ईश्वरको माननेमें लाभ

प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका लम्बा पत्र मिला। सब प्रश्नोंका विस्तारके साथ उत्तर लिखना तो मेरे लिये अभी बहुत कठिन है। संक्षेपसे ही लिख रहा हूँ। कृपया क्षमा कीजियेगा।

(१) ईश्वरवादीमात्र यही मानते हैं कि संसारकी रचना ईश्वरने ही की है, बल्कि अधिकांश अनुभवी महात्माओंने तो संसारके उपादान और निमित्त—दोनों ही कारण ईश्वरको माना है। जो लोग ईश्वरको नहीं मानते, उनसे किसीका कोई आग्रह नहीं है कि वे ईश्वरको मानें ही, यद्यपि माननेमें लाभ है। परंतु सर्वथा पराधीन और स्वल्प सामर्थ्यवाला मनुष्य-प्राणी—अपनी शक्तिसे एक मच्छर या चींटीतकको नहीं बना सकता—कहे कि ‘ईश्वरको हमने बनाया है’ तो इससे बढ़कर असत्य, दम्भ और मिथ्या अभिमान और क्या हो सकता है? ईश्वरका अर्थ ही है—सबका स्वामी, सबका शासक, सब कुछ करने-न-करनेमें पूर्ण समर्थ। कोई भी मानव-प्राणी क्या कभी ऐसी सर्वसमर्थ प्रभु-सत्ताका निर्माण कर सकता है?

आप बड़े गर्वसे लिखते हैं, ‘मैं ईश्वरको नहीं मानता’ न मानें। पर आपने कभी सोचा भी है कि ईश्वरको न माननेसे क्या हानि होती है? मान लीजिये—ईश्वर नहीं है और आपने उसको माना तो आपको कोई नुकसान नहीं होगा। ईश्वरको माननेपर आप ईश्वरके भयसे पापकर्मसे दूर रहेंगे, ईश्वरको प्रसन्न करनेके लिये सत्कर्म भी करेंगे। बुरे कर्मको बुरा और सत्कर्मको अच्छा तो आप मानते ही हैं। यह आपका लाभ हुआ। क्योंकि बुरे कर्मसे बचने और सत्कर्म करनेसे जगत‍्में तो आपकी कीर्ति होगी ही। ईश्वरकी उपासनाके लिये आपने कुछ समय दिया—मान लीजिये, वह व्यर्थ गया; पर क्या आपके सारे समयका सदुपयोग ही होता है? क्या वह अपने और समाजके अहितकर और व्यर्थ कार्योंमें नहीं लगता? यदि लगता है तो फिर यदि थोड़ा-सा समय भगवदुपासनामें लग गया तो क्या हानि है? आपने इतनी खोज तो की ही नहीं है कि जिसके बलपर आप यह कह सकें कि ‘निश्चय ही ईश्वर नहीं है, हमने इस प्रकार खोज करके इसका भलीभाँति पता लगा लिया है।’ मान लीजिये—यदि ईश्वर हुए और आपने उनको नहीं माना और उपासना नहीं की, तो आपका जीवन स्वेच्छाचारी तथा उच्छृंखल तो होगा ही, परमात्माकी प्राप्तिसे आप वंचित रह जायँगे और ईश्वरको मानकर उपासना करनेवाला ईश्वरको प्राप्त कर लेगा। अतएव ईश्वरको माननेमें ही लाभ है। उसमें कुछ बिगड़ता तो है ही नहीं। ईश्वरको हृदयसे मानकर यदि आप अपना कुछ समय—जो व्यर्थके हँसी-मजाक, सैर-सपाटे या निद्रामें बिता देते हैं—ईश्वरकी उपासनामें लगा देंगे तो आपको दु:खमें आश्वासन, हृदयमें शान्ति और जीवनमें सत्य-सदाचार आदिकी पवित्र प्रेरणा मिलेगी। ईश्वरको न माननेवालेपर भी दु:ख तो आते ही हैं, पर उसे उसमें आश्वासन और धैर्य कहींसे भी नहीं मिलता।

ईश्वरके अस्तित्वके प्रमाण पद-पदपर मिलते हैं। जगत‍्की सुशृंखला, सूर्य-चन्द्र-नक्षत्रादिका नियमित कार्य आदि इसके ज्वलन्त प्रमाण हैं। फिर एक बड़ा प्रबल प्रमाण यह है कि ईश्वरको प्राप्त करनेके जो उपाय शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं, उनका ईमानदारीसे अवलम्बन करके ऐसा एक भी मनुष्य आजतक संसारमें नहीं हुआ, जो यह कहता हो कि मुझे ईश्वरकी प्राप्ति नहीं हुई। अवश्य ही ईश्वर तर्कसे सिद्ध होनेवाला तत्त्व नहीं है। जो समष्टि बुद्धिका भी कारण है, उसे नगण्य व्यष्टि बुद्धिसे सिद्ध करनेका प्रयत्न करना तो हास्यास्पद ही है। इसी प्रकार प्रत्यक्ष प्रमाणके बिना ईश्वरको स्वीकार न करना भी वैसी ही वातुलता है, जैसी प्रत्यक्ष प्रमाणके अभावमें माताके कहनेपर भी पिताको अस्वीकार करना! पिताके होनेमें जैसे माताके वचन प्रमाण हैं, वैसे ही ईश्वरके होनेमें शास्त्र तथा भगवत्प्राप्त महापुरुषोंके वचन—आप्तवाक्य ही प्रमाण हैं।

