घर छोड़ना हानिकारक है
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने अपनी शारीरिक दुर्बलताका उल्लेख करते हुए घर छोड़नेके लिये सलाह पूछी है, इसके उत्तरमें निवेदन है कि घर छोड़ना आपके लिये न तो उचित है न लाभदायक ही। भगवान् बुद्ध तथा श्रीगौरांग महाप्रभुकी नकल हर आदमी नहीं कर सकता। उनमें जैसा महान् मनोबल था, वह हमलोगोंमें कहाँ है। मनुष्यको अपने अधिकारके अनुसार ही व्यवहार करना चाहिये, तभी वह सुखी रहता है; नहीं तो, आगे चलकर उसे बहुत पश्चात्ताप करना पड़ता है। जो लोकोत्तर महापुरुष हुए हैं, उनके पवित्र उपदेश ही हमारे लिये परिस्थिति और अधिकारके अनुरूप आचरण करनेयोग्य हैं। उनके आचरणोंका अनुकरण तो यथार्थरूपमें किया ही नहीं जा सकता।
भगवान् बुद्ध तथा श्रीगौरांग महाप्रभुका बचपन कितना पवित्र तथा संयमपूर्ण था! उसके सामने आप अपने बालकपनको देखिये। बचपनकी बुराइयाँ पूर्वजन्मके दुर्बल मनकी ही सूचक हैं। आपकी इस समय जो मानसिक स्थिति है, वह भी, जहाँतक मैं समझ पाया हूँ, यथार्थ वैराग्य नहीं है। यह प्रतिकूलतासे उत्पन्न भावना है, लज्जा और ग्लानिका परिणाम है। ऐसी अवस्थामें घर छोड़कर और कहीं चले जानेसे ही भजन बनने लगेगा, ऐसी बात नहीं सोचनी चाहिये। फिर, आजकल तो भजनके अनुकूल स्थानका मिलना भी बहुत कठिन है।
आपके मनमें भगवान्के दर्शनकी चाह है, यह बड़ी उत्तम चाह है। भगवान्के दर्शन उनकी कृपासे हो सकते हैं। इस युगमें उनके दर्शनका श्रेष्ठ साधन है—उनकी अहैतुकी असीम कृपापर परम विश्वास करके उनके नामका नित्य स्मरण करना। इसको आप बाहरकी अपेक्षा घरपर अधिक सुगमतासे कर सकते हैं। सब समय भगवन्नामका अखण्ड स्मरण करते हुए ही घरके आवश्यक सारे काम करें। भगवान्ने गीतामें कहा है—
तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
(८।७)
‘इसलिये हे अर्जुन! सब समय मेरा स्मरण करो और (समयपर) युद्ध करो। यों मन-बुद्धिको मुझमें अर्पण करनेपर तुम मुझको प्राप्त होओगे, इसमें संदेह नहीं है।’
इसके सिवा, अग्निकी साक्षी देकर जिस पत्नीका आपने पाणिग्रहण किया और जिसको साथ रखनेकी प्रतिज्ञा की, उसके सुख-दु:खका भी आपपर निश्चित उत्तरदायित्व है। आपके इस प्रकार गृह-त्यागसे यदि कोई बुराई आ गयी तो पत्नीके पाप-पुण्यका आपको भागीदार होना पड़ेगा। इस दृष्टिसे भी घर छोड़ना कदापि उचित नहीं है।
अतएव मेरी सलाह तो यह है कि आप घर छोड़नेका विचार त्याग दीजिये। चिकित्साका प्रयत्न करते रहिये। श्रद्धापूर्वक भगवन्नामका जप तथा भगवान्की प्रार्थना करनेसे भी आपके रोगका नाश हो सकता है। विश्वास हो तो, राम-नाम सब रोगोंकी एक रामबाण दवा है—‘सर्वतापशमनैकभेषजम्।’ शेष भगवत्कृपा।