चिन्ता छोड़कर भगवान‍्का चिन्तन करें

प्रिय बहन! सस्नेह हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। बचपनमें—सर्वथा अज्ञानावस्थामें पड़ोसीकी पाप-भावनाका आप शिकार हो गयीं। इस बातका अब आपको अत्यन्त मानसिक संताप है, यह आपका अच्छापन है। यह संताप तो होना ही चाहिये; पर अब उस बातको लेकर पश्चात्ताप करनेसे कोई लाभ नहीं है और न उस बातको किसीके सामने प्रकट ही करना चाहिये। प्रकट करनेमें तो हानि-ही-हानि है। प्रकट करना चाहिये एकमात्र दयामय परमात्माके सामने, जो सबकी भूत-भविष्यकी सारी बातोंको जानता है और जो अपनी सहज दयासे सबको क्षमा करता है।

आपका शरीर स्वस्थ है, तब आप रोगका वहम क्यों करती हैं? मनमें नीरोगताकी भावना दृढ़ कीजिये। आपको चार सालमें कोई संतान नहीं हुई है, इसमें निराशाकी कौन-सी बात है। आठ-दस वर्षोंके बाद संतान होती देखी जाती है। संतान न होनेसे घरवालोंका मन अवश्य खिन्न होता है पर इसमें आपका क्या दोष है। किसी-किसीके तो संतान जीवनभर नहीं होती। फिर आपकी तो अभी उम्र ही क्या है। आप घबराइये नहीं, भगवान‍्का चिन्तन कीजिये और अपने मनकी बात अपनी भाषामें प्रार्थनाके रूपमें दयामय भगवान‍्के सामने रखिये। आपका विश्वास दृढ़ होगा, श्रद्धा सच्ची होगी तो आपकी प्रार्थना भगवान् शीघ्र सफल न कर देंगे, यह कौन कह सकता है?

चिन्ता छोड़कर भगवान‍्का चिन्तन कीजिये और अपने विनय, सद्‍व्यवहार, सेवा, तप, प्रसन्नता, हँसमुखपन तथा चरित्रकी परम पवित्रतासे पतिको तथा घरके लोगोंको प्रसन्न रखिये। शेष भगवत्कृपा।