धनकी सार्थकता

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। उसे पढ़नेपर खेद हुआ। आपके पास धन है, भगवान‍्ने आपको दिया है; फिर आप उसे अपने गरीब सगे भाई-बहनोंकी तथा माता-पिताकी सेवामें लगानेमें इतना क्यों हिचकते हैं? आप यह क्यों मानते हैं कि ‘मेरे धनपर इन लोगोंका क्या अधिकार है, मैं अपने बाल-बच्चोंके पालन-पोषणमें ही इसको क्यों न लगाऊँ। इन लोगोंको देकर क्यों धनको बर्बाद करूँ।’ मुझे तो आपकी इस बुद्धिपर तरस आता है। सच्ची बात तो यह है कि भगवान‍्ने आपको जो विशेष धन, विशेष शक्ति या विशेष साधन दिये हैं, वे केवल दूसरोंकी सेवाके लिये ही दिये हैं। अपने प्राप्त साधनोंसे जो दूसरोंकी सेवा न करके, उन्हें सुख-सुविधा न देकर केवल अपने या अपने कुटुम्बके लिये ही उनका उपयोग करता है, वह तो ईश्वरको धोखा देता है। आपके धनपर प्राणिमात्रका अधिकार है। सबको उनका प्राप्य हिस्सा देकर जो बचा हुआ खाता है, वह अमृत खाता है। पर जो केवल अपने लिये ही कमाता-खाता है, वह तो पाप खाता है। उसका जीवन ही पापमय है। भगवान् गीतामें कहते हैं—

यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह य:।

अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥

(३।१३,१६)

‘यज्ञसे बचे हुए अन्नको खानेवाले श्रेष्ठ पुरुष समस्त पापोंसे छूट जाते हैं; पर जो पापात्मालोग अपने लिये ही पकाते (कमाते-खाते) हैं, वे तो पाप ही खाते हैं।’ ‘जो पुरुष इस प्रकार प्रवर्तित सृष्टिचक्रके अनुसार बर्ताव नहीं करता, वह इन्द्रियाराम पाप-जीवन मनुष्य तो व्यर्थ ही जीता है।’

