भगवत्प्रेम और अनुकूलताकी खोज

सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आप अपनेको भगवान‍्का प्रेमी भी मानते हैं और सांसारिक सुविधाओं तथा अनुकूलताओंके लिये इतने अधिक चिन्तित भी हैं, यह आश्चर्यकी बात है। संसारके दु:खोंको तो वह बुद्धिमान् मनुष्य भी धीरजके साथ सह लेता है, जो उन्हें अपने ही किये हुए कर्मोंका अनिवार्य फल मानता है। वह भी समझता है कि प्रारब्धके अनुसार जो फलभोग प्राप्त होता है, उससे कर्मका ऋण ही उतरता है; उसमें चिन्ताकी कोई बात नहीं है। उससे आगे बढ़ा हुआ वह भगवान‍्का विश्वासी पुरुष है, जो प्रत्येक फलको भगवान‍्के मंगलमय विधानके द्वारा निर्मित मानता है और विपरीत प्रतीत होनेपर भी विश्वासके बलपर उसका मंगलमय परिणाम मानकर प्रसन्न होता है। उससे भी आगे बढ़ा हुआ वह प्रेमी है, जो किसी घटनाको प्रतिकूल तो समझता है, पर यह मानकर प्रसन्न होता है कि ‘इससे मुझे तो दु:ख होगा, पर मेरे प्रियतम भगवान‍्को सुख होगा। ऐसी बात न होती तो भगवान् इस प्रकार करते ही क्यों? भगवान् जिस बातमें सुख समझें, वही मेरे लिये सुख है; इसलिये मैं सुखी हूँ।’ इससे भी आगे बढ़ा हुआ वह सच्चा प्रेमी है, जिसको दु:ख तो होता ही नहीं, वरं जो प्रत्येक फलमें भगवान‍्का स्पर्श पाकर सुखी ही होता रहता है। प्रियतम भगवान् जो कुछ करते हैं, उसमें उसे प्रतिकूलताकी कल्पना ही नहीं होती। वह पद-पदपर सुखका ही अनुभव करता है। भगवान् जो कुछ करते हैं, उसकी अवहेलना करके किसी भी सांसारिक सुविधा और अनुकूलताकी ओर उसका मन कभी जाता ही नहीं। ऐसा प्रेमी कभी दु:खका अनुभव नहीं करता। आप अपने लिये कहते हैं कि ‘मैं भगवान‍्के प्रेमके अतिरिक्त और कुछ भी न जानता हूँ और न चाहता हूँ।’ फिर तो सांसारिक सुविधा और अनुकूलताको जाननेका भी प्रश्न आपके लिये नहीं उठना चाहिये।

अतएव मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप प्रेमके स्वरूपको समझिये और सदा आनन्दमग्न रहिये। जहाँ प्रेम होगा, वहाँ आनन्द ही रहेगा। जितनी-जितनी प्रेमकी कमी होगी, प्रेमके स्थानपर कोई अन्य वस्तु होगी, उतना ही आनन्दका अभाव होगा—यह सिद्धान्त है। शेष भगवत्कृपा।