ईश्वर-चर्चा

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। आपमें और आपके मित्रमें जो सत्संगके तौरपर कुछ वाद-विवाद हुआ है और उसमें आप दोनोंने जो विचार व्यक्त किये हैं, उनके सम्बन्धमें आप मेरी सम्मति जानना चाहते हैं—यह अच्छी बात है। भ्रम और शंका तो भगवान् ही दूर करते हैं। उनकी कृपाके प्रकाशसे जब मिथ्या तर्कका अन्धकार मिट जाता है और ज्ञानका आलोक उदय होता है, तब भ्रम और अज्ञानका तिमिर अपने-आप हट जाता है।

एक बात और ध्यान देनेयोग्य है। जहाँतक प्रत्यक्ष प्रमाणकी गति है, वहींतक मनुष्य साधिकार कोई बात कह सकता है। जहाँ इन्द्रिय, मन, बुद्धिकी भी पहुँच नहीं हो पाती, उस तत्त्वका निर्णय मनुष्य निरे तर्क और युक्तिके बलपर नहीं कर सकता। उसके लिये शास्त्र और अनुभवी संतकी शरणमें जानेकी आवश्यकता होती है। भगवान् भी यही कहते हैं—

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन:॥

(श्रीमद्भगवद‍्गीता ४।३४)

जिसने शम-दम आदि साधनोंका अनुष्ठान किया है, सद‍्गुरुकी सेवा की है, सत्संगका दीर्घकालतक सेवन किया है, शास्त्रोंका अनुशीलन किया है और एकाग्रतापूर्वक भगवान‍्की आराधना की है, वही भगवत्कृपासे यथार्थ तत्त्वका अनुभव करके कह सकता है कि कौन भ्रममें है और कौन नहीं। शेष सब लोग तो स्वयं संदेह और भ्रममें ही रहते हैं। फिर भी इस भ्रम-निवारणके ये ही सब उपाय हैं—परस्पर समझना-समझाना और संदेह हो तो उसे श्रेष्ठ पुरुषोंसे पूछकर निवृत्त कर लेना; इन्हींसे तत्त्वका बोध हुआ करता है—‘वादे वादे जायते तत्त्वबोध:’—यह प्रसिद्ध है।

आपके मित्रका यह कहना कि ‘ईश्वरकी आज्ञाके बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता’ सर्वथा सत्य है। जैसे विद्युत्-शक्तिके बिना मशीन नहीं चल पाती, उसी प्रकार ईश्वरीय सत्ता एवं प्रेरणाके बिना जगत‍्का एक अणु भी कार्य-क्षम नहीं हो सकता। हम तभी किसीको देखते हैं, जब आँख काम करती है। नेत्रमें जो देखनेकी शक्ति है, वह किसकी है? ईश्वरकी ही है; इसीलिये शास्त्र ईश्वरको ‘चक्षुषश्चक्षु:’ (नेत्रका भी नेत्र) कहते हैं। अतएव संसारमें यदि एक पत्ता भी हिलता है तो उसके हलन-चलनमें ईश्वरकी शक्ति या प्रेरणा ही काम करती है।

मित्र महोदयकी जो दूसरी बात है, उससे मैं पूर्णतया सहमत नहीं हूँ। अर्थात् वे जो यह कहते हैं कि ‘अच्छा-बुरा, पुण्य-पाप—सब ईश्वर ही कराता है,’ यह आधा ही सत्य है। पुण्य ईश्वर कराता है यह तो समझमें आनेकी बात है; क्योंकि ईश्वर पुण्यमय है। जो जैसा होता है, उससे वैसी प्रेरणा मिलती है; परंतु ईश्वर बुरा कर्म या पाप भी कराता है, यह किसी भी विचारशीलको मान्य नहीं हो सकता। सूर्यकी किरणें प्रकाश फैलाती हैं—यह तो सबके विश्वासकी बात है; परंतु सूर्यके उदय होनेपर अन्धकार बढ़ जाता है, यह सम्भवत: कोई भी माननेको तैयार नहीं होगा। अग्नि शीतल और चन्द्रमा उष्ण है—यह उन्मत्त-प्रलाप है। जिसका नाम, रूप, लीला, धाम—सब कुछ पुण्यमय है, वह पाप क्यों करायेगा?