(२) धर्मकी शिथिलता होनेपर भी संसारका कार्य चलता है, यह तो ठीक ही है। पर संसारका जिस किसी तरह कार्य चलना ही यथार्थ चलना नहीं है, सुव्यवस्थितरूपसे—सबके लिये कल्याणकारी तथा सुखकारी होकर चलना ही यथार्थ चलना है। जिन सरकारी विभागोंमें घूसखोरी, छल, कपट तथा बेईमानीकी भरमार है, वे विभाग भी तो चल ही रहे हैं। किसी कार्यका केवल चलना एक बात है और आदर्श तथा मंगलमय रूपमें चलना दूसरी। हमारी वर्णाश्रम-व्यवस्थामें जबतक दोष नहीं आये थे, तबतक हमारा समाज जिस आदर्शरूपमें चलता था, अबतकके विश्वके इतिहासमें वैसी आदर्श व्यवस्थासे पूर्ण सुसम्पन्न समाज कहीं देखा या सुना नहीं गया। कर्मोंका सम्यक् विभाजन, वंश-परम्परासे चली आती हुई रक्तमज्जागत विशिष्टताओंका पूर्ण उपयोग, सबका पारस्परिक सहयोग और अपने-अपने कर्मद्वारा एक-दूसरेका जीवन सुगम बनानेकी स्वाभाविक चेष्टा तथा आदर्श स्वार्थत्यागका ऐसा भव्य एवं सुन्दर सामंजस्य अन्यत्र कहीं मिलता ही नहीं। वर्णव्यवस्थाके सुदृढ़ दुर्गने ही अनेकों भीषण आक्रमणोंसे आर्यजातिकी संस्कृतिको सुरक्षित रखा, जब कि अन्यान्य अनेकों सभ्यताएँ, संस्कृतियाँ विजेताओंके प्रभावमें आकर नष्ट हो गयीं। कर्म छोटा-बड़ा नहीं होता, यह तो आप मानते ही हैं। वंश-परम्परासे जिस कुलमें जो कर्म स्वाभाविक चले आ रहे हों, वे ही उस कुलके बालकके लिये सुसाध्य होते हैं—यह एक अनुभूत सत्य है। अब ब्राह्मणके जो स्वभाव, गुण आदि कहे गये हैं, जरा सोचकर बताइये—वे सब श्लाघ्य और आदरणीय हैं या नहीं? धर्मके क्षेत्रमें जहाँ ब्राह्मणको जन्मसे ही पूज्य माना जाता है, वहाँ परलोक और पुनर्जन्मकी सत्ता मानकर ही ऐसा व्यवहार होता है। यदि आप धर्म और पुनर्जन्म तथा परलोकको मानते हैं, तब तो पुण्यके प्रारब्धसे प्राप्त ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेनेवाला जन्मत: पवित्र है ही और धर्मके क्षेत्रमें उसकी पवित्रताका माना जाना उचित ही है। हाँ, यदि आप पुनर्जन्म, परलोक और धर्मको नहीं मानते, तब तो अवश्य ही आर्यसंस्कृतिकी यह जन्मगत पवित्रताकी मान्यता आपकी समझमें नहीं आ सकती।

(३) चोरी, हिंसा तथा परस्त्री-गमन आदि पापोंमें सारा दोष प्राय: इन पापोंको करनेवालेका ही है। इसके लिये समाज-शासनप्रणाली या शासनतन्त्रको दोष देना अनुचित है। कोई भी अच्छा समाज या शासनप्रणाली इन कामोंके लिये कभी किसीको प्रोत्साहित नहीं करती, वह तो इनको दण्डनीय ही मानती है। पाप होते हैं वस्तुत: हमारी विषयकामनासे—इन्द्रियसुखकी लालसासे। आप पूर्ति चाहते हैं अपनी कामनाकी, तृप्ति चाहते हैं अपनी इन्द्रियोंकी और इसके लिये दोषी ठहराना चाहते हैं किसी दूसरेको। यह तो स्पष्ट ही अपने ही मनका अपने-आपको धोखा देना है। जो कर्म करता है, वही उसका उत्तरदायी भी होता है।

