैसे अग्नि और उसकी दाहिका-शक्ति तथा सूर्य और उसकी प्रकाश-शक्ति।

(२) भगवान‍्की शक्तिका नाम ही ‘प्रकृति’ या ‘योगमाया’ है। इनके कई स्वरूप और स्तर हैं। परमोज्ज्वल भगवत्स्वरूप भी प्रकृति है। जगत‍्को सृजन करनेवाली तथा पालन और संहार करनेवाली भी प्रकृति है, जगत‍्के समस्त जीवोंको मोहित करनेवाली भी प्रकृति है और मोहसे मुक्त करके भगवान‍्तक पहुँचानेवाली भी प्रकृति है। भगवान‍्की एक ही प्रकृति या शक्तिके ये विभिन्न लीलास्वरूप हैं। योगमाया, स्वमाया, माया, मलिना माया आदि भी इस शक्तिके ही विभिन्न लीलानुरूप नामान्तर हैं।

(३) जहाँ भगवान‍्की शक्तिका कार्य नहीं होता, वहाँ भगवान‍्का निर्गुण स्वरूप है और जहाँ शक्ति लीलायमान है, वहाँ भगवान् सगुण हैं। निर्गुण-सगुण, निराकार-साकार एक ही भगवान‍्के विभिन्न स्वरूप हैं। सभी पूर्ण हैं। सब अलग-अलग भी पूर्ण हैं, सब एक साथ भी पूर्ण हैं।

(४) भगवान् विष्णु, शिव, नारायण, दुर्गा, राम, श्रीकृष्ण—सब एक ही भगवान‍्के विभिन्न लीलास्वरूप और लीला-नाम हैं। इनमेंसे एकको जो भजता है, वह सभीको भजता है। इनमें ऊँच-नीचकी भावना करना पाप है।

(५) वैकुण्ठ, स्वर्ग, नरक आदि निश्चित लोक हैं। वैकुण्ठ भगवान‍्का दिव्यलोक है और नित्य है। वहाँ गया हुआ जीव लौटता नहीं। स्वर्ग-नरकादि अनित्य हैं। कर्मानुसार जीव इन लोकोंमें जाते हैं। वहाँ वे उतने ही समयतक रहते हैं, जितने समयके लिये वहाँके योग्य पुण्य या पापका भोग होता है। भोग समाप्त होनेपर अवशेष कर्मभोगके लिये कर्मानुसार स्थूल योनि मिलती है। पुण्यात्माको पवित्र योनि और पापात्माको नीच योनिकी प्राप्ति होती है।

(६) भगवान‍्के दर्शन अवश्य हो सकते हैं। दर्शनका प्रधान उपाय है—अटल विश्वासयुक्त दर्शनकी उत्कट लालसा। भक्त जिस रूपमें भगवान‍्के दर्शन चाहता है, उसी रूपमें प्रभु उसे दर्शन देकर कृतार्थ करते हैं। शेष भगवत्कृपा।