इसपर यह शंका हो सकती है कि ‘उसकी इच्छाके बिना पत्ता भी नहीं हिलता तब पाप कैसे हो सकता है?’ इसका उत्तर यह है कि हलन-चलन आदि चेष्टाएँ ईश्वरीय शक्तिसे होती हैं। पापीके शरीर और इन्द्रियाँ भी ईश्वर-शक्तिसे ही हिलते-चलते या चेष्टा करते हैं तथा पुण्यात्माके शरीर एवं इन्द्रियाँ भी ईश्वर-शक्तिसे ही अपने कार्यमें समर्थ होते हैं। यह चेष्टामात्र ही ईश्वरीय शक्तिसे होती है। एक ही प्रकारकी चेष्टा दो मनुष्य करते हैं; एककी चेष्टा पाप बन जाती है और दूसरेकी पुण्य। पापी और पुण्यात्मा—दोनों अपने नेत्रोंसे देखते हैं; परंतु एककी दृष्टि शुद्ध है, वह सबमें सर्वत्र भगवान‍्का भाव रखकर देखता है और दूसरा रूप, लावण्य, कटाक्ष और हाव-भावपर गंदी दृष्टि रखकर परस्त्रीका सतीत्व लूटना चाहता है। भावशुद्धिके कारण पहलेकी दर्शनरूप चेष्टा पुण्य है और भावकी अशुद्धिके परिणामस्वरूप दूसरेकी वही चेष्टा पाप है। चेष्टामें ईश्वरीय शक्ति काम करती है और उसी चेष्टाको पुण्यमय अथवा पापमय बनानेमें मनुष्यका आन्तरिक भाव कारण बनता है। ईश्वर पुण्यमय हैं, अत: सर्वत्र ईश्वर-दर्शन करनेवाला पुण्यात्मा है और धर्मविरुद्ध ‘काम’ पापरूप है, अत: उसमें प्रवृत्त होनेवाला पापात्मा है। इसी प्रकार प्रत्येक चेष्टाके सम्बन्धमें हम पाप-पुण्यका निर्णय कर सकते हैं। चेष्टा भगवान् कराते हैं और पाप-पुण्य मनुष्य करता है। भगवान‍्ने अर्जुनके यह पूछनेपर कि ‘पाप कौन कराता है?’ स्पष्ट उत्तर दिया है कि ‘महापापी काम ही पापमें कारण होता है, अत: जिस प्रकार यह ठीक है कि ईश्वरीय शक्ति या प्रेरणाके बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता, उसी प्रकार यह भी परम सत्य है कि ईश्वर सत्कर्ममें सहायक होता है, पाप-कर्म तो मनुष्य अपनी कामना एवं आसक्तिसे करता है, उसमें ईश्वरका हाथ नहीं है। इसीलिये अच्छे-बुरे कर्मका दण्ड मिलता है। चोरको चोरीकी सजा क्यों मिलती है? इसलिये कि वह पाप करता है। चोर एक जगहका माल उठाकर दूसरी जगह रखता है; साधु भी यही करता है। परंतु एक चोर है, दूसरा साधु। चोर दूसरेकी वस्तुपर हाथ लगाकर अनधिकार चेष्टा करता है और साधु पुरुष अपनी वस्तु उठाता एवं रखता है। एकको छिपना पड़ता है, दूसरा सबके सामने रहता है। जैसे लोकमें भले-बुरे कर्मका पुरस्कार या दण्ड मिलता है, उसी प्रकार परलोकमें भी समझना चाहिये। इसीलिये नरक और स्वर्गकी बात भी सत्य है। जैसे यहाँ हवालात, जेल और फाँसीघर हैं, उसी प्रकार परलोकमें भी यातनागृह हैं। इस सत्यकी ओरसे आँख नहीं मूँदना चाहिये।

