भूल करनेवाले दयाके पात्र हैं
सम्मान्या बहन! सादर हरिस्मरण। आपने अपने पत्रमें जो कुछ लिखा है, वह अवश्य ही दु:खजनक है; परंतु आपने यदि क्रोधको आश्रय दिया और अपने भजन-पूजनके कारण ऐसी घटना हुई, यों माना तो इससे आपका कोई लाभ नहीं है। आपका मानसिक कष्ट तो स्वाभाविक है; परंतु आप प्रयत्न करके उसे दूर न कर सकें, ऐसी बात तो नहीं लगती। स्थिति चाहे न पलटे, परंतु आपका दु:ख तो दूर हो ही सकता है। आपके पति जो कुछ कर रहे हैं, वह बिलकुल अनुचित है। परंतु वे जब समझानेसे नहीं मानते, चिढ़ते हैं और समझानेपर आपको उलटा तंग करते हैं, तब फिर आप ऐसा अवसर ही क्यों आने देती हैं? आपको चुपचाप भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये। जिससे वे ही आपके पतिका सुधार करें। आप घर छोड़कर कहीं जायँ, यह तो और भी अनर्थकी बात है। आजकल समाजकी स्थिति बहुत ही शोचनीय है। अकेली स्त्रीका घरसे बाहर जाना किसी प्रकार भी निरापद नहीं है। मेरी सम्मतिमें तो आपको अपने पतिके सुधारके लिये भगवान्से आर्त-प्रार्थना करनी चाहिये। विरोध करना, लड़ना-झगड़ना छोड़कर सहज प्रेमका व्यवहार करना चाहिये। उस लड़कीको अपनी छोटी बहिन समझकर, उससे द्वेष न करके स्नेह करना चाहिये और उसके सुधारके लिये भी भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये। आपके हृदयमें जरा भी द्वेष न होकर यथार्थमें दयाका भाव और व्यवहारमें कठोरता न होकर स्नेह होगा तो उसपर भी प्रभाव पड़ेगा ही। वास्तवमें भूल करनेवाले दयाके पात्र हैं, घृणा और द्वेषके नहीं।
आपके पतिने पहलेकी अपेक्षा पाँच रुपये खर्च कम देना आरम्भ कर दिया है, इससे भी आपको दु:खी नहीं होना चाहिये। मान लीजिये—उनकी कमाई इससे भी कम होती तो आप क्या करतीं? कितने गरीब आदमियोंका काम कितने कम पैसोंमें चलता है! वैसे ही, उन लोगोंकी ओर देखकर आपको अपना काम चलाना चाहिये। दु:ख तो असंतोषसे होता है। संतोष आया कि दु:ख गया। मनुष्य अपने-आप ही असंतोषकी आगमें जला करता है। वे झगड़ा करते हैं, पर आप झगड़ा न करें तो झगड़ा करनेके लिये कोई आपको बाध्य नहीं कर सकता। आप भगवान्का भजन करती हैं; फिर भगवान्के भजनका कोई बुरा परिणाम हो, यह तो आपको मानना ही नहीं चाहिये। बल्कि इसमें तो भगवान्की विशेष कृपा माननी चाहिये कि प्रभुने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी कि पति एवं घरमें आपकी आसक्ति ही न हो। आपको अब इन सब बातोंसे सर्वथा उदासीन होकर विशेषरूपसे भगवान्का भजन करना चाहिये। घर छोड़कर जानेपर भी अगर मन नहीं पलटा तो बाहर भी वही जलन रहेगी, जो अब है और यदि मन पलट गया तो फिर किसी भी जगह भगवान्के दर्शन हो सकते हैं। अत: आप निश्चिन्त मनसे भगवान्का भजन करें। उसीमें आपका और उनका—दोनोंका लाभ है। शेष भगवत्कृपा।