चोरी-डकैतीसे प्राप्त धनकी पूजा चोरी-डकैतीकी ही पूजा है
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण।
आपका कृपापत्र मिला। धन्यवाद! आपके प्रश्नोंका उत्तर निम्नलिखित है—
समाजमें अनाचार, चोरी, छल, विश्वासघात आदि बढ़नेका प्रधान कारण है—विषयसुखमें विश्वास तथा अनाचार, चोरी, छल एवं विश्वासघातसे रुपये पैदा करनेवालोंका समाजमें सम्मान-सत्कार और प्रतिष्ठा। चोरी-डकैतीसे प्राप्त धनकी और ऐसे धनिकोंकी पूजा वस्तुत: चोरी-डकैतीकी ही पूजा है। समाजके लोग अच्छी तरह जानते हैं, अमुक व्यक्ति इस-इस प्रकारसे पाप करके पैसे कमाता है, फिर भी धनवान् बन जानेपर समाजमें सर्वत्र उसकी पूछ-प्रतिष्ठा, सम्मान-सत्कार होता है—यहाँतक कि बड़े-बड़े विद्वान्, नेता, उच्च अधिकारी, धार्मिक पुरुष, साधु-महात्मा—सभी बड़ी-बड़ी सभाओंमें उसका सम्मान करते हैं। तब सभीकी इच्छा होती है कि हम भी ऐसे ही पैसे कमाकर इस प्रतिष्ठाको प्राप्त करें। सबके मनसे पापकी भावना मिट जाती है। रह जाती है—केवल किसी प्रकार भी (अन्याय, असत्य, परस्वापहरण, चोरी, घूस, हिंसा आदि उपायोंसे) पैसा पैदा करनेकी अदम्य लालसा। इसी कारण इतने पाप होते हैं। खाने-पीनेके पदार्थोंमें तथा दवाओंमें भी नकली चीजें मिलायी जाती हैं, नकलीको असली बनाकर बेचा जाता है, फिर उनका सेवन करनेवाले भले ही बीमार हो जायँ या तुरंत ही मर जायँ। यह राक्षसीपन इसीलिये आ गया है कि अशुद्ध धनकी समाजमें प्रतिष्ठा हो रही है। उसके लिये कोई भी नैतिक या सामाजिक दण्ड नहीं है। समाजका सबसे बड़ा दण्ड होता है—‘किसीसे घृणा करना।’ अब घृणा कौन करे—घृणा मनसे होती है; पर जब सभी लोग यही करते हैं और करना चाहते हैं, तब अन्यायसे पैसा कमानेवालेके प्रति किसके मनमें कैसे घृणा होगी।
(२) पापकर्म बनना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। मनुष्य दुर्बल प्राणी है। मन, इन्द्रियाँ उसके वशमें नहीं हैं, वह परिस्थितिसे बाध्य है। इससे अनिच्छा होनेपर भी परिस्थिति, अभ्यास या आसक्तिके कारण पाप बन जाता है। यहाँ देखना तो यह है कि पापसे उसका मन घबराता है, घृणा करता है, पाप उसके हृदयमें शूल-सा चुभता है एवं उसे पश्चात्ताप होता है अथवा वह उत्साहसे रुचिपूर्वक पाप करता है, पाप उसे प्रिय प्रतीत होता है एवं पाप करके वह गर्व-गौरवका अनुभव करता है। यदि पापमें घृणा है और पाप करनेके बाद हृदय जलता है तो उसके लिये उपाय है—सीधा उपाय है। वह उपाय है—दयासागर भगवान्की दयापर विश्वास करके उन्हें पुकारना, प्रार्थना करना। यह कहना कि ‘भगवन्! मेरा मन वशमें नहीं है, इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, मेरे हृदयमें विषय-वासना भरी है, इच्छा न होनेपर भी अवसर आनेपर मैं अपनेको सँभाल नहीं पाता, पापमें प्रवृत्त हो जाता हूँ और उस समय मुझे उसमें सुख मिलता है। परंतु नाथ! आप अन्तर्यामी हैं, सब जानते हैं—पीछे मैं जला करता हूँ। अभी भी मेरा हृदय पापके पश्चात्तापसे जल रहा है। आप शक्ति दीजिये। दया करके मुझे पापसे बचाइये, मेरी रक्षा कीजिये। पापका अवसर आनेपर मैं पापपर प्रहार करके उसपर विजय पा सकूँ—ऐसी ही व्यवस्था कर दीजिये। मैं केवल आपके भरोसे हूँ। मुझ-सरीखे बार-बार पाप-पंकमें फँसनेवालेपर, आपके सिवा दूसरा कौन है, जो सौहार्द रखे, जो दया करे। एकमात्र आप ही ऐसे हैं, जिनका दिव्य द्वार मुझ-सरीखे पापी-तापीके लिये भी सदा खुला है, जिनकी गोद मुझ-सरीखे मलायतन नीचको भी स्थान देनेके लिये सदा तैयार है। मैं कहाँ जाऊँ, मेरी सुननेवाला आपके सिवा और कौन है।’ इस प्रकारके निश्चयसे कातरताके साथ ऐसी प्रार्थना करनेपर तुरंत सुनवाई होती है। भगवान् पापोंको नहीं देखते, वे देखते हैं हृदयके वर्तमान यथार्थ भावको। और जब सच्चा विश्वास देख पाते हैं, तब तुरंत उसे अपनाकर उसके पाप-तापोंका नाशकर उसे अपना भक्त बना लेते हैं और उसके लिये सनातनी शान्तिका मंगल-विधान करके उसके भक्त होने तथा कभी पतन न होनेकी घोषणा कर देते हैं। देखिये गीताके नवम अध्यायके तीसवें-इकतीसवें दो श्लोकोंको—
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति॥
‘यदि अत्यन्त दुराचारी मनुष्य भी अनन्यभावसे मेरा आश्रय ग्रहण करके मुझको भजता है तो वह साधु ही माननेयोग्य है; क्योंकि उसका निश्चय यथार्थ है। वह तुरंत ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परमा शान्तिको प्राप्त होता है। अर्जुन! तुम सत्य जानो—मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।’
अतएव घबराने तथा निराश होनेकी आवश्यकता नहीं है, सच्चे भावसे भगवान्को पुकारिये। पापोंका नाश हो जायगा, आप भक्त बन जायँगे। परंतु इसलिये प्रार्थना मत कीजिये कि इससे आपको पाप करनेमें सुविधा हो जाय। ‘नित्य पाप करते जाओ और प्रार्थनासे उसे धोते जाओ’—यह धोखा है। जो प्रार्थनाके बलपर पाप करना चाहता है, उसके पाप वज्रलेप हो जाते हैं। शेष भगवत्कृपा।