भगवान‍्ने सम्पूर्ण जगत‍्की सृष्टि की है। उसमें कोई राजा, रईस, सेठ, साहूकार, उच्च और महान् है तो कोई निर्धन, दीन, हीन, दु:खी, कंगाल, नीच और छोटा है। ऐसी विषमता क्यों? क्या ईश्वर अन्यायी या पक्षपाती है, जो सबको एक-से नहीं बनाता? ईश्वर समदर्शी और न्यायकारी है। वह अपनी ओरसे सबको समान सुविधा देता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश आदि उसने सबके लिये बनाये हैं। विषमता मनुष्यने स्वयं पैदा कर ली है। अपने कर्मके अनुसार कोई सुखी है और कोई दु:खी, कोई नीरोग है तो कोई दीर्घकालतक रोगी रहता है। एक पिताने अपने दो पुत्रोंको पाँच-पाँच रुपये देकर बाजार भेजा और कहा—इन रुपयोंसे तुम अपने मनकी वस्तु खरीद लेना। दोनों गये। एकने जितने पैसे थे, उनके अनुसार वस्तुएँ खरीदीं। दूसरेने बाजारकी बहुमूल्य वस्तुएँ पसंद कीं, किंतु रुपये कम होनेके कारण वह उन्हें खरीद न सका। फिर भी कामना तीव्र होनेसे उसके मनमें उन वस्तुओंके प्रति लोभ जाग्रत् हुआ और लोभवश वह किसी मनचाही वस्तुको चुरानेमें प्रवृत्त हो गया। अन्तमें वह चोरीमें पकड़ा गया और मार-पीटकर जेलमें बंद कर दिया गया। पहला अपने नेक व्यवहारसे घर और बाहर सर्वत्र आदरका पात्र हुआ। दोनोंकी जो दो गतियाँ हुईं, उनमें उनके अपने ही कर्म कारण बने। पिताने एकको साधु और दूसरेको चोर नहीं बनाया था।

‘जीव नामकी कोई चीज नहीं’—यह कहना भी सर्वथा भ्रम है। ‘मैं हूँ’ इसके समर्थनमें बाहरसे कोई प्रमाण देनेकी आवश्यकता नहीं होती। अपनी सत्ताका सबको प्रत्यक्ष अनुभव होता है। संसारमें जड और चेतन—दो ही वस्तुएँ देखी जाती हैं; सर्वव्यापी परमात्मा प्रत्येक शरीरमें जीवरूपसे निवास करता है; जीव ईश्वरका ही अंश है। ईश्वरवादी होकर भी आपके मित्र उन्हींके अंशभूत जीवकी सत्ता—विशेषत: अपनी सत्ताको अस्वीकार करते हैं, यह बड़े आश्चर्यकी बात है। भगवान् स्वयं गीतामें कहते हैं—

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।

(१५।७)

गोस्वामी तुलसीदासजीने भी काकभुशुण्डिजीको गरुड़जीसे यह कहलाया है—‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी।’ (मानस ७। ११७।१) वेदभगवान‍्का भी यही उपदेश है—‘द्वा सुपर्णा सयुजा०’ इत्यादि। अर्थात् ईश्वर और जीव दो पक्षी हैं, जो मनुष्य-शरीररूपी वृक्षमें एक साथ रहते हैं।

आपने अपने मित्रके प्रतिवादमें जो कुछ कहा, उसके अन्तर्गत एक वाक्य यह भी है कि ‘उपादान कारण ईश्वर है और निमित्त कारण जीव है। आपकी यह उक्ति ठीक नहीं है। साधारणतया पांचभौतिक जड वस्तुओंका उपादान प्रकृति है, परंतु वह भी सर्वरूप परमात्मासे भिन्न नहीं है। अत: एकमात्र परमात्मा ही जगत‍्के अभिन्न-निमित्तोपादान कारण हैं। वे ही उपादान हैं और वे ही निमित्त कारण। घटकी उत्पत्तिमें मृत्तिका उपादान है और कुम्भकार निमित्त। परंतु मकड़ी जो जाला बनाती है, उसमें वही निमित्त है और उपादान भी वही है। इसी प्रकार परमात्मा ही निमित्त कारण हैं और वे ही उपादान; क्योंकि उनसे भिन्न कोई वस्तु है ही नहीं।’ श्रीभगवान् कहते हैं—

मत्त: परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।

(गीता ७।७)

‘अर्जुन! मेरे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है।’

शेष बातें जो आपने कही हैं, सब ठीक हैं।

अब आपके प्रश्नोंपर संक्षेपसे विचार किया जाता है—

(१) विभीषण भक्तराज राक्षसकुलमें कैसे हो गये?—यह प्रश्न ठीक नहीं है। विभीषण राक्षसकुलमें पहले हुए और भक्तराज पीछे बने। इसके सिवा राक्षसकुल कोई अधम कुल नहीं है, जहाँ भक्तराजका जन्म लेना उचित न माना जाय। अलकापुरीके अधीश्वर, उत्तर दिशाके लोकपाल राजाधिराज कुबेर भी राक्षसकुलके ही रत्न हैं। महर्षि पुलस्त्यके पुत्र महर्षि विश्रवा थे, उनके ही पुत्रोंकी परम्परा राक्षसकुल कहलायी। रावणको ‘उत्तम कुल पुलस्त्य कर नाती।’ कहा गया है। रावणने अपने अन्यायपूर्ण आचरणसे उस कुलकी प्रतिष्ठा घटा दी, अन्यथा वह श्रेष्ठ कुल था।

