दुष्कर्मसे दुर्गति

मान्या बहिन! सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके बहनोई ‘कल्याण’ के ग्राहक हैं, रामायण-भगवद‍्गीता पढ़ते हैं, घूसखोरीसे सदा दूर रहते हैं और अच्छे स्वभावके हैं; परंतु उनके चरित्रमें दोष है, दोष बतलानेपर वे उलटा डाँटते हैं तथा उसका औचित्य सिद्ध करते हैं। इससे आपकी बहिनको बहुत दु:ख है और वह कभी-कभी शरीर-त्यागतककी बात सोचती है। इसके उत्तरमें निवेदन यह है कि आप अपनी बहिनको समझा दें कि वे आत्महत्याकी बात कभी न सोचें। आत्महत्या महापाप है। इससे दु:खोंका नाश नहीं होता, वरं दु:ख और भी बढ़ जाते हैं। वे अपने पतिदेवकी बुद्धि सुधारनेके लिये भगवान‍्से कातर प्रार्थना करें। उनकी प्रार्थना जितनी ही विश्वासपूर्ण होगी, उतना ही उसका अच्छा फल देखनेमें आयेगा। मनुष्य जब कामादि विकारोंके वश हो जाता है, तब उसका ज्ञान ढक जाता है, बुद्धि विपरीत निर्णय देने लगती है। वह पापको पुण्य बताती है और पुण्यको पाप। यही हाल आपके बहनोईजीका है। वे यह जो कुछ कर रहे हैं, वह निस्संदेह प्रत्यक्ष पाप है। इसका परिणाम उनके लिये बहुत ही दु:खदायी हो सकता है। यदि वे मेरी बात मानें तो मैं उनसे यही कहूँगा कि वे शीघ्र-से-शीघ्र इस दुष्कर्मको छोड़ दें और अपनी साध्वी पत्नीको घोर मानसिक पीड़ासे बचा लें। इसीमें उनका कल्याण है। गीता-रामायणका उनको यही संदेश है और मैं भी उनसे बलपूर्वक यही अनुरोध करता हूँ। वे इस प्रकारका कुकार्य करके गीता-रामायणको भी कलंक लगा रहे हैं, जो वास्तवमें गीता-रामायणको नहीं लगकर उन्हींको लगेगा और उनकी महान् दुर्गतिका कारण होगा। जो भोली बहिन इनके जालमें फँसी है, उसको भी सावधान होना चाहिये। इस प्रकारका आचरण महान् पाप तो है ही, यह नारी-जातिके लिये बड़ा कलंक है। एक बहिन घरमें बैठी रोती-कलपती रहे और दूसरी वहीं उसके पतिको दुराचारका आश्रय देनेवाली बने! पुरुष-जाति तो गिर ही गयी है, पर भारतकी नारियोंका भी इस प्रकार पतन हो रहा है। बड़े ही दु:खकी बात है।