इसलिये उचित तो यह है कि आप प्राणिमात्रकी सेवामें अपना धन लगायें और उसीमें अपना सौभाग्य समझें। फिर आपके जो भाई गरीब हैं, आपकी जिन बहनोंको कष्ट है, आपके जो वृद्ध माता-पिता हैं, उनकी सेवा करना तो आपका प्रधान धर्म है। आपने लिखा, माता-पिता आपकी अपेक्षा आपके अन्य भाइयोंसे अधिक स्नेह करते हैं, उनका पक्ष करते हैं और भाई-बहन भी आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते। यदि ऐसी बात है तो वे भूल करते हैं। उन्हें यह नहीं करना चाहिये। यदि वे मेरी बात मानें तो मैं उनसे प्रार्थना करूँगा कि आप उनके साथ चाहे जितना रूखा बर्ताव करें, आपको सम्पन्न और सुखी देखकर माता-पिताको सुखी होना चाहिये तथा आपके प्रति स्नेह करना चाहिये और भाई-बहनोंको भी—अपने दु:खोंको अपने कियेका फल मानकर आपको न कोसना चाहिये न आपके साथ बुरा बर्ताव ही करना चाहिये। बल्कि यह समझकर कि हम चाहे दु:खी हैं, हमारे बाल-बच्चे चाहे कष्ट पाते हैं, पर हमारा एक भाई और उसके बाल-बच्चे तो सुखी हैं, हमें उसके सुखसे सुखी होना चाहिये और आपके साथ उन्हें उत्तम-से-उत्तम प्रेमका व्यवहार करना चाहिये। परंतु जरा आप सोचिये, उनका ऐसा व्यवहार क्यों है और उसमें आप तथा आपका व्यवहार कहाँतक कारण है? पहले माता-पिताको लीजिये। आपके पास लाखों रुपये हैं, खेत हैं, सम्पत्ति है, मोटर है, घरके मकान हैं, आपके घरमें दसों नौकर हैं। आपके माता-पिता वृद्ध हैं और वे अपने दूसरे गरीब लड़कोंके साथ गरीबीसे रहते हैं। वे ही उनको खानेको देते हैं। आप न उनको खानेको देते हैं न कभी उनका आदर-सत्कार करते हैं, बल्कि अपने धनपर उनका जरा भी अधिकार नहीं मानते, उनकी सेवामें कुछ भी लगाना आप धनकी बर्बादी समझते हैं और यह बात आप उन्हें सुना भी देते हैं। इतना होनेपर भी वे बेचारे आपको शाप नहीं देते, केवल अपने दूसरे लड़कोंके पक्षमें कुछ कह देते हैं तो क्या यह उनका अपराध है? माँ-बापके लिये सभी बच्चे एक-से हैं; पर जो गरीब, दु:खी और संकटग्रस्त हैं, उनके प्रति उनकी अधिक सहानुभूति होना स्वाभाविक है। आप मौज-मजा करें, आपके बालक परम सुख-स्वच्छन्दतासे रहें और उनकी आँखोंके सामने उन्हींके दो लड़के, उनके बच्चे तथा पुत्रियाँ दाने-दानेको तरसें तथा आप उनको कुछ भी देनेकी बात तो अलग रही, मीठी वाणीसे बातचीत भी न करें; फिर आप कैसे आशा कर सकते हैं कि भाइयोंका, बहनोंका तथा माता-पिताका बर्ताव आपके साथ अच्छा हो। वे तो बेचारे दु:खी हैं। एक बात याद रखनी चाहिये। विपत्तिकालमें मनुष्य अपने आत्मीय स्वजनोंसे विशेष आशा रखता है। सम्पत्-कालमें उनसे कोई न बोले तो उन्हें दु:ख नहीं होता, पर विपत्तिकालमें यदि भूलसे भी स्वजन नहीं बोलता तो विपत्तिग्रस्त मनुष्यको ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी दुरवस्थाके कारण यह उपेक्षा की गयी है। इसीसे तुलसीदासजीने कहा है—‘बिपति काल कर सतगुन नेहा’—विपत्तिकालमें सौगुना प्रेम करना चाहिये। फिर आप तो अपने गरीब सगे भाई-बहनोंको जली-कटी भी सुनाते हैं! यह आपका परम दुर्भाग्य है। आपका काम था, अपना सर्वस्व देकर उनको सुखी करना। इससे आपको उनका ऐसा आशीर्वाद मिलता कि जिससे आपका भविष्य अत्यन्त उज्ज्वल और सुखमय हो जाता; परंतु आप जो कर रहे हैं, यह तो महापाप है और इसका परिणाम आपके लिये निश्चित ही बहुत दु:खदायी होगा। आपका यह धन फिर किस काम आयेगा? ऐसे धनको धिक्‍कार है! आप निश्चित समझिये, यदि आपने अपना व्यवहार नहीं बदला तो यह धन आपको भीषण नरकाग्निमें जलानेका कारण बनेगा।

महाभारतमें कहा गया है—

चत्वारि ते तात गृहे वसन्तु

श्रियाभिजुष्टस्य गृहस्थधर्मे।

वृद्धो ज्ञातिरवसन्न: कुलीन:

सखा दरिद्रो भगिनी चानपत्या॥

(उद्योगपर्व ३३।७०)

‘तात! गृहस्थधर्ममें स्थित एवं लक्ष्मीसे सेवित आपके घरमें इन चार प्रकारके मनुष्योंको सदा आदरपूर्वक रखना चाहिये—अपने कुटुम्बका वृद्ध पुरुष, संकटमें पड़ा हुआ उच्च कुलका मनुष्य, धनहीन मित्र और बिना संतानकी बहन।’

अतएव मेरा आपसे साग्रह निवेदन है कि आप अपने गंदे और तुच्छ विचारोंको बदलिये। इनकी सेवासे आपका धन बर्बाद नहीं होगा, बल्कि इसीसे उसकी सार्थकता होगी। अपनी पत्नीको भी समझाइये। खुले दिलसे सेवा करके पिता-माताका अमोघ आशीर्वाद और भाई-बहनोंकी सद्भावना प्राप्त कीजिये। उन्हें हर तरहसे सुखी करनेमें ही आपका कल्याण है। भगवान‍्की कृपासे आपके पास साधन हैं, इन साधनोंका सदुपयोग कीजिये।