(२) हनुमान‍्जी भगवान् शंकरके अवतार हैं, इसका प्रमाण स्वयं गोस्वामी तुलसीदासजीके वचन हैं। दोहावलीमें उनके निम्नलिखित दो दोहे हैं—

जेहि सरीर रति राम सों सो आदरहिं सुजान।

रुद्र देह तजि नेहबस बानर भे हनुमान॥

जानि राम-सेवा सरस, समुझि करब अनुमान।

पुरुषा ते सेवक भए, हर ते भे हनुमान॥

(१४२-१४३)

(३) अष्टावक्र मुनिके पिताका नाम कहोड था। वे महर्षि उद्दालकके शिष्य थे। उद्दालकने सेवासे प्रसन्न हो उन्हें शीघ्र सब वेदोंका ज्ञान करा दिया और अपनी कन्या सुजाताका ब्याह भी कहोडके साथ कर दिया। सुजाता गर्भवती हुई। वह गर्भ अग्निके समान तेजस्वी था। एक दिन कहोड वेद-पाठ कर रहे थे। इतनेमें सुजाताके गर्भमें स्थित बालकने कहा—‘पिताजी! मन्त्र-पाठ शुद्ध नहीं हो रहा है।’ कहोडको अपमानका बोध हुआ। उन्होंने शाप दे दिया—‘तू अभीसे टेढ़ी बात बोलता है, इसलिये आठ अंगोंसे टेढ़ा ही उत्पन्न होगा।’ इस प्रकार अपने पिताके शापसे ही अष्टावक्र मुनि आठ अंगोंसे टेढ़े हुए थे।

उन दिनों राजा जनकके यहाँ वन्दी नामसे प्रसिद्ध एक विद्वान् ब्राह्मण आये थे। वे शास्त्रार्थ करते थे। उन्होंने राजासे यह शर्त स्वीकार करा ली थी कि ‘मैं शास्त्रार्थमें जिसे हरा दूँ, उसे पानीमें डुबो दिया जाय; यही उसकी पराजयका दण्ड है। यदि मैं हार जाऊँ तो मुझे भी वैसा ही दण्ड मिले।’ एक दिन सुजाताकी इच्छासे उसके पति धन लानेके लिये राजाके यहाँ गये। वहाँ वन्दीसे उनका शास्त्रार्थ हुआ। कहोड हार गये और उन्हें पानीमें डुबा दिया गया। जब अष्टावक्र कुछ बड़े हुए, तब एक दिन मातासे उन्हें पिताकी पराजयका समाचार ज्ञात हुआ। फिर तो वे स्वयं राजाके दरबारमें गये और उन्होंने वन्दीको शास्त्रार्थमें पराजित किया। उस समय वन्दीने कहा—‘मैं वरुणका पुत्र हूँ। मेरे पिता यज्ञ कर रहे हैं, उसीमें बारह ब्राह्मणोंकी आवश्यकता थी। मैंने चुने हुए बारह विद्वान् ब्राह्मणोंको पानीमें डुबानेके बहाने यज्ञमें भेजा है, वे लोग अब आते ही होंगे।’ यह कहकर वन्दी स्वयं जलमें कूद पड़ा। वे बारह ब्राह्मण तत्काल वहाँ आ गये। कहोड अपने पुत्रपर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अष्टावक्रको समंगा नदीमें नहलाकर उनके सब अंग सीधे कर दिये। यह कथा महाभारतके वनपर्वमें आती है।

