भगवान‍्की शरणसे ही विघ्ननाश

सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके पतिदेवकी मृत्युके बाद आपकी मुसीबतें और परीशानियाँ बढ़ती जा रही हैं, आपके घरवालोंके विरोधी विचार बढ़ते चले जा रहे हैं और आपको धर्मभ्रष्ट करनेका घृणित यत्न भी देवरके द्वारा हो रहा है—यह बड़े ही दु:खकी बात है। आजकल यह पाप समाजमें चारों ओर बढ़ रहा है। इसका बड़ा भारी बुरा परिणाम होगा। जो लोग किसी विधवा बहनको ‘मूर्खतावश’ दु:ख देते हैं, वे भी नरकोंमें जाकर भयानक यन्त्रणा भोगते हैं और बुरी-से-बुरी पापयोनियोंमें जन्म लेकर दु:ख भोगनेको बाध्य होते हैं; फिर जो लोग ‘स्वार्थवश’ या ‘नीच विचार’ से किसी विधवाको सताते हैं, उसकी तो कैसी दुर्गति होगी, इसे भगवान् ही जानते हैं। एक तो बेचारीको पतिवियोगका महान् दु:ख और ऊपरसे सहानुभूतिके बदले घरवालोंका तथा आत्मीयोंका घृणित बर्ताव! घावपर घाव करनेवाले ऐसे लोग तो राक्षस हैं। आज हमारा समाज ऐसे राक्षसोंका क्रीडाक्षेत्र बन गया है। इन लोगोंको तो नियन्ताके दण्डका शिकार होना ही पड़ेगा। पर आप घबराइये नहीं। सर्वशक्तिमान् भगवान् पर विश्वास करके उनके शरण हो जाइये। वे सदा सब जगह मौजूद रहते हैं और जो सचाईके साथ उनके शरण हो जाता है, वे आश्चर्यजनकरूपसे उसकी तथा उसके धर्मकी निश्चय ही रक्षा करते हैं। आपने देवरको कई बार क्षमा किया, परंतु एक दिन उसे पीट दिया—यह बहुत अच्छा किया। ऐसे दुष्टों और पतितोंकी पता नहीं, कैसी नीच गति होगी। आप भगवान‍्के शरणापन्न होकर उनका भजन करती रहें। द्रौपदीका चीर बढ़ानेवाले भगवान् आपकी अवश्य रक्षा करेंगे। भगवान‍्ने अर्जुनसे कहा है—

‘मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।’

(गीता १८। ५८)

‘तुम मुझमें चित्त लगाओ, फिर मेरी कृपासे सारे संकटोंसे सहज ही पार हो जाओगे।’

आपके पतिदेवका अन्तिम आदेश तथा स्वप्नादेश बहुत ही उत्तम है। आप उसीके अनुसार मुसीबतें उठाकर भी धर्मका पालन और बच्चोंका पालन-पोषण करती रहें। समझदारीसे काम निकालें। अपना अपराध करनेवालोंको क्षमा करें और अपनेपर संयम रखें। सचमुच यदि आप अपनेपर संयम रखती हुई भगवान् पर विश्वास रखेंगी तो भगवान‍्की दयासे कोई भी संकट आपको गिरा नहीं सकेगा। भगवान् आपके धर्मकी रक्षा करेंगे। अपराधीको मनसे क्षमा करें; परंतु सावधान रहें और कभी भी किसीका अनुचित प्रयत्न सहन न करें, डाँट दें।