गृहस्थीकी बेड़ी

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपने लिखा ‘जिसकी बचपनसे ही संसारसे प्रीति नहीं है, भगवच्चर्चामें जिसका मन लगता है, संसारसे जिसको बार-बार घृणा होती है और जिसका मन परमात्माकी ओर आकर्षित होता है, परंतु गृहस्थाश्रमकी बेड़ी जिसके पाँवमें पड़ी है, वह क्या करे?’ इसके उत्तरमें निवेदन है कि जब संसारमें प्रीति नहीं है और परमात्माकी ओर मन आकर्षित होता है, तब गृहस्थाश्रमकी बेड़ीके लिये चिन्ता क्यों करनी चाहिये। बेड़ी तो तभीतक है, जबतक मोह है। मनुष्य जब भगवान‍्का हो जाता है, तब दूसरे सारे बन्धन अपने-आप ही कट जाते हैं। श्रीब्रह्माजीने भगवान‍्से कहा है—

तावद् रागादय: स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम्।

तावन्मोहोऽङ्घ्रिनिगडो यावत् कृष्ण न ते जना:॥

(श्रीमद्भा० १०।१४।३६)

‘श्रीकृष्ण! जबतक मनुष्य तुम्हारा नहीं हो जाता, तभीतक राग आदि चोर पीछे लगे रहते हैं, तभीतक घर कैदखानेकी तरह उसे बंदी बनाये रखता है और तभीतक मोहकी बेड़ी पैरोंमें जकड़ी रहती है।’

भगवान‍्का हो जानेपर तो घर भी भगवान‍्का मन्दिर है, घरका काम भगवान‍्की सेवा है, घरके आदमी भगवान‍्के दिये हुए सेव्यस्वरूप हैं या उनके रूपमें भगवान् ही अभिव्यक्त हैं और उनकी सेवा भगवान‍्की पूजा है। उनके प्रति कहीं ममता, आसक्ति या मोह नहीं है। भगवान‍्के लिये ही उनकी सेवा करनी है। ऐसी गृहस्थीमें बन्धन कहाँ है? चिन्ता सारी भगवान् करेंगे, कब, कैसे, क्या होगा, उसका विधान भगवान् करेंगे। उसका काम तो भगवान‍्का चिन्तन करते हुए अपने योग्य कर्मोंके द्वारा भगवान‍्के आज्ञानुसार उनकी सेवा करनामात्र है। संसारमें घृणा होनी चाहिये उसके भोग्यरूपसे। पर जब वह भगवद्‍‍रूप हो जाय, तब तो वह पूजाका पात्र है। जिसकी भगवान‍्में प्रीति है, संसारमें प्रीति नहीं है, वह संसारमें नहीं बँधता। घर बन्धन नहीं है, बन्धन है घरमें मेरापन। जबतक यह मेरापन है, तबतक वह ‘घर’ का है—‘भगवान्’ का नहीं। जहाँ भगवान‍्का हुआ, वहीं भगवान् उसके हुए। फिर घर ‘उसका’ नहीं रहता, न वह ‘घरका’ रहता है। घर भगवान‍्का है, वह भी भगवान‍्का है। फिर घरमें रहकर भी वह भगवान‍्के मन्दिरमें रहता है और अपने प्रत्येक कर्मसे भगवान‍्की सेवा करता है। इसके विपरीत घर-गृहस्थीको छोड़ भी दिया तो जंगलकी कुटियामें, पहननेकी कौपीनमें उसका मेरापन हो जायगा। उन्हींमें मन फँस जायगा और बन्धन हो जायगा। अतएव उन सज्जनको घरसे घृणा न करके घरकी आसक्ति और ममतासे घृणा करनी चाहिये और उनका त्याग करके घरमें रहते हुए ही अपनेको भगवान‍्का बना देना चाहिये। सदा भगवान‍्का स्मरण करते हुए भगवान‍्की सेवाबुद्धिसे ही सारे कर्म यथायोग्य करने चाहिये, फिर समस्त भवबन्धन आप ही कट जायँगे।

(२) जिसे अपने अनुकूल बनाना हो, हमें पहले उसके अनुकूल बनना चाहिये। उसकी भर्त्सना, समालोचना न करके उससे प्रेम करना चाहिये और उसकी अच्छी बातोंका हृदयसे तथा वाणीसे समर्थन करना चाहिये, उसकी सेवा तथा उसका हित करना चाहिये। जब उसके मनमें आपके प्रति आदर, प्रेम तथा सद्भाव उत्पन्न हो जाय, तब उपदेशके रूपमें नहीं, परामर्शके रूपमें उसे अच्छी-अच्छी बातें कहनी चाहिये। उपदेशसे काम वहाँ हुआ करता है, जहाँ श्रद्धा होती है; नहीं तो उपदेशसे काम नहीं हुआ करता। ऐसे स्थानमें उपर्युक्त रीतिसे बर्ताव करना चाहिये तथा उसे जो बात समझानी हो, वह भी किसी इतिहास-कथाके रूपमें दूसरेके द्वारा समझानी चाहिये। यदि हम दूसरेको अपने अनुकूल बनाना चाहते हैं तो अपने मनकी बात छोड़कर पहले उसके अनुकूल बन जाना चाहिये; फिर वह आप ही अनुकूल हो जायगा। यह उत्तम साधन है।

एक साधन यह है कि उसके दोष न देखकर गुणोंकी खोज करनी चाहिये और गुणोंकी मन-ही-मन प्रशंसा करते हुए उसके प्रति सदा सद्भावना करनी चाहिये। आपकी सद्भावनाका उसपर असर होगा और वह क्रमश: अनुकूल बनता चला जायगा। वशीकरणका मन्त्र प्रेम है; अधिकार-उपदेश आदि नहीं। और जहाँ प्रेम है, वहीं सुख है—यह निश्चित सिद्धान्त है।