एक ही परमेश्वरके अनेक स्वरूप हैं

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला, धन्यवाद। आपके प्रश्नोंका उत्तर इस प्रकार है—

(१) महादेवजी, पार्वतीजी अथवा गणेशजी अनादिसिद्ध देव हैं। एक ही परमेश्वर सृष्टि, पालन और संहारके लिये विभिन्न गुणोंको आश्रय देकर विभिन्न नाम तथा रूपोंसे प्रसिद्ध हो रहे हैं। सृष्टिके रचयिताको ब्रह्माजी, पालकको भगवान् विष्णु तथा संहारकर्ताको रुद्र या महादेव कहते हैं। जैसे परमेश्वर अनादि, अनन्त एवं सनातन हैं, वैसे ही ये महादेवजी आदि भी उनके शाश्वतरूप हैं। इनका न कभी जन्म होता है, न मृत्यु—ये सदा रहते हैं। उदाहरणके लिये अग्निके परमाणु सर्वत्र व्याप्त हैं, इस रूपमें अग्नि सदा मौजूद है, यह उसका अव्यक्त स्वरूप है। वही अग्नितत्त्व सूर्यके रूपमें हमें प्रत्यक्ष दीख पड़ता है तथा वही आगके रूपमें, दीपकके रूपमें घर-घरमें प्रज्वलित हो प्रकट दिखायी देता है। ग्रह, नक्षत्र, तारे आदि सभी वस्तुत: एक ही ज्योतिर्मय महातत्त्वके विभिन्न स्वरूप हैं। इसी प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा, सूर्य, काली, गणेश आदि एक ही परमात्माके तेजोमय स्वरूप हैं। जैसे आग बुझती है और जलती है, परंतु उसका अभाव नहीं होता, उसी प्रकार उक्त सभी स्वरूपोंका जगत‍्में आविर्भाव और तिरोभाव (प्रकट होने और छिपनेका भाव) होता है, परंतु उनका अभाव कभी नहीं होता।

इसलिये उनके जन्म आदिकी कथा एक आरोप या लीलामात्र है। आविर्भाव और तिरोभाव कभी गिने नहीं जा सकते। महासागरमें अबतक कितनी लहरें उठीं और विलीन हुईं, इसे कौन बता सकता है? परमात्माके ये सब स्वरूप भी सनातन होते हुए भी लीलाके लिये प्रादुर्भूत और तिरोभूत होते रहते हैं। इनके जन्म-मरण नहीं होते। ये सदा सत्य हैं और भक्तजनोंको इनके दर्शन सदा ही हो सकते हैं।

श्रीमहादेवजी तो अजन्मा हैं ही। इनकी आह्लादिनी शक्ति महादेवी भी उनसे अलग नहीं होतीं। वे लीलाके लिये कभी दक्षकन्या सती होकर अपने प्रभुकी सेवामें रहती हैं और कभी गिरिराज-नन्दिनी पार्वती होकर अपने प्रियतमकी आराधना करती हैं। प्रत्येक कल्पमें ऐसा होता है, इसलिये ये सती और पार्वती भी अनादि हैं। न जाने कबसे इनका प्रादुर्भाव और तिरोभावका क्रम चल रहा है—कौन कह सकता है। गणेशजी भी परमात्माके एक स्वरूप हैं। विघ्नहरण, मंगलकरण इनका मुख्य कार्य है। किसी समय पार्वतीजी जब इनका स्मरण करती हैं, तब ये अव्यक्तसे व्यक्त हो जाते हैं, उनके पुत्ररूपमें साकार होकर लीलाएँ करने लगते हैं। इनके प्रादुर्भावका क्रम भी अनादि है। शिव-पार्वतीके विवाहकालमें उन्हीं अनादिसिद्ध विघ्नहरण, मंगलकरण गणेशतत्त्वका पूजन होता है। गोस्वामी तुलसीदासजीने भी लोगोंकी शंकाका निवारण करते हुए कहा है—

मुनि अनुसासन गनपतिहि

पूजेउ संभु भवानि।

कोउ सुनि संसय करै जनि

सुर अनादि जियँ जानि॥

(२) एक समय शुम्भ-निशुम्भके अत्याचारसे पीड़ित देवतालोग भगवती विष्णुमायाकी स्तुति करने लगे। स्तुतिके अन्तमें भगवान‍्की योगमायास्वरूपा पार्वतीजी उनके सामने प्रकट हुईं। उन्होंने अपने-आप ही उनसे प्रश्न किया—‘भवद्भि: स्तूयतेऽत्र का।’ आपलोग यहाँ किसकी स्तुति करते हैं? पार्वतीजीके शरीरसे एक तेजोमयी देवीने तत्काल प्रकट होकर उत्तर दिया—‘ये लोग मेरी ही स्तुति करते हैं।’ वह देवी शरीर-कोशसे प्रकट हुई थी, इसीलिये ‘कौशिकी’ कहलायी। उसीको ‘अष्टभुजा सरस्वती’ भी कहते हैं। कौशिकीके निकल जानेके बाद पार्वतीका रंग काला पड़ गया और वे हिमाचलपर ‘काली’ के नामसे प्रकट हुईं। यह कथा मार्कण्डेयपुराणमें है। इस प्रकार यद्यपि पार्वतीजी ही काली, कालिका, गौरी, सरस्वती हैं, काली और गौरी दोनों उन्हींके नाम हैं, तथापि जो महाकाली महादेवजीके वक्षपर पैर रखे हुए दिखायी देती हैं, वे दूसरी ही हैं। तत्त्वत: या स्वरूपत: सब एक हैं, तथापि लीलाके लिये कुछ भेद स्वीकार किया जाता है। कहते हैं—एक समय किसी असुरका संहार करके महादेवी दुर्गा बड़े क्रोधमें भर गयीं। उस समय उनके क्रोधको शान्त करनेमें कोई समर्थ न हो सका। ऐसा जान पड़ता था कि वे समस्त जगत‍्का संहार कर डालेंगी। वे उस समय विकराल महाकालीके रूपमें उपस्थित थीं। किसी भी देवताको उनके सामने जानेका साहस नहीं होता था। तब महादेवजीने एक युक्ति सोची। वे उनके सामने मुर्देकी तरह लेट गये। महाकालीजी क्रोधमें बढ़ी आ रही थीं। अपने पतिकी छातीपर ज्यों ही उन्होंने पैर रखा कि महाकालीजीका ध्यान भंग हुआ। वे क्रोधका आवेश कम करके नीचे देखने लगीं। देखा तो शंकरजी नीचे दबे हैं। यह देख उनके मनमें संकोचका उदय हुआ, वे लज्जासे जीभ निकालकर पीछे हट गयीं। उसी स्वरूपकी झाँकी देखनेमें आती है। मुण्डमाला असुरोंके मुण्डोंसे बनी है। उसमें कितने मुण्ड हैं, इसकी गिनती नहीं।

(३) महादेवजीके गलेमें जो मुण्डमाला है, उसकी भी कहीं गणना नहीं दी गयी है। शेष भगवत्कृपा।