ईश्वरकी सत्यता
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। आप लिखते हैं—ईश्वर है, यह सिद्ध कीजिये?
उत्तरमें निवेदन है कि (१) ईश्वर नित्य स्वयंसिद्ध है; वह हमारे-आपके सिद्ध करनेसे सिद्ध होगा—ऐसी बात भी मनमें नहीं लानी चाहिये। आप हैं, मैं हूँ—क्या इस सत्य अनुभवको भी सिद्ध करनेकी आवश्यकता है? यदि हम और आप सत्य हैं तो हमलोग जिसके अंश हैं, वह अंशी परमात्मा असत्य या असिद्ध कैसे हो सकता है। जबतक जलकी एक बूँद भी सामने है, तबतक जलनिधिको असत्य कैसे कहा जा सकता है। अंशविभाग असत्य हो तो हो; पर अंशी असत्य नहीं हो सकता। समुद्रके जलकी बूँद क्षणिक है, वह वायुके साथ उठकर फिर समुद्रमें ही एकीभूत होती है; इसी प्रकार अनेक जीवविभागोंकी सत्ता व्यावहारिक सत्य है। इस अनेकताका लय एक परमात्मसत्तामें ही होता है, अत: अंशी परमात्मा ही नित्य सत्य है। घट सत्य है तो घटनिर्माता कुम्भकार असत्य कैसे होगा। जगत् जब प्रत्यक्ष है, तब इसके स्रष्टाका अभाव कैसे सम्भव है। कार्य हो और कारण न हो, यह कदापि सम्भव नहीं।
(२) ईश्वर आनन्दमय हैं। वे लीला-रस-विस्तारके लिये ही सृष्टि-रचना करते हैं; इस सृष्टिसे उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं है। अनादिकालसे विलग हुए जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही उनके द्वारा सृष्टिलीलाका सूत्रपात हुआ है।
(३) दु:ख पूर्वकृत पापका फल है। भजनका फल तो सुख है, प्रभुकी प्राप्ति है, वह आगे मिलेगा। एक आदमी किसीकी हत्या करके आया और रामनाम जपने लगा। एक मास बाद उसे फाँसीकी सजा हुई। यह सजा रामनामका फल नहीं, हत्याका दण्ड है। भजन और नाम-जपका परिणाम सदा मंगलमय है। शेष भगवत्कृपा।