(४) संसारमें तीन अवस्थाएँ देखी जाती हैं—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति। जागते हुए हम जो कुछ देखते, सुनते या व्यवहार करते हैं, वह जाग्रत्-अवस्थाके अन्तर्गत है। सो जानेपर हम स्वप्नमें जो कुछ देखते, सुनते या व्यवहार करते हैं, वह सब स्वप्नावस्था है। अत्यन्त गाढ़ निद्रामें जब मनकी वृत्तियाँ सुप्त हो जाती हैं और जीव अचेत होकर सोता है, वह सुषुप्त-अवस्था है। इन तीन अवस्थाओंसे जीव बँधा हुआ है। ईश्वर इन तीनोंसे मुक्त है। वही तुरीय-अवस्था (चौथी दशा) में है। मुक्त पुरुष भी ब्रह्म-साक्षात्कार करके इसी अवस्थामें स्थित होते हैं। इन तीनकी अपेक्षासे उसे तुरीय (चतुर्थ) कहते हैं; वास्तवमें वह सहज-अवस्था है। वही यथार्थ है।

(५) ब्रह्मानन्द अपना स्वरूपभूत आनन्द ही है। जब जीवभाव निवृत्त होकर तत्त्वज्ञ महात्मा अपनेको ब्रह्मस्वरूप या ब्रह्मसे अभिन्न अनुभव करने लगता है, तब अपने स्वरूपभूत चिन्मय आनन्दमें उसकी स्थिति होती है। वहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयकी त्रिपुटी नहीं होती। ज्ञेय आनन्द तो जड होता है। ब्रह्मानन्द ज्ञेय नहीं, ज्ञानरूप ही है। वहाँ ज्ञाता नहीं है। जिसे हम अनुभव करनेवाला या जाननेवाला कहते हैं, वह भी ज्ञानरूप ही है। ज्ञान और आनन्दमें नामका अन्तर है, वस्तु एक है।

(६) जैसे घंटा बजानेके बाद देरतक अनुरणन होता रहता है; उसी प्रकार ‘ॐ’ के ‘अ+उ+म्’ के उच्चारणके बाद जो एक अविच्छिन्न ध्वनि होती है, उसीका नाम ‘नाद’ है। यह ॐकारका ही एक अवयव है।

(७) आवागमन केवल सूक्ष्मशरीरयुक्त जीवका होता है। वास्तवमें समस्त कर्म-संस्कार सूक्ष्मशरीरमें ही संचित रहते हैं। यह प्रकृतिमें स्थित पुरुष या जीवात्मा ही आता है, जाता है, शरीरान्तर ग्रहण करता है। सूक्ष्मशरीरका आश्रय लेकर ही जीव विषय-सेवन आदि करता है। यह जीव क्या है? सर्वत्र व्यापक चेतन परमात्माका जो अंश सूक्ष्मशरीरमें आत्माभिमान कर लेता है, वही उस शरीरका ‘जीव’ कहलाता है। सद‍्गुरुकी वाणी और भगवान‍्की दयासे विवेक जाग्रत् होनेपर जब यह अभिमान मिट जाता है, तब नित्य मुक्तस्वरूप चेतन अपने ब्रह्मभावमें ही स्थित हो जाता है, उस शरीरसे अपना सम्बन्ध नहीं मानता। इसीको ‘मोक्ष’ कहते हैं। चेतन आश्रयसे परित्यक्त होनेपर वह सूक्ष्मशरीर अपने महाकारण प्रकृतिमें लीन हो जाता है; यही अज्ञान अथवा लिंग-शरीरका नाश है। जो जीव मुक्त नहीं हैं, वे उस सूक्ष्मशरीरको ही अपना स्वरूप मानकर उसके जन्म लेनेपर अपना जन्म मानते हैं, उसके आवागमनको अपना आवागमन समझते हैं और उसके सुख-दु:खको अपना सुख-दु:ख मानते रहते हैं। इसीसे जीवका आवागमन और जन्मान्तर माना जाता है। वस्तुत: चेतन आत्मा तो नित्य एवं व्यापक है; वह स्वयं नहीं आता-जाता। स्थूलशरीरसे सूक्ष्मशरीरका वियोग ही ‘मृत्यु’ कहलाता है और सूक्ष्म-शरीरका दूसरे नवीन स्थूलशरीरको ग्रहण करके माताके गर्भसे बाहर आना ही ‘जन्म’ है। चेतन आत्माका जन्म या मरण होता ही नहीं; वह अजन्मा है, अतएव अविनाशी भी है। सूक्ष्मशरीराभिमानी जीव ही ‘यातना-देह’ पाकर नरकके कष्ट भोगता है। अथवा देव-देह धारण करके स्वर्गके भोग भोगता है। पाप-पुण्य सब यह जीव ही करता है, स्थूलशरीर तो यन्त्र या साधनमात्र है। शेष भगवत्कृपा।