धनका दुरुपयोग

प्रिय महोदय! आपका पत्र मिला। धन्यवाद। जहाँतक मेरा अनुमान है, इस समय अधिकांश धनियोंके धनका सदुपयोग नहीं हो रहा है। इसका एक कारण यह भी है कि इस समयका धन ही प्राय: ‘अधर्मोपार्जित’ है। अधर्मसे कमाये हुए धनका यथार्थ धर्मकार्यमें सद्‍व्यय होना बहुत कठिन है। तथापि यदि सत्परामर्श मिल जाय और उसके अनुसार कार्य हो तो धनके उपयोगमें बहुत कुछ सुधार हो सकता है और धनके दुरुपयोगद्वारा जो एक-से-एक प्रश्रय पाकर पापवृक्षकी शाखाएँ बढ़ रही हैं, वे बहुत अंशोंमें रुक सकती हैं तथा सदुपयोग होनेसे अन्त:करणकी शुद्धिमें भी सहायता मिल सकती है। आपका लिखना उचित है और मेरी समझसे दुरुपयोगके इस समय प्रधानतया निम्नलिखित मार्ग हैं—

(१) खर्चीला विलासितामय जीवन, जीवनमें अनावश्यक आवश्यकताओंका बढ़ा लेना, मौज-शौककी इच्छा, बाहरी दिखावेका प्रसार, इन सब कार्योंके लिये वस्तुओंका अमर्यादसंग्रह-परिग्रह, खान-पानका असंयम, परिश्रमशीलताका अभाव और हाथसे काम न करनेकी प्रवृत्ति तथा उसमें असभ्यता एवं लज्जाका बोध आदि-आदि।

(२) विवाहादि अवसरोंपर अनेक प्रकारसे व्यर्थ आडम्बरमें खर्च।

(३) सिनेमा तथा रेडियोका बेहद प्रचार। इसमें धनका नाश तो है ही, चरित्रका भी महान् नाश हो रहा है।

(४) नास्तिकताको बढ़ानेवाली, अधार्मिक, घोर अनैतिक और युवक-युवतियोंको साथ रखकर उनका नैतिक पतन करानेवाली तथा केवल अर्थपरक शिक्षा और सभ्यताके प्रचारमें सहायता करना।

(५) चोरी छिपाने या अधिक-से-अधिक नाजायज तरीकेसे धन प्राप्त करनेकी इच्छासे घूस देना-लेना। इससे धनके दुरुपयोगके साथ ही समाजका भयानक नैतिक पतन हो रहा है।

(६) नीच स्वार्थ, मानसिक दुर्बलता या अन्य किन्हीं कारणोंसे सरकार तथा सरकारी अधिकारियोंकी प्रसन्नता प्राप्त करनेके लिये उन लोगोंके मतानुसार धनका अयुक्त उपयोग।

(७) किसी भी कारणसे ऐसे कार्योंको करना, जिनमें जीवहिंसा होती हो, मांस-मद्यका प्रचार-प्रसार होता हो, अनैतिकता बढ़ती हो और नास्तिकता फैलती हो; फिल्म तैयार करानेका कार्य, सिनेमा-प्रदर्शनालयोंका निर्माण, मांस-मद्यका या जिनमें मांस-मद्यका प्रयोग होता हो—ऐसी वस्तुओंका व्यापार, नास्तिकता और अधर्म बढ़ानेवाले साहित्यका प्रकाशन या ऐसे प्रकाशनमें सहायता करना, परस्पर द्वेष बढ़ानेवाली पार्टियोंकी सहायता करना, ऐसे कामोंसे धन कमाना और धन कमानेके लिये पूँजी लगाना, ऐसे काम स्वयं करना, दूसरेको सहायता या प्रोत्साहन देना—इन सभी कार्योंमें होनेवाला व्यय धनका दुरुपयोग है।

(८) प्रति पाँच वर्षोंपर होनेवाला चुनाव भी, जिसमें करोड़ों रुपये व्यय होते हैं, इस ‘जनतन्त्रात्मक’ कहलानेवाली प्रणालीका ही पाप है। इसमें अवांछित लोगोंकी—जो धर्मके विरोधी हैं, असदाचारी हैं, नैतिक दृष्टिसे गिरे हुए हैं, भगवान‍्को नहीं मानते, दुर्बलहृदय हैं, अत्यन्त निर्दय हैं, शासकपदके अनधिकारी हैं, मूर्ख हैं, विपरीत प्रयत्न करके या चुप रहकर जो गोवधका पाप बंद करानेमें असमर्थ हैं, शास्त्र और धर्मपर आक्रमण करनेवाले कानूनोंके प्रवर्तक, सहायक या मूक समर्थक हैं, जाति और धर्मके नामपर परस्पर द्वेष फैलानेवाले हैं, अपने विशुद्ध धर्मपर दृढ़तापूर्वक कायम रहनेकी शक्तिसे रहित हैं और मानव-धर्मको नहीं मानते—धनसे सहायता करना भी धनका महान् दुरुपयोग है।

इन सब बातोंपर खयाल करके यदि धनवान् लोग धन कमानेमें पाप करना छोड़कर अनुचित स्वार्थ, विलासिता, शौकीनी, आडम्बरपूर्ण जीवन, आरामतलबी, परिश्रममें लज्जा और मानसिक दुर्बलता आदि दोषोंका त्याग करके, गरीबोंकी श्रेणीसे भिन्न अपनेको दूसरी श्रेणी या दूसरी जातिका आदमी न समझकर, शास्त्रानुमोदितरूपसे विनयपूर्वक यज्ञकी भावनासे धनका सदुपयोग करने लगें तो उनका जीवन सुखमय हो जाय और परलोक उज्ज्वल हो जाय, समाजके सामने उच्च आदर्शकी स्थापना हो, मानव-जीवन सफलताकी ओर आगे बढ़ने लगे तथा यहाँ जो आज ‘कम्यूनिज्म’ का एक भयानक आतंक फैला हुआ है, वह सहजमें दूर हो जाय।

आजकल संत श्रीविनोबाजी भावे भूमिके मालिकोंसे सात्त्विकताके साथ भूमि लेकर, जिनके पास भूमि नहीं है, उनको यथायोग्यवितरण करनेका जो महान् ‘भूमिदान-यज्ञ’ कर रहे हैं, वह बहुत ही उत्तम कार्य तो है ही, साथ ही ‘कम्यूनिज्म’ के पापकी जड़ भी काटनेवाला है। सारा धन भगवान‍्का है, भगवान‍्के सब हैं, सबके भगवान् हैं, अतएव अपने धनमेंसे सबको यथायोग्य हिस्सा बाँटकर बचे हुएका अपने लिये उपयोग करना यज्ञशिष्ट अमृतका सेवन करना है। पर जो केवल अपने लिये ही कमाता-खाता है, वह तो दूसरोंका हक मारकर मौज करना चाहता है, वह तो पाप ही कमाता और पाप ही खाता है। उसका जीवन पाप-जीवन है, और पाप-जीवनको पापका फल ताप निश्चय मिलेगा ही। श्रीभगवान‍्ने कहा है—

यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।

भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥

(गीता ३। १३)

‘यज्ञसे (सबको उनका यथायोग्य हिस्सा सात्त्विकताके साथ देकर) बचे हुए अन्नको खानेवाले श्रेष्ठ पुरुष सारे पापोंसे छूट जाते हैं; और जो पापी लोग केवल अपने लिये ही पकाते—(कमाते) हैं, वे तो पाप ही खाते हैं।’ शेष भगवत्कृपा।