दो प्रकारकी आत्महत्या
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद! आपके प्रश्नोंका उत्तर इस प्रकार है—
(१) ‘आत्महत्या’ दो प्रकारकी होती है—एक लौकिक, दूसरी पारमार्थिक। विष खाकर, आगमें जलकर, पानीमें डूबकर या किसी अस्त्र-शस्त्रका अपने ही ऊपर प्रहार करके जो अपने शरीर एवं जीवनको जान-बूझकर नष्ट कर दिया जाता है, उसका नाम लौकिक आत्महत्या है। इसका परिणाम लोक-परलोक दोनोंमें बड़ा भयंकर होता है। मनुष्य जिस क्षणिक दु:ख, शोक या मनस्तापसे मुक्त होनेके लिये आत्महत्या करता है, वह अनन्त गुना होकर अनन्त कालतक उसे परलोकमें कष्टदायक होता है। आत्महत्यासे केवल स्थूलशरीरका नाश होता है। सूक्ष्मशरीर तो रहता ही है; उसीके द्वारा जीव वास्तवमें सुख-दु:खका अनुभव करता है। और जो मानव-शरीर पाकर भी ज्ञान या भक्तिका साधन नहीं करता—अपनेको इस संसार-बन्धनसे मुक्त करनेके लिये बताये हुए शास्त्रीय प्रयत्नोंकी ओरसे जीवनभर उदासीन रहता है, वह भी आत्महत्या ही करता है। यह पारमार्थिक आत्महत्या है। लौकिक आत्महत्यासे केवल स्थूलशरीरका अन्त होता है; परंतु दूसरे प्रकारकी जो आत्महत्या है, वह जीवको अनन्त कालतक जन्म-मृत्यु एवं नरकयन्त्रणाके चक्करमें डाले रखती है।
(२) ऊपर जिसे लौकिक आत्महत्या कहा गया है, उसमें और शरीरहत्यामें कोई अन्तर नहीं है।
(३) किसीके अस्तित्वको रखना या न रखना यह ईश्वरके अधीन है। जिसने अस्तित्व दिया है, वही उस वस्तुके अस्तित्वको मिटा सकता है। स्पष्ट शब्दोंमें यों समझना चाहिये कि जो जन्म या जीवन दे सकता है, वही मारनेका भी अधिकार रखता है। जो किसीको जिला नहीं सकता, वह किसीको मारनेका भी अधिकारी नहीं है। हमारा शरीर हमारे कर्मानुसार भगवान्ने हमको दिया है, अत: वे ही जब चाहें, उसे वापस ले सकते हैं। यदि हम उसे भार मानकर अपनी ओरसे मिटानेका यत्न करते हैं तो पापके भागी होते हैं।
(४) देशभक्ति भी एक धर्म है। वह धर्मसे भिन्न नहीं है। अधर्मसे देशभक्ति नहीं हो सकती। देशभक्तिका साधन भी धर्म ही है। आजके जगत्में धर्मकी अपेक्षा देशभक्तिको महत्त्व दिया जाता है, यह नहीं मानना चाहिये। धर्म छोड़नेसे देशभक्तिका होना सम्भव नहीं है। जिसका नैतिक चरित्र गिरा हुआ है, वह सच्चा देशभक्त नहीं है; वह देशभक्तिका ढोंग करता है, वह अपनी आचारहीनताके द्वारा देशको रसातलकी ओर ले जानेवाला है। देशभक्तकी सच्ची कसौटी यह है कि उसका चरित्र बहुत ऊँचा हो। जो लोग देशभक्तिका ढोंग करनेवाले किसी दुराचारीको महत्त्व देते हैं, वे देशभक्तिके पवित्र आदर्शको जानते ही नहीं। शेष भगवत्कृपा।