ईमानदारीका आदर्श

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण । आपने जो कुछ लिखा है, आजके आदर्शच्युत भारतवासीका ठीक यही चित्र है। हमारे उच्च भाव, हमारी सचाई और ईमानदारीका आदर्श, हमारी महान् त्यागकी भावना, भूतमात्रको अपना स्वरूप या भगवान् समझनेका सिद्धान्त केवल हमारे अध्यात्मग्रन्थोंमें रह गया है, हमारे जीवनमें वह ढूँढ़े भी नहीं मिलता। यह अत्यन्त ही परितापका विषय है। सचाई और ईमानदारीकी दृष्टिसे जगत‍्में आज सबसे बढ़कर आदर्श व्यवहार है अंग्रेजजातिका। सन् १९५० के आसपास लंदनसे एक समाचार आया था, जिसका सारांश इस प्रकार है—‘एक ब्रिटिश फर्मने हालमें ही अपने ग्राहकोंको चार लाख पौंड (एक पौंडके दाम आज १३.५० हैं, इस हिसाबसे ५४ लाख रुपये) की बड़ी रकम वापस दी है। उस फर्ममें गत्तेके डिब्बे बनते हैं। उसका अनुमान था कि गत्ते महँगे मिलेंगे, इससे उसने डिब्बोंके दाम अधिक रख दिये थे। ग्राहकोंने उसी दाममें डिब्बे स्वेच्छापूर्वक खरीदे थे; परंतु पीछे फर्मको यह पता लगा कि गत्ते सस्ते मिले हैं, उनके दाम उसको अधिक लगाने नहीं चाहिये थे, इसलिये उसने अपने मुख्य ग्राहकोंको एक पौंडके पीछे दो शिलिंग अर्थात् पूरी रकमका दसवाँ हिस्सा लौटा दिया।’

कितना आदर्श व्यवहार है! आजके भारतीय व्यापारियोंमें तो शायद ही कोई ऐसा हो, जिसके मनमें इस प्रकारका अधिक मुनाफा लौटानेकी कल्पना भी हो। हमें अंग्रेजोंसे इस विषयमें शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये और इतना नहीं तो कम-से-कम व्यापारमें—कम तौलना, अधिक लेना, मिलावट करना, बढ़ियाके बदले घटिया माल देना, घाटा होनेपर स्वीकृत सौदेको अस्वीकार कर देना और छिपाव या चोरीसे ज्यादा रुपये ले लेना—आदि दोषोंका परित्याग तो करना ही चाहिये। उचित तो यह है कि जिसके साथ अपना व्यापार हो, उसे भगवान् मानें और उसकी सेवा, उसके हितकी दृष्टिसे और उसे सुख पहुँचानेके लिये ही उसके साथ व्यापार करें। याद रखना चाहिये—यों भगवत्पूजाके भावसे व्यापार करनेवाला व्यक्ति या फर्म परिणाममें घाटेमें तो रहेगा ही नहीं, यहाँ भी उसे आशातीत लाभ होगा और भगवत्पूजाके भावसे किया हुआ व्यापार परम साधन बनकर उसे भगवान‍्की प्राप्ति करा देगा। भगवान‍्ने स्वयं कहा है—

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥

(गीता १८।४६)

‘अपने स्वाभाविक कर्मके द्वारा भगवान‍्की पूजा करके मनुष्य सिद्धिको—भगवान‍्को प्राप्त हो जाता है।’ अत: इस प्रकारकी चेष्टा करनी चाहिये। समाज न करे तो न सही, जिसकी समझमें यह तत्त्व आ जाय, उसे तो अपने इहलोक-परलोकके हित और मानव-जन्मकी सफलताके लिये ऐसा करना ही चाहिये। शेष भगवत्कृपा।