धोखेसे बचिये

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आप साधुके वेषमें हैं, भगवान‍्की चर्चा करते हैं, इसलिये श्रद्धालु जनता आपमें श्रद्धा-भक्ति करे—उसके लिये तो यह उचित ही है। साधु-महात्माओंका सम्मान-सत्कार, उनकी सेवा-पूजा अत्यन्त लाभदायक हैं। परंतु आपको दूसरी दृष्टिसे विचार करना चाहिये। आपको जो सैकड़ों-हजारों नर-नारियोंके द्वारा मान-सम्मान, सेवा-पूजा, श्रद्धा-भक्ति प्राप्त हो रही है—आप वस्तुत: उसके अधिकारी हैं या नहीं? जिस महापुरुषत्व या महात्मापनकी भावनासे लोग आपका आदर कर रहे हैं, वह महापुरुषत्व या महात्मापन यथार्थमें आपको प्राप्त है या नहीं? कहीं आप उन सरलहृदय श्रद्धालु नर-नारियोंकी सरलता, साधुता और अकृत्रिम श्रद्धाका अनुचित लाभ तो नहीं उठा रहे हैं? किसीके भी द्वारा अपनी सेवा-पूजा, श्रद्धा-भक्ति करानेका अधिकार तो महापुरुषको भी नहीं समझना चाहिये। सेवा-पूजा, श्रद्धा-भक्ति, मान-सम्मान करनेकी चीज है, करानेकी नहीं। फिर, जो महात्माका बाना धारण करके अपनी पूजा कराता है, वह तो अपने पतनका पथ ही प्रशस्त करता है।

यदि मनुष्य ऐसी स्थितिमें गहराईसे विचार करे, अपने जीवनके अबतकके कर्मोंका स्मरण करके देखे तो अधिकांशमें यह पाया जाता है कि जिन श्रद्धाके धनी सरल-प्राण नर-नारियोंसे वह सेवा-पूजा करवाता है, जिनसे अपनी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होता है, वे नर-नारी उससे कहीं अच्छे हैं, उनके जीवनमें सचमुच उच्चता और यथार्थता है; वहाँ न कृत्रिमता है न अपनेको बड़ा बतानेकी दूषित वृत्ति।

अपने मनमें घुसकर देखना चाहिये कि धन-मान, सुख-आराम, भोग-विलास, यश-कीर्तिकी कितनी और कैसी प्रबल इच्छा मनमें है, इनके लिये कैसे मन ललचाता रहता है और इनके मिलनेपर कितना हर्ष और न मिलनेपर या नष्ट हो जानेपर कितना विषाद होता है। ऐसी स्थितिमें, दूसरे यदि कोई आपको निर्विकार, समदृष्टि, निष्काम महापुरुष बतलाते हैं और आप उनकी प्रशंसाको स्वीकार कर उसका किसी प्रकार भी अनुमोदन करते हैं, तो बताइये, यह उनको तथा अपनेको भी धोखा देना है या नहीं? इस धोखेसे बचिये।

आपके पत्रकी अन्यान्य बातोंसे मेरे मनपर कुछ ऐसी ही छाप पड़ी है। अतएव निवेदन यह है कि आप अपनेको देखिये, अच्छी तरहसे देखिये। यदि सचमुच आपके बाहरी (नकली) और भीतरी (असली) रूपमें अन्तर हो और आपने झूठ-मूठ ही नकली रूपको असली बताये जानेपर उसे स्वीकार कर लिया हो तो इस धोखेसे शीघ्र बचिये। अपने असली (भीतरी) रूपको ही अपना रूप मानकर उसके सुधारमें लग जाइये। लोगोंसे स्पष्ट कह दीजिये कि ‘मैं ऐसा हूँ।’ इसपर भी वे श्रद्धासे न मानें तो ऐसे जनसमूहको छोड़कर जहाँ आपको कोई न जानता हो, वहाँ चले जाइये और उपदेशादि देना छोड़कर नकली महात्मापनका चोगा उतार फेंकिये। महात्मापनका चोगा उतर जानेपर तो अभी आप जहाँ रहते हैं, वहाँ भी कुछ दिनोंमें मान-सम्मान घट जायगा। तथापि अलग जाकर अपने सुधारके कार्यमें शीघ्र लग जाना और भी उत्तम है। भगवान‍्का भजन कीजिये। आर्त होकर उनको पुकारिये। उनके सामने अपने जीवनको बिना किसी छिपाव-दुरावके खोलकर रख दीजिये और बिना किसी शर्तके उनके चरणोंपर अपनेको डाल दीजिये। वे परम दयालु आपको अपनाकर वास्तविक महात्मा बना लेंगे। शेष भगवत्कृपा।