(४) यह सत्य है कि आर्थिक दृष्टिसे भी गोवध बंद होना चाहिये; परंतु धार्मिक कारण बतलाना अन्धविश्वास है, यह बात कदापि नहीं है। वरं इसका कोई धार्मिक पक्ष नहीं है, यह दुराग्रह स्वयं ही एक अन्धविश्वास है। आपने ऐसे कितने और कौन-कौन-से प्रयोग किये हैं और कौन-कौन-से कितने प्रमाण प्राप्त किये हैं, जिनके बलपर पुनर्जन्म, परलोक और धर्म आदिको असिद्ध बतलाते हैं? सुनी-सुनायी अप्रामाणिक बातोंको मान लेना ही अन्धविश्वास है। वैज्ञानिकोंसे भी भूल सम्भव है; क्योंकि वैज्ञानिक अभी अन्वेषणके मार्गमें हैं। वे अभी गन्तव्य स्थलतक नहीं पहुँच पाये हैं। इस अवस्थामें इन अधूरी खोजोंपर और मनकी कल्पनाओंपर दुराग्रह करना अन्धविश्वास है या शास्त्रोंपर जो महान् तपस्वी त्रिकालज्ञ ऋषियोंके अनुभूतिपूर्ण वचन हैं तथा जिनमें भ्रम, त्रुटि एवं संदेहको स्थान ही नहीं है—आस्था रखनेवालोंका उन शास्त्रोंपर अपनी मान्यता स्थिर करना अन्धविश्वास है?

हमारा धर्म बलात् किसीके स्वत्वको छीनना नहीं चाहता; किंतु अव्यावहारिक मन:कल्पित कुतर्कोंको भी वह स्वीकार नहीं करता। गोपालन करके बछड़ेके जीवन-निर्वाहार्थ पर्याप्त दूध छोड़कर, उसके पालन-पोषण, रक्षण-संवर्धनकी पूरी व्यवस्था करके गौका दूध लेना भी स्वत्वहरण है—ऐसी बात जो लोग कहते हैं, वे केवल कुतर्क ही करते हैं। फिर तो तमाम पेड़ोंके फलोंपर पक्षियोंका स्वत्व एवं खेतोंकी सारी उपजपर या अन्नमात्रपर पशुओंका ही स्वत्व मानना चाहिये। ऐसे कुतर्क इसीलिये उठाये जाते हैं कि शास्त्रीय परम्पराके सामने सिर झुकाते आजके लोगोंके गर्वपर ठेस-सी लगती है और बिना आधारका तर्क तो मनुष्यको भ्रममें ही डालता है। मनुष्य भलीभाँति गोपालन करके जो दूध लेता है, खेतों और वृक्षोंसे जो धान्य तथा फल लेता है, वह उसका स्वत्व ही है; क्योंकि वह उसके श्रम और सेवाका पुरस्कार है।

(५) आप पहले कृपया यह समझनेका प्रयत्न करें कि मुक्ति क्या है; इसके पश्चात् यह जाननेकी चेष्टा करें कि वह कैसे मिलती है। जबतक पुनर्जन्म, परलोक और कर्मबन्धन ही समझमें नहीं आते, तबतक मुक्तिका प्रश्न व्यर्थ है। जो परलोक-पुनर्जन्मको मानता है, गंगास्नान, तीर्थसेवन, श्राद्ध और ब्राह्मणभोजनके फलकी बात भी वही समझ सकता है।

(६) यह किसने कहा कि ‘राम-नाम’ जपनेवालेको प्रकृतिके प्रतिकूल कार्य करनेकी छूट है। प्रकृतिके अनुकूल चलनेपर अनुकूल और प्रतिकूल चलनेपर प्रतिकूल प्रभाव शरीरपर पड़ेगा ही। ‘राम-नाम’ के जपका तो सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है—मनपर। आप एकाग्र मनसे प्रतिदिन नियमपूर्वक बीस मिनट ‘राम-नाम’ जपका अभ्यास दो महीनेतक लगातार कर लें तो आपको स्वयं इसके प्रभावका पता लग जायगा।

(७) किसी भी संस्थाको भला-बुरा बतलानेसे पहले उसके उद्देश्य, नियम तथा कार्यप्रणालीको भलीभाँति देखना-समझना आवश्यक है। देख-समझकर ही आलोचना करनी चाहिये। व्यक्ति तो सभी जगह अच्छे-बुरे हो सकते हैं; पाँचों अँगुलियाँ भी समान नहीं होतीं।

उपर्युक्त उत्तर बहुत संक्षेपमें लिखनेपर भी पत्र बड़ा हो गया है। आपका इससे कुछ समाधान हुआ तो आनन्दकी बात है; न हुआ तो भी आनन्द ही है। अपने विचारमात्र व्यक्त किये गये हैं। शेष भगवत्कृपा।